हस्तिनापुर का वास्तविक उत्तराधिकारी कौन : युधिष्ठिर अथवा दुर्योधन?

हस्तिनापुर का वास्तविक उत्तराधिकारी कौन: युधिष्ठिर अथवा दुर्योधन?

​आज हम इतिहास के एक ऐसे शाश्वत प्रश्न पर विचार करने जा रहे हैं, जो महाभारत के महाविनाशकारी युद्ध का मूल कारण बना। वास्तव में उत्तराधिकार का यह विवाद युधिष्ठिर और दुर्योधन से भी पहले, उनके पिताओं—पांडु एवं धृतराष्ट्र के काल से ही अंकुरित हो चुका था। इसलिए जब तक हम "पांडु बनाम धृतराष्ट्र" के मूल प्रश्न को नहीं सुलझा लेते, तब तक अंतिम प्रश्न का तार्किक उत्तर मिलना असंभव है।

​सत्यवती के निर्णय और कुरुवंश का संकट

​महाराज शांतनु इस यक्ष प्रश्न का उत्तर तलाशने का अधिकार माता सत्यवती को सौंपकर स्वर्ग सिधार गए थे। अतः इतिहास के इस मोड़ पर सत्यवती द्वारा समय-समय पर दिए गए विकल्पों पर गौर करना अत्यंत आवश्यक है:

  • तात्कालिक समाधान (चित्रांगद): सत्यवती ने पहला तात्कालिक उत्तर 'चित्रांगद' के रूप में दिया। [श्री] आनंद किरण "देव" के शोध के अनुसार, चित्रांगद कोई सामान्य मानव नहीं, बल्कि उस युग का एक 'यांत्रिक मानव' (रोबोट) था, जिसे व्यासपीठ के उच्च कोटि के अभियंताओं (Engineers) द्वारा तैयार किया गया था।
  • दीर्घकालिक समाधान (विचित्रवीर्य): दूसरा दीर्घकालिक उत्तर  [श्री] आनंद किरण "देव" के शोध के अनुसार व्यासपीठ के चिकित्साचार्यों द्वारा निर्मित एक विशेष वीर्य 'जैविक विकल्प' (क्लोन मनुष्य) के रूप में सामने आया, जिसे अंबिका, अंबालिका और दासी (परिष्री) के गर्भ में विशेष वैज्ञानिक विधि से स्थापित किया गया। इस प्रकार 'विचित्रवीर्य' का प्राकट्य हुआ, जिसने कुरुवंश की टूटी हुई वंशधारा को आगे बढ़ाया।

​चूंकि ये दोनों व्यवस्थाएं भी हस्तिनापुर के स्थायित्व के लिए पर्याप्त नहीं थीं, इसलिए धृतराष्ट्र और पांडु में से किसी एक योग्य शासक का चयन करना माता सत्यवती के अधिकार क्षेत्र में था। सत्यवती ने राजगुरुओं के साथ गहनतम मंत्रणा के बाद 'पांडु' को राजा घोषित कर अपने इस महान उत्तरदायित्व से मुक्ति पा ली थी। अतः महाभारत के युद्ध का दोष माता सत्यवती के सिर मढ़ना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।

​धृतराष्ट्र: प्रतिनिधि के प्रतिनिधि

​महाराज पांडु कुरुवंश में दोबारा उत्तराधिकार का संकट खड़ा होने से पहले ही इस धरा को छोड़ गए। ध्यान देने योग्य पेच यह है कि पांडु ने अपनी अनुपस्थिति में धृतराष्ट्र को हस्तिनापुर का 'राजा' नहीं, बल्कि केवल एक 'प्रतिनिधि' (Regent) नियुक्त किया था। अतः पांडु के देहावसान के बाद हस्तिनापुर का सिंहासन तकनीकी और व्यावहारिक रूप से रिक्त ही था।

​यदि तत्कालीन भारतवर्ष के राजशाही संविधान का अध्ययन करें, तो स्वयं राजा भी राज्य का स्वामी (निधिपति) नहीं, बल्कि प्रजा का 'प्रतिनिधि' मात्र होता था। इस दृष्टि से धृतराष्ट्र 'एक प्रतिनिधि के प्रतिनिधि' थे। इसलिए धृतराष्ट्र का कोई भी निर्णय तभी वैध माना जा सकता था, जब उसे हस्तिनापुर के जनमानस, सेना, मंत्रिमंडल और कुलगुरु (कृपाचार्य व भीष्म) की सामूहिक सहमति प्राप्त हो। यह व्यवस्था तत्कालीन उच्च संवैधानिक मर्यादा को रेखांकित करती है।

​जनभावना बनाम धृतराष्ट्र की महत्वाकांक्षा

​अब हम अंतिम उत्तर के सबसे निकट हैं। हस्तिनापुर की प्रजा, चतुरंगिणी सेना, मंत्रिमंडल और कुलगुरु—सभी सर्वसम्मति से न्यायप्रिय युधिष्ठिर के पक्ष में थे। दूसरी ओर, केवल धृतराष्ट्र की व्यक्तिगत पुत्र-मोह से ग्रसित महत्वाकांक्षा दुर्योधन के पक्ष में खड़ी थी।

महाभारत का मूल द्वंद्व: यहाँ दुविधा यह पैदा हुई कि तत्कालीन व्यवस्था में 'रिटर्निंग ऑफिसर' (अंतिम हस्ताक्षरकर्ता) के रूप में बैठे धृतराष्ट्र के भीतर चल रहा द्वंद्व—एक तरफ पिता की अंधी महत्वाकांक्षा और दूसरी तरफ हस्तिनापुर की प्रबल जनभावना—ही अंततः महाभारत के युद्ध का मुख्य सूत्रधार बना।


​निष्कर्ष

​चूंकि धृतराष्ट्र अपनी इस संवैधानिक और नैतिक मर्यादा को बनाए रखने में पूरी तरह विफल रहे, इसलिए अंततः इस प्रश्न का अंतिम उत्तर स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण को देना पड़ा। धृतराष्ट्र की महत्वाकांक्षा की स्याही जब फीकी पड़ गई, तब श्रीकृष्ण ने महाभारत के मैदान में एक रक्तरंजित इतिहास लिखकर यह सिद्ध कर दिया कि हस्तिनापुर के वास्तविक और वैध उत्तराधिकारी केवल और केवल युधिष्ठिर ही थे।

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