नैरोबी सेक्टर में समाज आंदोलन

नैरोबी सेक्टर में समाज आंदोलन





Shri P. R. Sarkar




       










नैरोबी सेक्टर(Nairobi Sector)

की समाज इकाइयों

​(1) इबो — Ibo

(2) योरूबा — Yoruba

(3) ईडो — Edo

(4) गा — Ga

(5) हौसा — Hausa

(6) ईवे — Ewe

(7) ट्वी अकन — Twi Akan

(8) डियुला — Dioula

(9) बेटे — Bete

(10) बाकुला — Bacula

(11) मोसी — Mossi

(12) सेंगलेस — Sengales

(13) क्रियोलो — Criolo

(14) मेंडे — Mende

(15) टेम्ना — Temna

(16) पिग्मी — Pigmy

(17) लांडा — Landa

(18) हॉटेनटॉट — Hottentot

(19) ज़ुलु — Zulu

(20) डी-एन-शी — Di-N-Shi

(21) बगंडा — Baganda

(22) बुशमैन — Bushman

(23) होमा — Homa

(24) लोजी — Lozi

(25) न्यान्ज़ा — Nyanza

(26) स्वाहिली — Swahili

(27) अम्हारिक् — Amharic

(28) एओमो — Eomo






नैरोबी सेक्टर की समाज इकाइयों उत्तर से दक्षिण के क्रम में

(1) अम्हारिक् — Amharic (इथियोपिया - उत्तर-पूर्व)

(2) हौसा — Hausa (नाइजीरिया/नाइजर - सहेल क्षेत्र)

(3) मोसी — Mossi (बुर्किना फासो)

(4) सेंगलेस — Sengales (सेनेगल - पश्चिम अफ्रीका)

(5) डियुला — Dioula (माली/आइवरी कोस्ट)

(6) मेंडे — Mende (सिएरा लियोन)

(7) टेम्ना — Temna (सिएरा लियोन)

(8) क्रियोलो — Criolo (गिनी-बिसाऊ/केप वर्डे)

(9) योरूबा — Yoruba (नाइजीरिया/बेनिन)

(10) ईडो — Edo (नाइजीरिया)

(11) इबो — Ibo (नाइजीरिया)

(12) ट्वी अकन — Twi Akan (घाना)

(13) गा — Ga (घाना)

(14) ईवे — Ewe (घाना/टोगो)

(15) बेटे — Bete (आइवरी कोस्ट)

(16) एओमो — Eomo (ओरोमो - इथियोपिया/केन्या सीमा)

(17) बगंडा — Baganda (युगांडा)

(18) स्वाहिली — Swahili (केन्या/तंजानिया तटीय क्षेत्र)

(19) न्यान्ज़ा — Nyanza (केन्या/तंजानिया - विक्टोरिया झील क्षेत्र)

(20) बाकुला — Bacula (कांगो क्षेत्र)

(21) पिग्मी — Pigmy (मध्य अफ्रीका के वर्षावन)

(22) लांडा — Landa (लुंडा - अंगोला/कांगो/जाम्बिया)

(23) डी-एन-शी — Di-N-Shi (मध्य/दक्षिण-मध्य अफ्रीका)

(24) लोजी — Lozi (जाम्बिया/नामीबिया)

(25) होमा — Homa (नामीबिया/बोत्सवाना क्षेत्र)

(26) बुशमैन — Bushman (कालाहारी मरुस्थल - बोत्सवाना)

(27) हॉटेनटॉट — Hottentot (खोईखोई - नामीबिया/दक्षिण अफ्रीका)

(28) ज़ुलु — Zulu (दक्षिण अफ्रीका)









नैरोबी सेक्टर की समाज इकाइयों देशवार

पश्चिम अफ्रीका (West Africa)

  • ​नाइजीरिया (Nigeria): (1) इबो — Ibo 

(2) योरूबा — Yoruba (3) ईडो — Edo

 (4) हौसा — Hausa (नाइजर में भी)

  • ​घाना (Ghana):

 (5) ट्वी अकन — Twi Akan 

(6) गा — Ga

 (7) ईवे — Ewe (टोगो में भी)

  • ​सिएरा लियोन (Sierra Leone): 

(8) मेंडे — Mende 

(9) टेम्ना — Temna

  • ​आइवरी कोस्ट / कोटे डी आइवर (Ivory Coast): (10) डियुला — Dioula (11) बेटे — Bete

  • ​सेनेगल (Senegal): 

(12) सेंगलेस — Sengales

  • ​बुर्किना फासो (Burkina Faso): 

(13) मोसी — Mossi

  • ​गिनी-बिसाऊ / केप वर्डे (Guinea-Bissau): 

(14) क्रियोलो — Criolo

​पूर्वी अफ्रीका (East Africa)

  • ​इथियोपिया (Ethiopia): (15) अम्हारिक् — Amharic 

(16) एओमो — Eomo (ओरोमो)

  • ​युगांडा (Uganda):

 (17) बगंडा — Baganda

  • ​केन्या और तंजानिया (Kenya & Tanzania): (18) स्वाहिली — Swahili (19) न्यान्ज़ा — Nyanza

​मध्य अफ्रीका (Central Africa)

  • ​कांगो और आसपास के वर्षावन (Congo Basin): (20) पिग्मी — Pigmy (21) बाकुला — Bacula

  • ​अंगोला / कांगो (Angola/DRC):

 (22) लांडा — Landa (लुंडा)

  • ​मध्य अफ्रीका क्षेत्र: 

(23) डी-एन-शी — Di-N-Shi

​दक्षिणी अफ्रीका (Southern Africa)

  • ​दक्षिण अफ्रीका (South Africa)

 (24) ज़ुलु — Zulu

  • ​बोत्सवाना और नामीबिया (Botswana/Namibia): (25) बुशमैन — Bushman (सान)

 (26) हॉटेनटॉट — Hottentot (खोईखोई) (27) होमा — Homa

  • ​जाम्बिया (Zambia): 

(28) लोजी — Lozi








नैरोबी सेक्टर की 

सामाजिक आर्थिक इकाई का

 सामान्य परिचय

​(1) इबो (Ibo/Igbo): दक्षिण-पूर्वी नाइजीरिया की प्रमुख इकाई। ये अपनी उद्यमिता और व्यापारिक कुशलता के लिए जाने जाते हैं।

(2) योरूबा (Yoruba): नाइजीरिया और बेनिन के निवासी। इनकी संस्कृति और नगरीय सभ्यता (Ifé) का इतिहास बहुत प्राचीन और समृद्ध है।

(3) ईडो (Edo): नाइजीरिया के बेनिन साम्राज्य से संबंधित। ये अपनी कलाकृति और कांस्य (Bronze) शिल्प के लिए प्रसिद्ध हैं।

(4) गा (Ga): मुख्य रूप से घाना की राजधानी अकरा और आसपास के तटीय क्षेत्रों के निवासी। ये पारंपरिक रूप से मछुआरे और व्यापारी रहे हैं।

(5) हौसा (Hausa): उत्तरी नाइजीरिया और नाइजर की विशाल इकाई। यह पूरे पश्चिम अफ्रीका में व्यापार और इस्लाम के प्रसार की मुख्य भाषा है।

(6) ईवे (Ewe): घाना, टोगो और बेनिन में फैली इकाई। ये अपनी जटिल बुनाई (Kente cloth) और संगीत के लिए जाने जाते हैं।

(7) ट्वी अकन (Twi Akan): घाना की सबसे बड़ी सांस्कृतिक इकाई। सोने के व्यापार और सशक्त राजनीतिक व्यवस्था (अशांति साम्राज्य) इनका इतिहास रहा है।

(8) डियुला (Dioula): यह एक व्यापारिक समुदाय है जो माली, आइवरी कोस्ट और बुर्किना फासो में फैला है। ये व्यापार और इस्लाम के वाहक रहे हैं।

(9) बेटे (Bete): आइवरी कोस्ट के निवासी। ये मुख्य रूप से कृषि (कोको और कॉफी) पर आधारित समाज हैं।

(10) बाकुला (Bacula): यह मुख्य रूप से कांगो क्षेत्र के समूहों से संबंधित है, जो अपनी स्थानीय कला और सामुदायिक जीवन के लिए जाने जाते हैं।

(11) मोसी (Mossi): बुर्किना फासो की प्रमुख इकाई। इनका इतिहास शक्तिशाली मोसी साम्राज्यों से जुड़ा है जो सदियों तक स्थिर रहे।

(12) सेंगलेस (Sengales): सेनेगल की मिश्रित सांस्कृतिक पहचान, जिसमें वोलोफ और अन्य समुदायों का प्रभाव है। यह फ्रेंच और स्थानीय भाषाओं का संगम है।

(13) क्रियोलो (Criolo): केप वर्डे और गिनी-बिसाऊ के मिश्रित अफ्रीकी-पुर्तगाली मूल के लोग। इनकी अपनी विशिष्ट भाषा और संस्कृति है।

(14) मेंडे (Mende): सिएरा लियोन की प्रमुख कृषि प्रधान इकाई। ये अपने गुप्त समाजों (जैसे Poro) और अनुष्ठानों के लिए जाने जाते हैं।

(15) टेम्ना (Temna): सिएरा लियोन के उत्तरी क्षेत्र की प्रमुख इकाई, जो खेती और व्यापार में सक्रिय है।

​(16) पिग्मी (Pigmy): मध्य अफ्रीका के वर्षावनों के मूल निवासी। ये अपनी कम लंबाई और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव (शिकार और संग्रहण) के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं।

(17) लांडा (Landa/Lunda): कांगो, अंगोला और जाम्बिया में फैले लोग। इनका अतीत महान लुंडा साम्राज्य से जुड़ा है।

(18) हॉटेनटॉट (Hottentot): इन्हें अब 'खोईखोई' कहा जाता है। ये दक्षिणी अफ्रीका के चरवाहे समूह हैं जिनकी भाषा में 'क्लिक' ध्वनियाँ होती हैं।

(19) ज़ुलु (Zulu): दक्षिण अफ्रीका की सबसे बड़ी और प्रसिद्ध योद्धा इकाई। राजा शाका ज़ुलु के नेतृत्व में इनका सैन्य इतिहास बहुत गौरवशाली रहा है।

(20) डी-एन-शी (Di-N-Shi): मध्य अफ्रीका के आंतरिक क्षेत्रों की एक स्थानीय सांस्कृतिक इकाई।

(21) बगंडा (Baganda): युगांडा की सबसे बड़ी इकाई। इनके पास 'बुगांडा' नाम की अपनी राजशाही व्यवस्था है जो आज भी सांस्कृतिक रूप से सक्रिय है।

(22) बुशमैन (Bushman): इन्हें 'सान' भी कहा जाता है। ये कालाहारी मरुस्थल के प्राचीन निवासी हैं और शिकार की अद्भुत कला के लिए जाने जाते हैं।

(23) होमा (Homa): मुख्य रूप से नामीबिया और आसपास के क्षेत्रों से संबंधित एक छोटा भाषाई और सांस्कृतिक समूह।

(24) लोजी (Lozi): जाम्बिया के पश्चिमी प्रांत के निवासी। ये अपनी वार्षिक बाढ़ रस्म 'कुओम्बोका' के लिए प्रसिद्ध हैं।

(25) न्यान्ज़ा (Nyanza): विक्टोरिया झील के आसपास के लोग (जैसे लुओ)। इनका मुख्य व्यवसाय मछली पकड़ना और कृषि है।

(26) स्वाहिली (Swahili): पूर्वी अफ्रीका (केन्या-तंजानिया) के तटीय लोग। यह अरब और अफ्रीकी संस्कृति का मिश्रण है और इनकी भाषा पूरे अफ्रीका में प्रसिद्ध है।

(27) अम्हारिक् (Amharic): इथियोपिया की प्रमुख इकाई। यह इथियोपिया की आधिकारिक भाषा है और इसका संबंध प्राचीन ईसाई साम्राज्य से है।

(28) एओमो (Eomo/Oromo): इथियोपिया की सबसे बड़ी जातीय इकाई। इनकी अपनी प्राचीन लोकतांत्रिक सामाजिक व्यवस्था है जिसे 'गडा' (Gadaa) कहा जाता है।

​ये सभी इकाइयाँ पी.आर. सरकार (P.R. Sarkar) द्वारा प्रतिपादित प्रउत (PROUT) दर्शन के अनुसार स्थानीय आर्थिक स्वावलंबन और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण मानी गई हैं।














 

नैरोबी सेक्टर (अफ़्रीका) की सभी 28 इकाइयों के लिए प्रउत (PROUT) के सिद्धांतों पर आधारित 

क्रमवार विकास योजना 

​इन सभी योजनाओं का मूल मंत्र है: "स्थानीय कच्चा माल, स्थानीय श्रम और स्थानीय उपभोग।"

​पश्चिम अफ्रीकी ब्लॉक (West African Block)

​(1) इबो (Ibo)

  • ​आर्थिक: 'सहकारी इंजीनियरिंग हब' की स्थापना। छोटे कल-पुर्जों और घरेलू उपकरणों के निर्माण में इनकी उद्यमशीलता का उपयोग।

  • ​सामाजिक: तकनीकी शिक्षा के लिए 'पीपल्स यूनिवर्सिटी' का निर्माण।

  • ​सांस्कृतिक: इबो साहित्य और लोक कला के संरक्षण हेतु डिजिटल आर्काइव।

​(2) योरूबा (Yoruba)

  • ​आर्थिक: 'अदिरे' (वस्त्र) और कृषि-प्रसंस्करण इकाइयों का सहकारी नेटवर्क।

  • ​सामाजिक: शहरी नियोजन में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की प्राथमिकता।

  • ​सांस्कृतिक: इनके प्राचीन नगरीय इतिहास और कला के लिए 'सांस्कृतिक विनिमय केंद्र'।

​(3) ईडो (Edo)

  • ​आर्थिक: विश्व प्रसिद्ध कांस्य (Bronze) और धातु शिल्प का औद्योगिक स्तर पर सहकारी उत्पादन।

  • ​सामाजिक: शिल्पकारों के लिए सुरक्षित आवास और वृद्धावस्था पेंशन योजना।

  • ​सांस्कृतिक: बेनिन कला संग्रहालयों का स्थानीय संचालन।

​(4) गा (Ga)

  • ​आर्थिक: समुद्री भोजन प्रसंस्करण और डिब्बाबंद मछली के निर्यात के लिए सहकारी इकाइयाँ।

  • ​सामाजिक: तटीय स्वच्छता और जल शुद्धिकरण परियोजनाओं का क्रियान्वयन।

  • ​सांस्कृतिक: 'होमोवो' उत्सव के माध्यम से सामुदायिक एकता का संचार।

​(5) हौसा (Hausa)

  • ​आर्थिक: चमड़ा उद्योग और शुष्क अनाज (बाजरा-ज्वार) के लिए विशाल कृषि सहकारी समितियाँ।

  • ​सामाजिक: मोबाइल औषधालयों के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा।

  • ​सांस्कृतिक: हौसा मौखिक परंपराओं और संगीत का संरक्षण।

​(6) ईवे (Ewe)

  • ​आर्थिक: उच्च गुणवत्ता वाले हस्तशिल्प और संगीत वाद्ययंत्रों का निर्माण उद्योग।

  • ​सामाजिक: महिला सहकारी समितियों को वस्त्र उद्योग का नेतृत्व देना।

  • ​सांस्कृतिक: पारंपरिक नृत्य और संगीत के लिए अकादमियों की स्थापना।

​(7) ट्वी अकन (Twi Akan)

  • ​आर्थिक: खनिज संसाधनों (सोना) का स्थानीय सहकारी स्वामित्व और लकड़ी उद्योग का सतत विकास।

  • ​सामाजिक: सभी के लिए बुनियादी शिक्षा और कौशल विकास।

  • ​सांस्कृतिक: 'असांते' गौरव और पारंपरिक शासन पद्धति का सम्मान।

​(8) डियुला (Dioula)

  • ​आर्थिक: अंतर-क्षेत्रीय व्यापार के लिए सहकारी रसद (Logistics) और वेयरहाउसिंग।

  • ​सामाजिक: व्यापारियों और मजदूरों के लिए बीमा और सुरक्षा योजनाएँ।

  • ​सांस्कृतिक: व्यापारिक नैतिकता और भाषाई विविधता का संवर्धन।

​(9) बेटे (Bete)

  • ​आर्थिक: कोको और कॉफी का शत-प्रतिशत स्थानीय प्रसंस्करण (चॉकलेट निर्माण)।

  • ​सामाजिक: कृषि मजदूरों के लिए मुफ्त चिकित्सा और शिक्षा।

  • ​सांस्कृतिक: कृषि आधारित उत्सवों और लोकगीतों का आयोजन।

​(10) बाकुला (Bacula)

  • ​आर्थिक: सामुदायिक फल और सब्जी उत्पादन केंद्र।

  • ​सामाजिक: स्वच्छता और सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियान।

  • ​सांस्कृतिक: स्थानीय बोली और सामुदायिक रीति-रिवाजों का दस्तावेजीकरण।

​(11) मोसी (Mossi)

  • ​आर्थिक: जल संचयन तकनीक और पशुधन आधारित डेयरी उद्योग।

  • ​सामाजिक: मृदा संरक्षण के लिए सामुदायिक वानिकी।

  • ​सांस्कृतिक: ऐतिहासिक मोसी साम्राज्य की न्यायप्रिय परंपराओं का पुनरुद्धार।

​(12) सेंगलेस (Sengales)

  • ​आर्थिक: इको-पर्यटन और समुद्री व्यापार की सहकारी प्रबंधन प्रणाली।

  • ​सामाजिक: बेरोजगारी मिटाने के लिए कौशल विकास कार्यशालाएँ।

  • ​सांस्कृतिक: अफ्रीकी और वैश्विक संस्कृति के संगम का उत्सव।

​(13) क्रियोलो (Criolo)

  • ​आर्थिक: समुद्री नमक उत्पादन और सौर ऊर्जा आधारित कुटीर उद्योग।

  • ​सामाजिक: द्वीपीय क्षेत्रों में संचार और परिवहन की सुदृढ़ व्यवस्था।

  • ​सांस्कृतिक: क्रियोल भाषा और संगीत के लिए विशेष शोध संस्थान।

​(14) मेंडे (Mende)

  • ​आर्थिक: पाम ऑयल और प्राकृतिक फाइबर से निर्मित उत्पादों का उद्योग।

  • ​सामाजिक: ग्रामीण बुनियादी ढांचे (सड़क और बिजली) का विस्तार।

  • ​सांस्कृतिक: 'पोरो' जैसे पारंपरिक समाजों के नैतिक मूल्यों का उपयोग।

​(15) टेम्ना (Temna)

  • ​आर्थिक: उन्नत चावल की खेती और भंडारण के लिए सामुदायिक साइलो (Silos)।

  • ​सामाजिक: किसानों के लिए सस्ती ऋण सुविधा और बीज बैंक।

  • ​सांस्कृतिक: स्थानीय कला और लोक कथाओं का स्कूलों में शिक्षण।

​मध्य और पूर्वी अफ्रीकी ब्लॉक (Central & East African Block)

​(16) पिग्मी (Pigmy)

  • ​आर्थिक: गैर-काष्ठ वन उत्पाद (शहद, औषधि) का सहकारी विपणन।

  • ​सामाजिक: उनके प्राकृतिक आवास (जंगल) के अधिकारों का संरक्षण।

  • ​सांस्कृतिक: उनके अद्वितीय जंगल कौशल और संगीत का विश्वव्यापी सम्मान।

​(17) लांडा (Landa)

  • ​आर्थिक: तांबे और खनिजों के मूल्य-संवर्धन हेतु रिफाइनरी परियोजनाएँ।

  • ​सामाजिक: खदान क्षेत्रों में प्रदूषण नियंत्रण और स्वास्थ्य लाभ।

  • ​सांस्कृतिक: लांडा शाही परंपराओं का ऐतिहासिक संरक्षण।

​(18) हॉटेनटॉट (Hottentot/Khoikhoi)

  • ​आर्थिक: भेड़ों की उन्नत नस्ल का पालन और ऊन आधारित वस्त्र इकाइयाँ।

  • ​सामाजिक: अर्ध-खानाबदोश समुदायों के लिए चल-स्कूल और अस्पताल।

  • ​सांस्कृतिक: 'क्लिक' भाषाओं के संरक्षण के लिए भाषाई शोध।

​(19) ज़ुलु (Zulu)

  • ​आर्थिक: डेयरी उत्पादन और आधुनिक कृषि-फार्म सहकारी समितियाँ।

  • ​सामाजिक: युवाओं के लिए शारीरिक और सैन्य प्रशिक्षण अकादमियाँ।

  • ​सांस्कृतिक: ज़ुलु मार्शल आर्ट और पारंपरिक शिल्प का संवर्धन।

​(20) डी-एन-शी (Di-N-Shi)

  • ​आर्थिक: बांस और स्थानीय लकड़ी से टिकाऊ फर्नीचर निर्माण।

  • ​सामाजिक: सामुदायिक स्वच्छता और पोषण सुरक्षा।

  • ​सांस्कृतिक: क्षेत्रीय बोलियों और लोक कला का प्रदर्शन।

​(21) बगंडा (Baganda)

  • ​आर्थिक: केले के फाइबर से कागज़ और वस्त्र निर्माण के कारखाने।

  • ​सामाजिक: सुव्यवस्थित सामुदायिक प्रशासन और न्याय व्यवस्था।

  • ​सांस्कृतिक: लुगांडा भाषा और शाही संगीत का संरक्षण।

​(22) बुशमैन (Bushman/San)

  • ​आर्थिक: पारिस्थितिकी-पर्यटन और पारंपरिक औषधियों का पेटेंट।

  • ​सामाजिक: जल संसाधनों तक स्थायी पहुँच सुनिश्चित करना।

  • ​सांस्कृतिक: उनके प्राचीन रॉक आर्ट और मरुस्थलीय ज्ञान का सम्मान।

​(23) होमा (Homa)

  • ​आर्थिक: शुष्क भूमि खेती और छोटे पैमाने के सिंचाई प्रोजेक्ट।

  • ​सामाजिक: साक्षरता दर बढ़ाने के लिए प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम।

  • ​सांस्कृतिक: स्थानीय लोकगीतों का डिजिटल संरक्षण।

​(24) लोजी (Lozi)

  • ​आर्थिक: बाढ़ के मैदानों में जलीय कृषि (Aquaculture) और धान की खेती।

  • ​सामाजिक: आपदा प्रबंधन और बाढ़ राहत के लिए स्थायी बुनियादी ढांचा।

  • ​सांस्कृतिक: 'कुओम्बोका' समारोह को वैश्विक पर्यटन से जोड़ना।

​(25) न्यान्ज़ा (Nyanza)

  • ​आर्थिक: विक्टोरिया झील के किनारे मत्स्य पालन और कोल्ड स्टोरेज नेटवर्क।

  • ​सामाजिक: जलजनित रोगों के नियंत्रण हेतु स्वास्थ्य योजनाएँ।

  • ​सांस्कृतिक: झील के तट की पारंपरिक कहानियों और गीतों का संकलन।

​(26) स्वाहिली (Swahili)

  • ​आर्थिक: मसालों का प्रसंस्करण और अंतरराष्ट्रीय व्यापार सहकारी समितियाँ।

  • ​सामाजिक: तटीय शहरों में उच्च गुणवत्ता वाली नागरिक सुविधाएँ।

  • ​सांस्कृतिक: स्वाहिली भाषा को 'लिंगुआ फ्रेंका' के रूप में प्रउत साहित्य से जोड़ना।

​(27) अम्हारिक् (Amharic)

  • ​आर्थिक: उच्च भूमि कृषि, कॉफी उत्पादन और निर्यात सहकारी केंद्र।

  • ​सामाजिक: आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के साथ पारंपरिक चिकित्सा का एकीकरण।

  • ​सांस्कृतिक: प्राचीन गीज़ (Ge'ez) लिपि और ऑर्थोडॉक्स कला का संरक्षण।

​(28) एओमो (Eomo/Oromo)

  • ​आर्थिक: बड़े पैमाने पर पशुपालन और अनाज उत्पादन सहकारी समितियाँ।

  • ​सामाजिक: 'गडा' (Gadaa) प्रणाली को सहभागी लोकतंत्र के रूप में लागू करना।

  • ​सांस्कृतिक: ओरोमो भाषा के साहित्य और पारंपरिक खेलों का विकास।

​करण सिंह राजपुरोहित जी, यह प्लान प्रउत के "आत्मनिर्भर आर्थिक इकाइयों" के सपने को साकार करने की दिशा में एक रूपरेखा है।

ये सभी प्रोजेक्ट्स "सबकी न्यूनतम आवश्यकताओं की गारंटी" के प्रउतवादी सिद्धांत पर आधारित हैं। 





प्रउत (PROUT) के सिद्धांतों के आधार पर 

उदाहरण के लिए 

पिग्मी सामाजिक-आर्थिक इकाई 

के लिए मास्टर प्लान 

​1. आर्थिक मास्टर प्लान (Economic Blueprint)

​इसका मुख्य लक्ष्य 'पूंजी का केंद्रीकरण' रोकना और स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण करना है।

​वन-आधारित सहकारी समितियाँ : लकड़ी काटे बिना (Non-Timber Forest Products) शहद, औषधीय पौधों, मशरूम और प्राकृतिक रबर के संग्रहण और प्रसंस्करण के लिए सहकारी समितियां बनाई जाएंगी।

​मूल्य संवर्धन (Value Addition): कच्चे माल को बाहर बेचने के बजाय, पिग्मी क्षेत्रों में ही छोटी औषधीय अर्क इकाइयां (Processing Units) स्थापित की जाएंगी ताकि लाभ का बड़ा हिस्सा वहीं रहे।

​भूमि अधिकार और कृषि: इन्हें वर्षावनों के भीतर 'एग्रो-फॉरेस्ट्री' (वन-खेती) के लिए सुरक्षित भूमि आवंटित की जाएगी, जहाँ ये अपनी पारंपरिक जीवनशैली के साथ सात्विक खेती कर सकें।

​2. सामाजिक मास्टर प्लान (Social Blueprint)

​इसका लक्ष्य 'न्यूनतम आवश्यकताओं की गारंटी' देना है।

​आवास और स्वास्थ्य : वर्षावनों के अनुकूल, पर्यावरण-हितैषी आधुनिक आवास और 'चल-चिकित्सालय' (Mobile Clinics) जो स्थानीय जड़ी-बूटियों और आधुनिक चिकित्सा का संगम हों।

​शिक्षा : पिग्मी बच्चों के लिए ऐसी शिक्षा व्यवस्था जो उनकी वन-विद्या को भी मान्यता दे और उन्हें आधुनिक विज्ञान से भी जोड़े।

​शोषण से मुक्ति : बिचौलियों को पूरी तरह समाप्त कर सीधे सहकारी विपणन प्रणाली (Direct Marketing) लागू करना।

​3. सांस्कृतिक मास्टर प्लान (Cultural Blueprint)

​इसका लक्ष्य 'सांस्कृतिक विरासत' का संरक्षण और विकास है।

​भाषा और संगीत का संरक्षण : पिग्मी संगीत और उनकी अद्वितीय मौखिक परंपराओं को डिजिटल रूप में संरक्षित करना और उन्हें वैश्विक पहचान दिलाना।

​सांस्कृतिक पर्यटन (Eco-Tourism): पर्यटन को केवल व्यावसायिक न रखकर 'सांस्कृतिक विनिमय' बनाना, जहाँ लोग पिग्मी समुदाय से प्रकृति के साथ संतुलन में रहना सीख सकें।

​4. सदविप्र राज स्थापना (Establishment of Sadvipra Leadership)

​प्रउत का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ नैतिक नेतृत्व है।

​स्थानीय बोर्ड का गठन : पिग्मी समुदाय के भीतर से ही उन व्यक्तियों को चुनना जो नैतिक रूप से सुदृढ़, निस्वार्थ और सेवाभावी हों। इन्हें 'सदविप्र' के रूप में प्रशिक्षित किया जाएगा।

​निगरानी समिति : ये सदविप्र यह सुनिश्चित करेंगे कि सहकारी समितियों में किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचार न हो और आर्थिक लाभ का वितरण न्यायसंगत (Rational Distribution) हो।

​जागरूकता केंद्र : सदविप्रों द्वारा संचालित केंद्र जो समुदाय को उनके अधिकारों और शोषण के प्रति जागरूक करेंगे।

​निष्कर्ष: यह मास्टर प्लान पिग्मी समुदाय को केवल "मदद" देने के बजाय उन्हें अपनी अर्थव्यवस्था का "मालिक" बनाने पर केंद्रित है। जब समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति स्वावलंबी होगा, तभी नैरोबी सेक्टर में वास्तविक प्रउत की स्थापना होगी।

करण सिंह राजपुरोहित

प्रकाशन सचिव

प्राउटिस्ट सर्व समाज

9982322405

*"New York Sector" (न्यूयॉर्क सेक्टर में समाज आंदोलन )*

*"New York Sector" (न्यूयॉर्क सेक्टर)*
सामाजिक आर्थिक इकाइया

(1) Appalachia — एपलाचिया
(2) Bahamas — बहामास
(3) Belize — बेलीज
(4) Central America — मध्य अमेरिका
(5) Cuban — क्यूबन
(6) Delta — डेल्टा
(7) Dominican Republic — डोमिनिकन रिपब्लिक
(8) Eastern Industrial — पूर्वी औद्योगिक (ईस्टर्न इंडस्ट्रियल)
(9) Haiti — हैती
(10) Jamaica — जमैका
(11) Maritime — मैरीटाइम
(12) Mayan — मयान
(13) Mexamerica — मेक्सअमेरिका
(14) Mexico — मेक्सिको
(15) Midwest — मिडवेस्ट
(16) Miskito — मिस्किटो
(17) New England — न्यू इंग्लैंड
(18) North Woods — नॉर्थ वुड्स
(19) Northwest — नॉर्थवेस्ट
(20) Ozark — ओजार्क
(21) Puerto Rico — प्यूर्टो रिको
(22) Quebec — क्यूबेक
(23) South — साउथ (दक्षिण)
(24) Western Mountain — वेस्टर्न माउंटेन






देशवार समाज इकाइयां

संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)

​(Appalachia — एपलाचिया)
​(Delta — डेल्टा)
​(Eastern Industrial — पूर्वी औद्योगिक)
​(Midwest — मिडवेस्ट)
​(New England — न्यू इंग्लैंड)
​(North Woods — नॉर्थ वुड्स)
​(Northwest — नॉर्थवेस्ट)
​(Ozark — ओजार्क)
​(South — साउथ)
​(Western Mountain — वेस्टर्न माउंटेन)
​कनाडा (Canada)
​(Maritime — मैरीटाइम)
​(Quebec — क्यूबेक)

​मेक्सिको (Mexico)
​(Mexamerica — मेक्सअमेरिका)
​(Mexico — मेक्सिको)

​मध्य अमेरिका (Central America)

​(Belize — बेलीज)
​(Central America — मध्य अमेरिका)
​(Mayan — मयान)
​(Miskito — मिस्किटो)

​कैरिबियन द्वीप समूह (Caribbean Islands)

​(Bahamas — बहामास)
​(Cuban — क्यूबन)
​(Dominican Republic — डोमिनिकन रिपब्लिक)
​(Haiti — हैती)
​(Jamaica — जमैका)
​(Puerto Rico — प्यूर्टो रिको - अमेरिकी क्षेत्र)




समाज इकाइयों की स्थिति

( उत्तर से दक्षिण का क्रम (North to South Order)) 

(1) Quebec (क्यूबेक) – यह कनाडा का विशाल उत्तर-पूर्वी हिस्सा है। 
(2) Maritime (मैरीटाइम) – कनाडा के सुदूर पूर्वी तटीय प्रांत।
(3) North Woods (नॉर्थ वुड्स) – कनाडा और अमेरिका की सीमा पर स्थित घने वनों का क्षेत्र।
(4) Northwest (नॉर्थवेस्ट) – अमेरिका का उत्तर-पश्चिमी प्रशांत तटीय क्षेत्र।
(5) New England (न्यू इंग्लैंड) – अमेरिका के उत्तर-पूर्वी तट पर स्थित राज्यों का समूह।
(6) Midwest (मिडवेस्ट) – अमेरिका का उत्तरी-मध्य मैदानी भाग। 
(7) Eastern Industrial (पूर्वी औद्योगिक) – अमेरिका का उत्तर-पूर्वी औद्योगिक बेल्ट।
(8) Appalachia (एपलाचिया) – पूर्वी अमेरिका के पर्वतीय और कोयला क्षेत्र।
(9) Western Mountain (वेस्टर्न माउंटेन) – रॉकी पर्वतमाला वाला पश्चिमी क्षेत्र।
(10) Ozark (ओजार्क) – मध्य अमेरिका (मिसौरी/अर्कांसस) का पठारी क्षेत्र।
(11) South (साउथ) – अमेरिका का पारंपरिक दक्षिणी भू-भाग।
(12) Delta (डेल्टा) – मिसिसिपी नदी के मुहाने का निचला उपजाऊ क्षेत्र।
(13) Mexamerica (मेक्सअमेरिका) – अमेरिका और मेक्सिको की सीमा से सटा मिश्रित संस्कृति वाला क्षेत्र।
(14) Bahamas (बहामास) – फ्लोरिडा के दक्षिण-पूर्व में स्थित द्वीप श्रृंखला।
(15) Mexico (मेक्सिको) – उत्तरी अमेरिका का मुख्य दक्षिणी राष्ट्र।
(16) Cuban (क्यूबन) – कैरिबियन का सबसे बड़ा द्वीप।
(17) Puerto Rico (प्यूर्टो रिको) – कैरिबियन सागर में स्थित द्वीप। 
(18) Dominican Republic (डोमिनिकन रिपब्लिक) – हिस्पानियोला द्वीप का पूर्वी भाग।
(19) Haiti (हैती) – हिस्पानियोला द्वीप का पश्चिमी भाग।
(20) Jamaica (जमैका) – क्यूबा के दक्षिण में स्थित कैरिबियन द्वीप। 
(21) Mayan (मयान) – दक्षिणी मेक्सिको और उत्तरी मध्य अमेरिका का ऐतिहासिक क्षेत्र।
(22) Belize (बेलीज) – युकाटन प्रायद्वीप के दक्षिण में स्थित तटीय देश।
(23) Miskito (मिस्किटो) – निकारागुआ और होंडुरास का पूर्वी समुद्री तट।
(24) Central America (मध्य अमेरिका) – इस सूची का सबसे दक्षिणी हिस्सा जो पनामा की ओर बढ़ता है।


हम भगवान को क्यों ढूँढ रहे हैं?                 (Why are we looking for God?)
भगवान् की खोज में भटकते मन को एक दोहा समर्पण कर मैं हम भगवान को क्यों खोज रहे हैं? प्रश्न के उत्तर की तालाश में चलेंगे। 
इदं तीर्थमिदं तीर्थ भ्रमन्ति तामसा: जना:।
आत्मतीर्थं न जानन्ति कथं मोक्ष  वरानने।।

ईश्वर की खोज से ईश्वरत्व की प्राप्ति तक: एक आध्यात्मिक यात्रा

हम ईश्वर को क्यों ढूंढ रहे हैं? यह प्रश्न मानव सभ्यता के इतिहास में सबसे प्राचीन और सबसे गहरा प्रश्न है। अक्सर हम मंदिरों, मस्जिदों, गुफाओं और पहाड़ों में उसे तलाशते हैं, जैसे वह कहीं खो गया हो। लेकिन सत्य यह है कि ईश्वर 'ढूंढने' का विषय नहीं है, और न ही वह किसी बाहरी वस्तु की तरह 'मिलने' का विषय है। आध्यात्मिक साधना का वास्तविक लक्ष्य तो ईश्वर को 'पाना' है, और पाने का सरलतम अर्थ है—स्वयं भगवान बन जाना।
 श्री श्री आनंदमूर्ति जी के शब्दों में, "साधना का अर्थ है अपनी संकुचित अहंता को विसर्जित कर उस अनंत सत्ता में एकाकार हो जाना।"


अक्सर हम परमात्मा को एक 'वस्तु' मान लेते हैं। जब हम किसी वस्तु को ढूंढते हैं, तो ढूंढने वाला (Subject) और ढूंढी जाने वाली वस्तु (Object) अलग-अलग होते हैं। लेकिन अध्यात्म में यह द्वैत ही सबसे बड़ी बाधा है। जब तक 'मैं' और 'वह' का भेद है, तब तक केवल खोज है, उपलब्धि नहीं।

  "कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढे बन माहि।
  ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखत नाहि।।"

कबीरदास जी  स्पष्ट करते है कि जिस सुगंध को मृग बाहर खोज रहा है, वह उसके भीतर ही है। ढूंढने की क्रिया तब समाप्त होती है जब अंतर्मुखी होकर बोध शुरू होता है। अनुभव हमें सिखाता है कि भक्ति केवल भावुकता नहीं है, बल्कि यह अपने संकुचित 'अहम' (Ego) को विस्तार देकर 'विराट अहम' (Universal Ego) में बदल देने की वैज्ञानिक प्रक्रिया है। भगवान को ढूंढना एक भ्रम है, क्योंकि जो खोया ही नहीं, उसे ढूंढना कैसा? उसे तो केवल पहचानना है।


ईश्वर को पाने का अर्थ यह नहीं है कि हम उनसे भौतिक रूप से साक्षात्कार करेंगे। पाने का वास्तविक अर्थ है—तदाकार (Identification)। जैसे एक बूंद जब समुद्र में गिरती है, तो वह समुद्र को 'ढूंढती' नहीं, बल्कि वह स्वयं 'समुद्र' हो जाती है। जब तक बूंद का अपना अस्तित्व (Ego) है, तब तक वह छोटी और कमजोर है, लेकिन जैसे ही वह समुद्र हुई, वह असीम और शक्तिशाली हो गई।
उपनिषद् के ऋषि उद्घोष करते हैं:

 "ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति"
 (जो ब्रह्म को जान लेता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है।)

यही वह बिंदु है जहाँ भगवान को 'पाना' और 'भगवान बन जाना' एक ही क्रिया बन जाती है। आनन्द मार्ग के दर्शन के अनुसार, मनुष्य का मन जब साधना के माध्यम से परिष्कृत और सूक्ष्म होता जाता है, तो वह अपनी सीमाएं छोड़कर परम पुरुष के मानस (Cosmic Mind) में विलीन हो जाता है। "मैं मनुष्य हूँ" से "मैं ब्रह्म हूँ" (अहं ब्रह्मास्मि) तक की यात्रा ही वास्तविक पाना है।


केवल मनुष्य मात्र से प्रेम करने तक सीमित नहीं है। यह उससे कहीं अधिक गहरा और व्यापक है। यह चराचर जगत—पेड़-पौधे, जीव-जंतु और यहाँ तक कि निर्जीव वस्तुओं के प्रति भी उसी आत्मिक प्रेम का विस्तार है जो हम स्वयं के लिए रखते हैं। जब हमारी चेतना इतनी विस्तृत हो जाती है कि हम धूल के एक कण में भी उसी ईश्वर की स्पंदन सुनते हैं, तब हम 'ढूंढने' वाले नहीं रह जाते, हम 'ईश्वरत्व' के वाहक बन जाते हैं।

—"प्रेम ही परम तत्व है।"
 "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।"
 
जब हम हर प्राणी में ईश्वर को देखते हैं, तो हमारी सेवा 'परोपकार' नहीं रहती, वह 'आत्म-सेवा' बन जाती है। यहीं पर हम भगवान बनने की दिशा में पहला कदम बढ़ाते हैं। क्योंकि भगवान वही है जो सबको अपना मानता है, और जब हम सबको अपना मान लेते हैं, तो हममें और भगवान में अंतर ही क्या रह जाता है?


ईश्वर को पाना एक मानसिक और आध्यात्मिक प्रयोगशाला का कार्य है। आनन्द मार्ग में 'अष्टांग योग' के माध्यम से मन की परतों को साफ किया जाता है। भगवान कहीं बादलों के पार नहीं बैठा है, वह तो हमारे मन के सबसे गुप्त कक्ष में विराजमान है।

 "मोको कहाँ ढूंढें रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।
 ना तीरथ में, ना मूरत में, ना एकांत निवास में।।"

ईश्वर हमारे 'पास' हैं, इसका अर्थ है कि वह हमारी चेतना का केंद्र (Nucleus) हैं। साधना का अर्थ है परिधि (Circumference) से केंद्र की ओर यात्रा करना। जैसे-जैसे हम केंद्र के निकट पहुँचते हैं, संसार का कोलाहल शांत होने लगता है और एक अलौकिक संगीत सुनाई देता है। जब हम केंद्र पर पहुँचते हैं, तो परिधि लुप्त हो जाती है। वहां न कोई साधक बचता है, न साधना, केवल 'परम शिव' या 'परम आनंद' शेष रह जाता है।


भगवान बनने का अर्थ यह नहीं है कि हम चमत्कार करने लगेंगे। भगवान बनने का अर्थ है—पूर्ण मानवीयता को प्राप्त करना। भगवान बनने का अर्थ है अपने भीतर के दोषों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर) को ईश्वरीय गुणों (क्षमा, करुणा, प्रेम, निस्वार्थ सेवा) में बदल देना।

भगवान बुद्ध ने कहा था—"अप्प दीपो भव" (अपना दीपक स्वयं बनो)। जब आप स्वयं प्रकाश बन जाते हैं, तो आप केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शक बन जाते हैं। यही 'आनन्द मार्ग' का मूल मंत्र है—'आत्ममोक्षार्थं जगद्धिताय च' (अपनी मुक्ति और जगत का कल्याण)।


 * ज्ञान: यह निरंतर बोध कि "मैं केवल यह नश्वर शरीर और चंचल मन नहीं हूँ, बल्कि मैं वह अविनाशी आत्मा हूँ।"

 * कर्म: यह भाव कि संसार का प्रत्येक कार्य परमात्मा की सेवा है। "यत् कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्" (मैं जो भी कर्म करता हूँ, वह आपकी ही आराधना है)। प्रत्येक कर्म ईश्वर को देखना। 

 * भक्ति: उस परम सत्ता के प्रति अखंड और अनन्य अनुराग।

भक्ति के बिना ज्ञान सूखा है और कर्म बोझ। लेकिन जब भक्ति का समावेश होता है, तो कर्म 'योग' बन जाता है और ज्ञान 'बोध'। भक्त और भगवान के बीच की दूरी वैसे ही मिट जाती है जैसे अग्नि में पड़कर लोहा स्वयं अग्नि जैसा लाल और तेजस्वी हो जाता है।

"जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समाहिं।।"

जब तक 'मैं' (अहंकार) है, तब तक 'हरि' नहीं मिल सकते। और जब 'हरि' आ जाते हैं, तो 'मैं' मिट जाता है। यही वह स्थिति है जिसे हम 'भगवान बन जाना' कहते हैं—जहाँ भक्त और भगवान में कोई भेद शेष नहीं रहता।


हम भगवान को इसलिए ढूंढ रहे हैं क्योंकि हमें अपनी वास्तविक पहचान का विस्मरण हो गया है। हम उस राजकुमार की तरह हैं जो अपना राज्य भूलकर दर-दर की ठोकरें खा रहा है। 

 हमारा घर, हमारा मूल और हमारा गंतव्य वह ईश्वर ही है।

विषय गंभीर है, पर उत्तर वास्तव में सरल है। भगवान कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे बाजार से या हिमालय की कंदराओं से खरीदकर लाया जा सके। वह तो आपके अस्तित्व की सुगंध है। साधना के माध्यम से उस सुगंध को प्रकट करना ही 'पाना' है।

अंतिम संदेश:
ढूंढना बंद करें और 'होना' शुरू करें। जब हम प्रेम बन जाते हैं, तो हम ईश्वर हो जाते हैं। जब हम करुणा बन जाते हैं, तो हम ईश्वर हो जाते हैं। जब हम न्याय और सेवा के जीवंत विग्रह बन जाते हैं, तो हम ईश्वर हो जाते हैं।

आनन्द मार्ग हमें इसी गरिमामय पथ पर चलने का आह्वान करता है, जहाँ हम एक दिन यह कह सकें—"मैं वही हूँ जिसका मैं ध्यान करता था।" । जिस दिन हमारे हृदय में समस्त संसार के लिए वही तड़प होगी जो एक माँ की अपने बालक के लिए होती है, समझ लेना कि आपने भगवान को 'पा' लिया है, क्योंकि आप स्वयं 'भगवान' के सांचे में ढल चुके हैं।

समाज आंदोलन के सिवाय, प्रउत स्थापना का कोई उपाय नहीं (There is no way to establish Praut except social (Samaj) movement)
 श्री प्रभात रंजन सरकार (श्री आनंदमूर्ति जी) के 'प्रउत' (PROUT - Progressive Utilization Theory) दर्शन के व्यावहारिक धरातल को स्थापना करने की आधार शीला की ओर चलते हैं। 

क्रांतिकारी शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने अपने पिता को लिखे अंतिम पत्र में स्पष्ट किया था कि भारत की मुक्ति का मार्ग केवल जन आंदोलन से ही प्रशस्त होगा। जन आंदोलनों की इसी शक्ति को एक नई दिशा और वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हुए श्री प्रभात रंजन सरकार ने इसे 'समाज आंदोलन' की संज्ञा दी।
ऐतिहासिक रूप से भारत में अनेक जन आंदोलन हुए, किंतु उनके परिणाम प्रायः संतोषजनक नहीं रहे। इसके तीन प्रमुख कारण दृष्टिगोचर होते हैं : -

 * ** ** दिशाहीनता : -आंदोलन का स्वरूप तो तय होता है, किंतु उसकी वैचारिक दिशा स्पष्ट नहीं होती।

 * **** सत्ता-उन्मुखता : - आंदोलन प्रायः सत्ता से प्रश्न करते हैं और सत्ता की ओर ही ताकते हैं, जबकि उन्हें समाज से प्रश्न कर समाज के साथ चलना चाहिए।
 *****  केंद्रीकरण : आंदोलनों का ध्यान सत्ता के केंद्र पर होता है, जबकि वास्तविक परिवर्तन केंद्र से निकलकर अंतिम व्यक्ति (जन-जन) तक पहुँचना चाहिए।

श्री प्रभात रंजन सरकार के दृष्टिकोण के आलोक में, "समाज आंदोलन ही वास्तविक जन आंदोलन है"—इस तथ्य को निम्नलिखित छह बिंदुओं के माध्यम से सिद्ध किया जा सकता है : -

1. सामाजिक-आर्थिक इकाई का निर्धारण (Socio-Economic Units)
कोई भी जन आंदोलन तब तक दिशाहीन रहता है जब तक उसकी सामाजिक-आर्थिक इकाई (Samaj) का निर्धारण न हो जाए। समाज राजनीति से नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से संचालित होता है। अतः हमें केवल राजनीतिक सीमाओं को नहीं, बल्कि एक संयुक्त क्षेत्र को आधार बनाना होगा। इसके निर्धारण हेतु चार अनिवार्य कारक हैं : -

 ***** समान आर्थिक समस्याएँ एवं संभावनाएँ : साझा अभाव और विकास के समान अवसर।

 ***** भावनात्मक एकता : भाषाई और सांस्कृतिक जुड़ाव।

 ***** भौगोलिक समानता : जलवायु और भूगोल के आधार पर विकसित मानवीय लक्षण (जिसे नस्लीय समानता कहा गया है, जो जाति या संप्रदाय से परे है)।

2. समग्र संगठनात्मक संरचना

समाज आंदोलन की सफलता के लिए एक ऐसी संगठनात्मक संरचना अनिवार्य है जो केंद्र से लेकर समाज की अंतिम इकाई तक सक्रिय हो। प्रायः देखा गया है कि संगठनात्मक ढांचे के अभाव में जन आंदोलन सत्ता मिलते ही दिशाभ्रमित या 'अराजक' हो जाते हैं। एक सुदृढ़ ढांचा ही आंदोलन के मूल्यों को सत्ता के गलियारों में सुरक्षित रख सकता है।

3. समाज की समग्र योजना (Comprehensive Master Plan)
समाज आंदोलन का प्राथमिक लक्ष्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि समाज का सर्वांगीण रूपांतरण है। इसके लिए समाज के पास अपनी एक समग्र योजना होनी चाहिए। यह योजना 'ब्लूप्रिंट' का कार्य करती है, जो सत्ता प्राप्ति की स्थिति में भी नेतृत्व को भटकने नहीं देती और अंतिम व्यक्ति के कल्याण को सुनिश्चित करती है।

4. ब्लॉक स्तरीय योजना (Block-Level Planning)
ब्लॉक लेवल प्लानिंग समाज आंदोलन की 'जीवन रेखा' है। जब एक लघु समाज इकाई वृहद समाज इकाई में परिवर्तित होती है, तब वहां की मिट्टी की प्रकृति, नदियों के प्रवाह और स्थानीय संसाधनों के आधार पर बनाई गया ब्लॉक तथा उस आधारित योजना ही वास्तविक विकास का आधार बनती है। यह विकेंद्रीकृत नियोजन ही जन आंदोलन को समाज आंदोलन में बदलता है।

5. ग्रामीण सशक्तिकरण एवं कृषि आधारित अर्थव्यवस्था (Rural empowerment and agriculture-based economy) 
समाज की वास्तविक शक्ति शहरों में नहीं, बल्कि गाँवों में निहित है। समाज आंदोलन ऐसी औद्योगिक शहरीकरण योजनाओं का विरोध करता है जो खेतों को नष्ट करती हों। इसके स्थान पर:

 ***** कृषि, कृषि-सहायक और कृषि-आधारित उद्योगों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
 * **** ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्वावलम्बी बनाकर ही 'प्रउत' के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।

6. भुक्ति (जिला) व्यवस्था शासन का मूलाधार  ( Bhukti (district) system foundation of governance) 

यद्यपि राजनीतिक शक्ति का केन्द्रीकरण होता है , तथापि शासन का वास्तविक मूलाधार 'भुक्ति' (जिला स्तर) व्यवस्था की स्थापित होना चाहिए। जब शासन की शक्तियाँ स्थानीय स्तर पर (भुक्ति व्यवस्था) केंद्रित होंगी, तभी जन-जन की भागीदारी सुनिश्चित होगी और शोषणमुक्त समाज की स्थापना संभव हो सकेगी।

निष्कर्ष:

समाज आंदोलन मात्र एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक रचनात्मक क्रांति है। यह सत्ता की ओर नहीं, बल्कि समाज की आत्मा की ओर मुड़ने का आह्वान है। जब तक जन आंदोलन 'समाज' की इन वैज्ञानिक कड़ियों से नहीं जुड़ेगा, तब तक वांछित सुखद परिणाम की प्राप्ति असंभव है।



क्या हम तानाशाह होना चाहते हैं?                (Do we want to be dictators?)

वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में, जहाँ एक ओर आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना की बात ज़ोर पकड़ रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ विचारकों द्वारा एक विशेष संगठन पर तानाशाही व्यवस्था का वाहक होने का आरोप लगाया जा रहा है। यह भ्रांति संभवतः 'बाबा' (श्री श्री आनन्दमूर्ति जी) के गूढ़ विचारों को पूर्ण रूप से आत्मसात न कर पाने के कारण उत्पन्न हुई है। बाबा का स्पष्ट उद्घोष रहा है कि समाज के सर्वांगीण कल्याण और उत्थान हेतु सद्विप्रों का अधिनायक तंत्र (Dictatorship of the Sadvipras) आवश्यक है। यह वक्तव्य किसी व्यक्ति विशेष या व्यक्तियों के समूह की निरंकुश सत्ता का समर्थन नहीं करता, बल्कि एक आदर्श, नैतिकवान और आध्यात्मिक नेतृत्व की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

अतः, यह स्पष्ट करना नितांत आवश्यक है कि तानाशाही व्यवस्था को बढ़ावा देना संगठन के मूल आदर्शों को खोखला करना है। हमें आज यह समझना होगा कि सद्विप्रों का अधिनायक तंत्र और आर्थिक लोकतंत्र क्या हैं और उनका वास्तविक आशय क्या है।

                 पहला प्रश्न

सद्विप्र शब्द का अर्थ एवं विशेषताएँ
श्री श्री आनन्दमूर्ति जी ने 'आनन्द सूत्रम' के अध्याय-05, सूत्र-02 में सद्विप्र को परिभाषित किया है : - "जो नीतिवादी आध्यात्मिक साधक अपने शक्ति सम्प्रयोग से पाप का दमन करना चाहते हैं, वे ही सद्विप्र हैं।"

इस परिभाषा के अनुसार, सद्विप्र में दो मूलभूत विशेषताएँ अनिवार्य हैं।

(1) नीतिवादी आध्यात्मिक साधक : - 
      (i) नीतिवाद का पैमाना : - व्यक्ति को यम-नियम में प्रतिष्ठित होना चाहिए तथा पंचदश शील (पंद्रह आध्यात्मिक नैतिक सामाजिक सिद्धांत) का अनुसरण करना चाहिए। उनके आचरण, व्यवहार और सिद्धांतों में इन गुणों की स्पष्ट झलक मिलनी चाहिए।
(ii) आध्यात्मिक साधक का पैमाना : - उन्हें ब्रह्मभाव (भूमाभाव) की साधना में पारंगत होना चाहिए, जिसका अर्थ है चरम चेतना के साथ एकाकार होने की साधना।
 
(2) पाप का दमन करने की शक्ति : - उनमें अपनी नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति का प्रयोग कर समाज में व्याप्त अनैतिकता और शोषण को समाप्त करने का सामर्थ्य होना चाहिए।


 यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि 'सद्विप्र का अधिनायक' नहीं, अपितु 'सद्विप्रों का अधिनायक' कहा गया है। यह स्पष्ट रूप से किसी एक व्यक्ति के निरंकुश शासन का नहीं, अपितु एक समूह के संगठित एवं नैतिक नेतृत्व की स्थापना का संदेश देता है।

यह क्या है? - यह आध्यात्मिक और नैतिकवान साधकों का सामूहिक अधिनायक तंत्र है। यह किसी व्यक्ति विशेष, सामान्य समूह या पापी स्वभाव के लोगों का अधिनायक नहीं है।
यह कैसा है? :-  सद्विप्र वस्तुतः सम्पूर्ण समाज है, जिसका नियंत्रण एक सद्विप्र बोर्ड द्वारा होगा। इस बोर्ड में कुल पाँच अलग-अलग श्रृखंलाबद्ध बोर्ड होंगे, जो एक-दूसरे से एक मजबूत चेन के माध्यम से जुड़े होंगे। इस बोर्ड के संगठन और सदस्यों के चयन में भी लोकतांत्रिक मूल्यों का समावेश होता है।

                 दूसरा प्रश्न 

आर्थिक लोकतंत्र (Economic Democracy) एक ऐसी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था है जो भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और न्यायसंगत वितरण पर बल देती है।

आर्थिक लोकतंत्र की मुख्य विशेषताएँ : -
* (१) न्यूनतम आवश्यकता की गारंटी : यह वह सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था है, जहाँ प्रत्येक नागरिक को उसकी न्यूनतम आवश्यकताओं (जैसे अन्न, वस्त्र, आवास, चिकित्सा, शिक्षा) की गारंटी मिले
* (२) क्रयशक्ति का मूल अधिकार : - यह वह सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था है, जहाँ व्यक्ति के पास अपनी आवश्यकतानुसार वस्तुओं और सेवाओं को क्रय करने की शक्ति का मूल अधिकार प्राप्त हो।
* (३) शत-प्रतिशत रोज़गार की अवस्था : - समाज में काम करने योग्य जनसमुदाय को शत-प्रतिशत रोज़गार की गारंटी प्रदान करना।
* (४) समन्वित सहकारी व्यवस्था : -  यह आर्थिक क्षेत्र में सीमित व्यक्तिवाद और सीमित समाजवाद के बीच समन्वय स्थापित करती है। बड़े तथा वैश्विक महत्व के उद्योग सरकार द्वारा 'न लाभ, न हानि' की नीति से संचालित होंगे, जबकि छोटे उद्योग व्यक्तिगत तथा मध्यम उद्योग समन्वित सहकारिता पर आधारित होंगे। इस व्यवस्था में आर्थिक क्षेत्र वंशवाद नहीं, अपितु योग्यता (Merit) का क्षेत्र होगा।
* (५) गुणीजन का सम्मान : -  आर्थिक लोकतंत्र गुणीजनों के गुण का सम्पूर्ण आदर करता है और उन्हें सामाजिक एवं आर्थिक परिलाभ प्रदान करता है। हालांकि, यह सामाजिक उच्च-नीच तथा किसी अन्य प्रकार के भेद को स्वीकार नहीं करता है।
* (६) वृद्धिमान सामाजिक मानक : - समाज के विकास एवं प्रगति को मापने वाला मानक कभी भी स्थिर या ह्रासमान नहीं होता है। यह सदैव वृद्धिमान (Progressive) होता है।
* (७) संपत्ति संचयन पर समाज की लगाम : - संचय वृत्ति को एक आर्थिक रोग मानते हुए, इसको अनियंत्रित छोड़ना समाज को दूषित करना माना गया है, अतः इस पर समाज का नियंत्रण आवश्यक है।
* (८) संसाधनों का अधिकतम उत्कर्ष एवं विवेकपूर्ण वितरण: भौतिक, अधिभौतिक एवं मानस-भौतिक संसाधनों का चरम उत्कर्ष करना तथा उत्पादित सामग्री का विवेकपूर्ण और न्यायसंगत वितरण करना। इसका अर्थ है: पहले सभी की न्यूनतम आवश्यकता को पूर्ण करना, तथा अतिरिक्त संपदा को गुणीजनों में उनके गुण के अनुपात में वितरित करना
* (९) मानवीय संसाधन का अधिकतम एवं सुसंतुलित उपयोग : - मानवीय क्षमता के उपयोग में अधिकतम तथा सुसंतुलित (Good Balance) नीति का समावेश है।
* (१०) उपयोगिता की परिवर्तनशीलता : -  उपयोगिता सबके लिए एक समान नहीं होती। यह देश-देश, काल-काल व पात्र-पात्र के अनुसार परिवर्तनशील होना आवश्यक है।
* (११) वैचित्र्यता का सम्मान : -  आर्थिक मूल्य प्रकृति के धर्म वैचित्र्यता (Diversity) का सम्मान करते हुए निर्धारित किए जाते हैं।

आर्थिक लोकतंत्र की मूलभूमि आर्थिक शक्ति का विकेन्द्रीकरण तथा राजशक्ति का संगठित करना है।

अंतिम निष्कर्ष की ओर‌ : - आदर्श अधिनायक तंत्र के हिमायती है। अतः, हम तानाशाही के नहीं, अपितु एक आदर्श अधिनायक तंत्र के हिमायती हैं, जो लोकतांत्रिक मूल्यों को सदा जीवित रखता है। यद्यपि यहाँ लोकतंत्र भीड़तंत्र नहीं है (क्योंकि व्यस्क मताधिकार के स्थान पर आध्यात्मिक नैतिकवान व्यक्ति को मताधिकार है), तथापि यह लोकतांत्रिक मूल्यों की बलि नहीं देता है। सद्विप्रों का अधिनायक तंत्र वस्तुतः एक ऐसा नैतिक एवं आध्यात्मिक नियंत्रण है जो आर्थिक लोकतंत्र की नींव को सुदृढ़ करता है, जिससे शोषण रहित समाज की स्थापना संभव हो पाती है।

हम तानाशाही नहीं एक आदर्श अधिनायक तंत्र में विश्वास करते हैं, जो व्यक्ति के नेतृत्व में नहीं सामूहिक नेतृत्व की अवधारणा देता है। 

प्रस्तुति : आनन्द किरण
स्वधर्म एवं परधर्म                     (Self dharm and other dharm)

      आनन्द किरण
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आज विषय मिला है -स्वधर्म एवं परधर्म। स्व: शब्द का अर्थ अपना तथा पर शब्द का अर्थ पराया। अतः सरल अर्थ में विषय हो गया अपना धर्म एवं पराया धर्म। धृ धातु के मन प्रत्यय लगने से धर्म शब्द बना है। जिसका अर्थ सत्ता के अनुरूप भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक तथ्यों को धारण करना। कुछ उदाहरण के द्वारा विषय थोड़ा सरल बनाया जा सकता है। पूजा करने की वृत्ति धारण करने वाला पूजारी कहलाता है। उसी प्रकार तपस्या वृत्ति वाला तपस्वी, सैन्य वृत्ति वाला सैनिक, चौर्य वृत्ति वाला चोर, डाक डालने वाला डाकू। अतः धर्म सदैव स्व: से जुड़ा रहता है। जब धर्म को स्व: से पृथक कर दिया जाए तो स्व: छिन्न भिन्न हो जाता है। अब हमने स्व, पर एवं धर्म शब्द को जान लिया इसलिए विषय को अधिक अच्छी तरह से समझ सकते हैं। 

स्व शब्द‌ -  स्व: अथवा स्वयं का अथवा अपना शब्द पर ओर अधिक समझने की कोशिश करते हैं। अपना अर्थात मेरा एक वचन में तथा हमारा बहुवचन में। सबसे पहले एक वचन पर ध्यान देते अपना अर्थात मेरा। अतः वाक्य पूरा हुआ मेरा धर्म। प्रश्न मेरा धर्म क्या है? उत्तर - सबसे पहले बताओ कि मैं कौन हूँ। जब तक मनुष्य 'मैं' अर्थात स्वयं से परिचित नहीं है तब तक 'मेरा धर्म क्या है' का उत्तर प्राप्त नहीं कर सकता है। अतः 'मैं' को समझने के लिए निकलते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि 'मैं' का सूक्ष्मत्तम एवं गहनतम अर्थ है लेकिन हमारा विषय आध्यात्मिक नहीं, सामाजिक है, इसलिए सामाजिक दृष्टि से ही मैं समझने की कोशिश करेंगे। सामाजिक अथवा जागतिक दृष्टि से 'मैं' मनुष्य के लिए व्यवहार हुआ है। अर्थात मैं मनुष्य हूँ। चूंकि हम गाय, भैंस सिंह इत्यादि नहीं है। इसलिए 'मैं' का अर्थ मनुष्य ही हुआ। अर्थात मनुष्य का धर्म मेरा अपना धर्म स्वधर्म हुआ। जो धर्म मनुष्य का नहीं है, वह पराया धर्म अर्थात परधर्म हुआ। 

मनुष्य का धर्म क्या है? 

 चूंकि मनुष्य का धर्म ही मेरे तथा हमारे लिए स्वधर्म है इसलिए विषय कहता है कि मनुष्य का धर्म क्या है समझ लिजीए स्वधर्म का सबसे बड़ा शोधपत्र तैयार हो जाएगा। सर्वप्रथम मनुष्य शब्द का अर्थ समझते हैं - मनु धातु से मनुष्य शब्द आया है। जिसका अर्थ है - मन प्रधान प्राणी। प्राणी जगत में एकमात्र मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जिसका मन प्रधान है। शेष सभी प्राणियों के लिए शरीर प्रधान है। चूंकि मन का कार्य मननशीलता है। इसलिए मनुष्य शब्द का अर्थ हुआ, मननशील प्राणी। इससे सरल शब्द में चिन्तनशील अथवा विचारशील भी कह देते हैं। अतः मनुष्य के धर्म को समझने के मनुष्य शब्द की परिभाषा पर जोर देना आवश्यक है। मननशीलता मनुष्य का प्रधान गुणधर्म है। इसलिए मनुष्य की मननशीलता की ओर चलते हैं। मनुष्य की जन्मजात मननशीलता समग्र है। किसी भी प्रकार का भेद जनित मननशीलता मनुष्य की नहीं है। अतः जहाँ अपना-पराया, तेरा-मेरा का भेद है, वहाँ मनुष्य नहीं है। अतः मनुष्य का धर्म सार्वभौमिक एवं सर्वांगीण है। उसमें जाति, क्षेत्र, साम्प्रदायिक भेद जनित करना मनुष्य के धर्म छेद करना अथवा सेंधमारी है। अतः कोई जाति, देश, क्षेत्र तथा साम्प्रदाय मनुष्य का स्वधर्म नहीं है। मनुष्य का स्वधर्म मानव धर्म है। जिसे प्रथम स्तर पर पर हम मानवता कहते हैं। लेकिन सूक्ष्म दार्शनिक अर्थ में मानवता भी मनुष्य के स्वधर्म में नहीं समाती है। उसके लिए समग्र सृष्टि अपनी हैं। जैव तथा अजैव सत्ता उसकी अपनी है। अतः सभी के गुणधर्म की रक्षा करना ही मनुष्य का स्वधर्म है। अतः मानव धर्म के लिए उपयुक्त नवीन शब्द नव्य मानवता अथवा नव्य मानवतावाद दिया गया है। अतः हम कह सकते हैं कि मनुष्य का स्वधर्म नव्य मानवतावाद है। जिसमें सृष्ट व असृष्ट जगत के सभी तथ्य तथा उनके प्रति उत्तरदायित्व समाविष्ट है। अतः मनुष्य के स्वधर्म को परिभाषित करते समय जाति, क्षेत्र अथवा सम्प्रदाय का बोध कराने वाली युक्ति मनुष्य शब्द के साथ छेड़छाड़ करती है। अतः इस प्रकार के विषय के सभी तथाकथित धर्म के नाम परिचय देने वाले शब्द मनुष्य के परधर्म है, जो उसकी पहचान जाति, क्षेत्र एवं सम्प्रदाय के रूप में देते हैं। चूंकि हम समझ गए है कि मनुष्य का स्वधर्म क्या है, इसलिए मानव धर्म के बारें में विस्तार से जानना हमारा कर्तव्य है। 

मानव धर्म - धर्म मनुष्य को परिपूर्णता के पथ पर ले चलता है। इसलिए संस्कृत में वृहद प्रणिधान को मनुष्य का धर्म बताया गया है। वृहद अर्थात विराटता अथवा समग्र व्यापकता। अतः संकीर्णता में मानव धर्म नहीं रह सकता है। मानव धर्म को रहने के लिए जातिगत, क्षेत्रगत, साम्प्रदायिकगत संकीर्णता से उपर उठना होगा। मानव धर्म अर्थात मनुष्य को समग्र व्यापकता के पथ ले चलने वाले तथ्य मानव धर्म है। अतः शास्त्र में मानव धर्म के चार स्तंभ निर्धारित किये है। यह विस्तार, रस, सेवा एवं तद स्थित है। अब हम इन चारों को समझने की कोशिश करते हैं। 

विस्तार - मनुष्य वृहद बनना चाहता है। इसे संस्कृत में विराट तथा अंग्रेजी में Greatness कहते हैं। मनुष्य के धर्म का प्रथम स्तंभ विस्तार हैं। चूंकि मनुष्य का शरीरगत विस्तार एक विज्ञान है। अतः उसे अधिक विस्तार नहीं दिया जा सकता है। मन का विस्तार संभव है। अतः मन को सभी प्रकार की कुंठा से उपर उठाना ही मनुष्य का के मन विस्तार देना है। मनुष्य के मन को इतना बड़ा बनाया जा सकता है कि उसमें किसी भी प्रकार संकीर्णता नहीं रहती है। जो जातिगत , क्षेत्रगत एवं सम्प्रदायगत चिन्तन में संभव नहीं है। आत्मा समग्र शब्द है। इसलिए उसका विस्तार नहीं किया जाता है। जब मन माया के बंधन से हटकर आत्मा में विलीन हो जाता है, उस अवस्था का नाम परमात्मा है। इसलिए आत्मा सो परमात्मा कहा जाता है। 

रस - मानव धर्म का दूसरा स्तंभ रस को बताया गया है। यदि मनुष्य का विस्तार रसमय नहीं है तो निरस विस्तार कोई नहीं चाहेगा। अतः मनुष्य के विस्तार के साथ रस अथवा आनन्द का होना आवश्यक है। अतः मनुष्य के मन की गति का विज्ञान कहता है कि प्रत्येक मनुष्य अनन्त सुख की ओर गतिमान है। संस्कृत में अनन्त सुख के आनन्द शब्द का व्यवहार हुआ। अतः मनुष्य के व्यापकता की वह यात्रा जो मनुष्य आनन्दमय परिवेश दे। जिसे भक्ति शास्त्र में रस विज्ञान के द्वारा खुब अधिक स्पष्ट किया है। अतः कहा जाता है कि जिस भजन में रस न हो वह भजन नहीं गाना चाहिए। भेद में आनन्द नहीं मिलता है। 

सेवा - मानव धर्म का चतुर्थ तृतीय स्तंभ सेवा है। आनन्दमय विस्तार की यात्रा को जब सेवा से सिंचा जाता है तब धर्म वास्तविक रहता है। अन्यथा काल्पनिक अथवा पलायनवादी हो जाता है। अतः सेवा मनुष्य का धर्म व्रत है। नृयज्ञ, भूतयज्ञ, देवयज्ञ एवं आध्यात्मिक यज्ञ के नाम से मनुष्य की सेवा को सभी प्रकार की संकीर्णता मुक्त करके समझाया गया है। यज्ञ शब्द का अर्थ कर्म है। हवन, आहुति इत्यादि से यज्ञ का संबंध एक मत की अवधारणा है।जिसका सेवा से संबंध नहीं है। शरीर से, धन से, रक्षा करके तथा सत् शिक्षा देकर सतपथ दिखाकर सेवा की जाती है,इसलिए सेवा के चार वर्ग बताए गए हैं। अतः सेवा मनुष्य निर्माण का तृतीय स्तंभ है। मानव धर्म का तृतीय स्तंभ है। 

तदस्थिति - संस्कृत शब्द तदस्थिति का अर्थ वैसे स्थिति जैसी मनुष्य की होनी चाहिए। मनुष्य की स्थिति है। पूर्णत्व की प्राप्ति। पूर्णत्व को आध्यात्म में परमात्मा पद कहा गया है। अतः नर को नारायण रुप में प्रकट करना तदस्थिति है। धर्म, मनुष्य की वह गति है जो उसे भगवान बना देती है। अतः भगवान स्थिति प्राप्त करने को धर्म का चतुर्थ स्तंभ बताया गया है। अतः कहा गया है जहाँ भेद है वहाँ भगवान रहते हैं। अतः भगवान बनने के लिए भेद रहित अवस्था को तदस्थिति कहा गया है। 

मनुष्य का धर्म मानवधर्म के चतुष्पाद है। जो विस्तार, रस, सेवा एवं तदस्थिति के नाम से जाने जाते हैं। चूंकि मनुष्य की गति पूर्णत्व की है। जिसे सरल अर्थ में भगवद प्राप्ति है अतः संस्कृत में मानव धर्म को भावगत अर्थ में भागवत धर्म कहते हैं। भागवत शब्द का अर्थ वैष्णव संप्रदाय अथवा हिन्दू इत्यादि से लेना नही चाहिए। भगवद्गीता अथवा कोई भी शास्त्र समग्र मानवता के लिए लिखे गए हैं, उन्हें संस्कृत में भागवत शास्त्र कहते हैं। जहाँ संकीर्णता मुक्त है, वही  भागवत धर्म, भागवत शास्त्र रहते हैं। भागवत धर्म ही मानव धर्म है, ऐसा नहीं है - मनुष्य के धर्म का दुनिया सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत में भागवत अर्थ में भागवत धर्म कहा गया है। अतः मनुष्य के धर्म के लिए संस्कृत शब्द भागवत धर्म है। भागवत धर्म में मनुष्य की सोच नव्य मानवतावादी रहती है। जहाँ नव्य मानवतावाद से कम स्वीकार्य नहीं है।