१/१४ चित्तात् गुणावक्षये रजोगुणप्राबल्ये अहम् । (AS-1/14)

१/१४ चित्तात् गुणावक्षये रजोगुणप्राबल्ये अहम् ।

भावार्थ :- पुरूषोत्तम के आकर्षण के कारण चित्तधातु जब विद्याशक्ति के प्रभाव से क्रमशः बढ़ चलती है तब ​उसके ऊपर से तमोगुण का प्राधान्य क्रमशः ह्रासप्राप्त होता है तथा रजोगुण का प्राबल्य परिदृष्ट होता रहता है। चित्तदेह के जिस अंश में इस रजोगुण का प्राबल्य परिदृष्ट होता है उसे ही अहंतत्त्व या कर्तृत्वयुक्त मैं या स्वामित्वयुक्त मैं (Doer I or owner I) कहा जाता है।



सूत्र का विश्लेषण 

​१. मूल सूत्र

​चित्तात् गुणावक्षये रजोगुणप्राबल्ये अहम् ।

(Cittát guńávakśaye rajoguńaprábalye aham.)


​२. पदच्छेद (Word Segmentation)

​व्याकरणिक नियमों के अनुसार सूत्र को पृथक पदों में विभाजित करने पर निम्नलिखित चार पद प्राप्त होते हैं:

  • ​चित्तात्

  • ​गुणावक्षये (गुण + अवक्षये)

  • ​रजोगुणप्राबल्ये (रजोगुण + प्राबल्ये)

  • ​अहम्

​३. सम्पूर्ण व्याकरणगत शब्दार्थ एवं शास्त्रीय व्याख्या

​पद १: चित्तात्

  • ​प्रकृति (मूल शब्द): चित्त (नपुंसकलिंग)

  • ​विभक्ति एवं वचन: पंचमी विभक्ति, एकवचन (अपादान कारक — 'उत्पत्ति स्थान' या उपादान कारण के अर्थ में)

  • ​व्युत्पत्ति (Etymology):

    • ​चित्त: चित् (संज्ञाने/चेतना) + क्त (प्रत्यय)। इसका दार्शनिक अर्थ मानस-धातु या वस्तुनिष्ठ मन (Ectoplasm / Mind-stuff) है।

  • ​व्याकरणगत अर्थ: चित्त से, या चित्त धातु में से (Out of or from the citta)। यहाँ पंचमी विभक्ति यह दर्शाती है कि परवर्ती तत्त्व का जन्म पूर्ववर्ती चित्त से हो रहा है।

​पद २: गुणावक्षये

  • ​प्रकृति (मूल शब्द): गुणावक्षय (पुल्लिंग)

  • ​विभक्ति एवं वचन: सप्तमी विभक्ति, एकवचन (अधिकरण कारक — निमित्त या अवस्था सूचक 'होने पर' के अर्थ में)

  • ​संधि विच्छेद: गुण + अवक्षये = गुणावक्षये (यहाँ 'ण' के 'अ' और 'अवक्षय' के 'अ' के मेल से 'आ' हुआ है, अतः यहाँ दीर्घ स्वर संधि है)।

  • ​व्युत्पत्ति (Etymology):

    • ​गुण: गुण् (आमन्त्रणे/बंधने) + अच् (प्रत्यय)। इसका अर्थ है प्राकृतिक बंधनकारी शक्तियाँ (Binding attributes)।

    • ​अवक्षय: अव (उपसर्ग) + क्षि (क्षये/नष्ट होना) + घञ्/अच् (प्रत्यय)। इसका अर्थ है क्रमिक ह्रास, न्यूनता या घटना (Waning/Diminution)।

  • ​समास विग्रह:

    • ​गुणानाम् अवक्षयः = गुणावक्षयः (षष्ठी तत्पुरुष समास)।

    • ​तस्मिन् = गुणावक्षये (सप्तमी विभक्ति रूपांतरण)।

  • ​व्याकरणगत अर्थ: गुणों के (बंधनकारी) प्रभाव का ह्रास या क्षय होने पर (With the waning influence of the guṇas)।

​पद ३: रजोगुणप्राबल्ये

  • ​प्रकृति (मूल शब्द): रजोगुणप्राबल्य (नपुंसकलिंग)

  • ​विभक्ति एवं वचन: सप्तमी विभक्ति, एकवचन (अधिकरण कारक — भाव लक्षण में सप्तमी, अर्थात् 'ऐसी दशा उत्पन्न होने पर')

  • ​संधि विच्छेद: रजस् + गुण = रजोगुण (यहाँ सकार का रुत्व और उत्व होकर 'ओ'कार हुआ है, अतः यहाँ उत्व विसर्ग संधि है)।

  • ​व्युत्पत्ति (Etymology):

    1. ​रजस् (रजो): रञ्ज (रागे/क्रियाशीलता) + असुन् (प्रत्यय)। इसका अर्थ है क्रियाशील या परिवर्तक शक्ति (Mutative principle / Active attribute)।

    2. ​प्राबल्य: प्र (उपसर्ग) + बल + यञ् (प्रत्यय, भाव अर्थ में)। इसका अर्थ है प्रबलता, प्रधानता या आधिक्य (Predominance/Dominance)।

  • ​समास विग्रह:

    1. ​रजो एव गुणः = रजोगुणः (कर्मधारय समास)।

    2. ​रजोगुणस्य प्राबल्यम् = रजोगुणप्राबल्यम् (षष्ठी तत्पुरुष समास)।

    3. ​तस्मिन् = रजोगुणप्राबल्ये।

  • ​व्याकरणगत अर्थ: रजोगुण की प्रधानता या प्रबलता होने पर (When rajoguṇa becomes dominant)।

​पद ४: अहम्

  • ​प्रकृति (मूल शब्द): अस्मद् (उत्तम पुरुष सर्वनाम शब्द)

  • ​विभक्ति एवं वचन: प्रथमा विभक्ति, एकवचन (कर्ता पद / मुख्य संज्ञा रूप)

  • ​व्युत्पत्ति (Etymology):

    • ​दार्शनिक व्याकरण में यह 'अहंतत्त्व' का वाचक है। इसका अर्थ है कर्त्तृत्व बोध, 'मैं'-पन, अथवा कर्ता मन (Ego-tattva / Doer "I" / Subjective mind)।

  • ​व्याकरणगत अर्थ: 'अहं' तत्त्व या कर्ता भाव का प्रादुर्भाव होता है (The 'Aham' or sense of doership evolves)।



​४. व्याकरणगत संरचना सारांश (Grammatical Structure Summary)

पद (Word)

मूल शब्द (Base Word)

लिंग / विभक्ति / वचन (Gender/Vibhakti/Vacana)

प्रयुक्त संधि / समास (Sandhi / Samasa)

विशुद्ध शाब्दिक अर्थ (Literal Meaning)

चित्तात्

चित्त

नपुंसकलिंग / पंचमी / एकवचन

चित्त से (उत्पत्ति का आधार)

गुणावक्षये

गुणावक्षय

पुल्लिंग / सप्तमी / एकवचन

दीर्घ स्वर संधि एवं षष्ठी तत्पुरुष समास

गुणों के प्रभाव का ह्रास होने पर

रजोगुणप्राबल्ये

रजोगुणप्राबल्य

नपुंसकलिंग / सप्तमी / एकवचन

उत्व विसर्ग संधि एवं द्विगुणित समास

रजोगुण की प्रबलता होने पर

अहम्

अस्मद्

सर्वनाम / प्रथमा / एकवचन

अहंतत्त्व (कर्ता 'मैं' का बोध)




"चित्त से (जड़ता लाने वाले) गुणों का ह्रास होने पर और रजोगुण की प्रधानता होने पर 'अहम्' (कर्ता 'मैं' अर्थात् अहंतत्त्व) का प्रादुर्भाव होता है।"




भावार्थ का गहनतम एवं विस्तृत अध्ययन पत्र

​भूमिका: चेतना की ऊर्ध्वगामी यात्रा (The Upward Evolution of Mind)

​पिछले त्रयोदश सूत्र में हमने देखा कि किस प्रकार जड़ पदार्थ (Matter) के भीतर घर्षण से 'चित्ताणुओं' का निर्माण होता है और पहली बार वस्तुनिष्ठ मन या चित्त (Citta / Done I) का जन्म होता है। यह चतुर्दश (14वाँ) सूत्र जीव-मन के उद्विकास (Evolution) के अगले और अत्यंत महत्वपूर्ण चरण को वैज्ञानिक रूप से रेखांकित करता है। यह सूत्र बताता है कि प्रकृति की शक्तियों के खेल के परिणामस्वरूप मन किस प्रकार केवल एक 'संवेदना ग्रहण करने वाले यंत्र' (Passive Receiver) से उठकर एक 'सक्रिय कर्ता' (Active Agent) के रूप में रूपांतरित होता है।

​यह प्रतिसंचर (Pratisainchara) की वह अवस्था है जहाँ जीव-चेतना जड़ता के पाश को काटकर स्वतंत्रता की ओर कदम बढ़ाती है।

​गहन दार्शनिक एवं आध्यात्मिक विश्लेषण

​१. पुरुषोत्तम का आकर्षण और विद्याशक्ति का प्रभाव

​इस सूत्र के दर्शन को समझने के लिए इसके मूल प्रेरक बल को समझना अनिवार्य है। ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित परम चेतना, जिन्हें 'पुरुषोत्तम' (Cosmic Nucleus) कहा जाता है, प्रत्येक जीव और कण को अपनी ओर निरंतर आकर्षित कर रही हैं।

  • ​जब यह आकर्षण जीव पर पड़ता है, तो प्रकृति की 'विद्याशक्ति' (Involutive or Introverting Force) सक्रिय हो जाती है।

  • ​विद्याशक्ति का कार्य है — जीव को जड़ता से मुक्त करके सूक्ष्मता (Spirituality) की ओर ले जाना।

  • ​विद्याशक्ति के इसी प्रभाव के कारण मन की आंतरिक संरचना (चित्तधातु) में एक भारी उथल-पुथल शुरू होती है।

​२. गुणावक्षय: तमोगुण का क्रमिक ह्रास (Waning of the Static Attribute)

​चित्त (Citta) मुख्य रूप से तमोगुण (Static Principle) के प्रभाव में रहता है। तमोगुण का स्वभाव है — जड़ता, संकोचन, भारीपन और गतिहीनता। इसी कारण चित्त स्वयं कोई निर्णय नहीं ले पाता, वह केवल बाह्य प्रभावों को प्रतिबिंबित करता है।

  • ​जैसे-जैसे विद्याशक्ति का प्रभाव बढ़ता है, चित्त के ऊपर से तमोगुण का यह बंधनकारी प्रभाव क्रमशः घटने लगता है। इसी स्थिति को सूत्र में 'गुणावक्षये' कहा गया है।

  • ​यहाँ 'गुण' का मुख्य संदर्भ 'तमोगुण' से है। तमोगुण के ह्रास होने का अर्थ है कि मन के भीतर की जड़ता और अंधकार अब कम हो रहा है, और वह अधिक सूक्ष्म तरंगों को ग्रहण करने के लिए स्वतंत्र हो रहा है।

​३. रजोगुणप्राबल्य: क्रियाशीलता का उदय (Dominance of the Mutative Attribute)

​जैसे ही तमोगुण का नियंत्रण ढीला पड़ता है, वैसे ही प्रकृति का दूसरा गुण — रजोगुण (Mutative Principle) मन के धरातल पर हावी हो जाता है।

  • ​रजोगुण का स्वभाव है — गति, क्रियाशीलता, संघर्ष, और तरंग पैदा करना।

  • ​जब चित्तधातु (Ectoplasmic stuff) पर रजोगुण का यह प्रचंड प्रभाव पड़ता है, तो मन के भीतर एक तीव्र छटपटाहट, एक 'गति' उत्पन्न होती है। मन अब केवल शांत रहकर दृश्यों को देखना नहीं चाहता, बल्कि वह उन दृश्यों पर अपनी प्रतिक्रिया देना चाहता है।

​४. 'अहम्' (Ahamtattva) का प्रादुर्भाव: 'मैं कर्ता हूँ' का बोध

​रजोगुण की इस प्रबलता (रजोगुणप्राबल्ये) के परिणामस्वरूप चित्त के भीतर से एक नए और उच्चतर मानसिक कोश का जन्म होता है, जिसे 'अहम्' (Ego-tattva / Subjective Mind) कहते हैं।

  • ​Done I से Doer I का सफर: चित्त का स्तर केवल यह अनुभव करता था कि "मुझे भूख लगी है" या "यह दृश्य सुंदर है" (यहाँ मन विषय या Object था)। लेकिन जैसे ही 'अहं' जागृत होता है, जीव के भीतर यह बोध आता है कि "मैं खाऊँगा", "मैं यह कार्य करूँगा", या "यह मेरा है"।

  • ​इसीलिए दर्शन में अहंतत्त्व को 'Doer I' (कर्ता मैं) या 'Owner I' (स्वामी मैं) कहा जाता है। यहाँ जीव पहली बार अपने अस्तित्व को एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में महसूस करता है।

​मनोवैज्ञानिक एवं व्यावहारिक रहस्य

​चित्त और अहं का अंतर्संबंध (The Interplay of Citta and Aham)

​व्यावहारिक मनोविज्ञान की दृष्टि से यह सूत्र अत्यंत महत्वपूर्ण सत्य उद्घाटित करता है। 'अहं' और 'चित्त' का आकार एक दूसरे पर निर्भर करता है:

​यदि मनुष्य के भीतर 'अहं' (इच्छाशक्ति या कर्ता भाव) अत्यधिक कमजोर हो, तो उसका चित्त भटकता रहता है। लेकिन जब रजोगुण के प्रभाव से अहं बलवान होता है, तो वह चित्त को अपने नियंत्रण में ले लेता है।


  • ​उदाहरण: जब आप कोई संकल्प लेते हैं कि "मैं यह कार्य सिद्ध करूँगा", तो यह आपके 'अहं' (Doer I) की हुंकार होती है। इस हुंकार के सामने चित्त (जो केवल इच्छाओं का पुलिंदा है) शांत हो जाता है और अहं के निर्देशानुसार काम करने लगता है।

  • ​परंतु यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि रजोगुण जनित यह अहं यदि आध्यात्मिक मार्ग पर न मुड़े, तो यह 'अहंकार' (Vanity/Pride) का रूप ले लेता है, जो पतन का कारण बन सकता है। इसीलिए विद्याशक्ति का आकर्षण इसे आगे और सूक्ष्मतर स्तर (महत्तत्त्व) की ओर ढकेलता है, जिसकी चर्चा अगले सूत्र में आती है।

​निष्कर्ष (Philosophical Essence)

​आनन्द सूत्रम् का यह १४वाँ सूत्र यह स्थापित करता है कि मानसिक विकास कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि यह त्रिगुणात्मक प्रकृति का एक निश्चित वैज्ञानिक क्रम है।

  • ​जड़ पदार्थ में तमोगुण चरम पर होता है।

  • ​चित्त (Citta) में तमोगुण घटने लगता है और चेतना का पहला आभास होता है।

  • ​अहम् (Aham) में तमोगुण अत्यंत गौण हो जाता है और रजोगुण की प्रधानता के कारण 'सक्रिय चेतना' या 'इच्छाशक्ति' का जन्म होता है।

​यह सूत्र मानव को उसकी असीमित आंतरिक क्षमता का अहसास कराता है। यह संदेश देता है कि मनुष्य केवल परिस्थितियों का दास (Passive Citta) नहीं है; उसके भीतर 'अहं' की वह दिव्य अग्नि है जो रजोगुण के पुरुषार्थ से अविद्या के बंधनों को छिन्न-भिन्न कर सकती है।

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