प्रउत के अनुसार रुपये के मूल्य में गिरावट का समाधान
'हमारा रुपया, हमारी शक्ति'
रुपया को केवल कागज़ नहीं माना जा सकता, बल्कि यह एक संप्रभु गारंटी पर आधारित एक सांकेतिक मुद्रा है। भारतीय रुपये की कीमत अक्सर डॉलर के मुकाबले कमजोर मानी जाती है, जिससे भारत के आयात बिल और विदेशी ऋण पर असर पड़ता है।
प्रउत (Prout - Progressive Utilization Theory) के अनुसार, इस समस्या का समाधान करने के लिए मुद्रा और अर्थव्यवस्था की मूल संरचना में बदलाव करना आवश्यक है।
प्रउत के अनुसार कमजोर होते रुपये का समाधान : आर्थिक क्रांति
प्रउत की आर्थिक व्यवस्था में, मुद्रा की कमजोरी और अस्थिरता को दूर करने के लिए दो मुख्य रणनीतियाँ हैं: उत्पादकता आधारित मुद्रा (Productivity-Based Currency) और स्थानीय आर्थिक विकेंद्रीकरण (Decentralized Economy)।
1. उत्पादकता-आधारित मुद्रा (Stabilizing the Rupee)
"उत्पादन की शक्ति, कमजोर होते रुपये की युक्ति।"
प्रउत यह मानता है कि मुद्रा का मूल्य किसी विदेशी मुद्रा (जैसे डॉलर) के बजाय देश के आंतरिक भौतिक धन (उत्पादन, प्राकृतिक संसाधन, और सेवाएँ) से जुड़ा होना चाहिए।
- मूल्य स्थिरीकरण: रुपये को देश के उत्पादन के कुल मूल्य (Total Production Value) से जोड़ा जाना चाहिए।
- परिणाम: इससे रुपये का मूल्य देश की वास्तविक संपत्ति पर आधारित होगा। जब देश का उत्पादन बढ़ेगा, रुपये का मूल्य भी स्वाभाविक रूप से मजबूत होगा, जिससे डॉलर के मुकाबले इसकी कमजोरी कम होगी।
2. क्रय शक्ति और न्यूनतम आवश्यकता की गारंटी
"न्यूनतम आवश्यकताएँ सबकी, गारंटी क्रय शक्ति की।"
प्रउत का केंद्रीय सिद्धांत यह है कि हर व्यक्ति को जीवन की न्यूनतम आवश्यकताएँ (Minimum Necessities of Life) मिलनी चाहिए।
- गारंटीड क्रय शक्ति: प्रउत सरकार गारंटी देगी कि एक रुपये की न्यूनतम क्रय शक्ति (Minimum Purchasing Power) हमेशा बनी रहेगी।
- कंट्रोल ऑन एसेंशियल गुड्स: आवश्यक वस्तुओं की कीमतें नियंत्रित की जाएंगी, जिससे महंगाई का प्रभाव कम होगा और रुपये की आंतरिक क्रय शक्ति बनी रहेगी।
- परिणाम: जब रुपये की आंतरिक क्रय शक्ति मजबूत और गारंटीड होगी, तो विदेशी निवेशक भी इस मुद्रा पर अधिक भरोसा करेंगे, जिससे डॉलर के मुकाबले रुपये को मजबूती मिलेगी।
3. विकेन्द्रीकृत आर्थिक व्यवस्था (Reducing Dependency on Dollar)
"आत्मनिर्भर क्षेत्र बनाओ, डॉलर का वर्चस्व घटाओ।"
डॉलर की तुलना में रुपये की कमजोरी का एक मुख्य कारण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अत्यधिक निर्भरता है। प्रउत इसका समाधान क्षेत्रीय आत्म-निर्भरता से करता है।
- सामाजिक आर्थिक ब्लॉक : देश को छोटे-छोटे आत्मनिर्भर सामाजिक आर्थिक क्षेत्रों (सोशियो-इकोनॉमिक यूनिट्स) में बाँटा जाएगा।
- स्थानीय उत्पादन: इन क्षेत्रों का प्राथमिक लक्ष्य स्थानीय आवश्यकताओं के लिए स्थानीय रूप से उत्पादन करना होगा, जिससे आयात पर निर्भरता कम होगी और डॉलर की माँग भी घटेगी।
- विदेशी मुद्रा का सीमित उपयोग: विदेशी मुद्रा का उपयोग केवल अपरिहार्य आयातों के लिए किया जाएगा।
- परिणाम: डॉलर पर निर्भरता कम होने से, रुपये की कीमत अंतर्राष्ट्रीय विनिमय दरों के उतार-चढ़ाव से कम प्रभावित होगी। प्रउत का मत : एक ऐसा रुपया जो उत्पादन से चले, अटकलों से नहीं।
संक्षेप में: प्रउत के अनुसार समाधान यह है कि रुपये को देश के उत्पादन और भौतिक धन की वास्तविक गारंटी बनाकर, और अर्थव्यवस्था को स्थानीय रूप से आत्म-निर्भर बनाकर, डॉलर के मुकाबले इसकी कमजोरी को दूर किया जा सकता है।
प्रस्तुति : करण सिंह शिवतलाव
प्रकाशन सचिव, प्राउटिस्ट सर्व समाज
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