आनन्द मार्ग - (प्रारंभिक दर्शन)
धर्म क्या है?
इकाई 1
धर्म की मूल अवधारणा और अनन्त आनन्द की खोज
बिन्दु
1.1 विकसित चैतन्य और आनन्द की खोज: मनुष्य का विकसित चैतन्य, अच्छे-बुरे का निर्णय और दुःखों से मुक्ति पाने की स्वाभाविक प्रवृत्ति।
1.2 भौतिक सुखों की सीमाएँ: धन, मान, यश, पद और शक्ति अर्जित करने की असीम लालसा तथा पार्थिव वस्तुओं की सीमित प्रकृति।
1.3 मनुष्य की 'अनन्त क्षुधा': पार्थिव सुखों से अनन्त मन की अतृप्ति का कारण।
1.4 'धर्म' का वास्तविक अर्थ: धर्म की परिभाषा (सत्तागत विशेषता या गुण) और अग्नि के उदाहरण द्वारा धर्म का स्पष्टीकरण।
1.5 भूमा सत्ता और ब्रह्मोपलब्धि: केवल अनन्त/शाश्वत (ब्रह्म) से ही अनन्त क्षुधा की निवृत्ति और यही मनुष्य का सच्चा धर्म।
विस्तार
विकास के क्रम की चरम सीमा पर पहुँचकर मनुष्य के पास एक बहुत बड़ी शक्ति आ जाती है, और वह है उसका विकसित चैतन्य। इसी विकसित चैतन्य के बल पर मनुष्य अच्छे और बुरे का निर्णय करता है तथा जीवन की विपत्तियों से मुक्ति पाने का मार्ग ढूँढता है। दुनिया का हर जीव यही चाहता है कि उसका जीवन दुःख और दुर्दशा से मुक्त रहे, और प्रतिकार करने में सक्षम विकसित-चैतन्य मनुष्य तो ऐसा बिल्कुल ही नहीं चाहता कि वह दुखी रहे। वास्तव में, मनुष्य का मूल स्वभाव ही है—आनन्द को ढूँढ़ना।
किन्तु प्रश्न यह उठता है कि इस आनन्द की प्राप्ति के लिए मनुष्य क्या करता है और क्या उसे सचमुच आनन्द मिलता है?
आनन्द की इस खोज में मनुष्य सबसे पहले इस संसार की पार्थिव और भौतिक वस्तुओं की ओर आकृष्ट होता है। वह अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए धन का संचय करता है, शक्ति और प्रभाव अर्जित करने में जुट जाता है। लेकिन ये सारी चीजें उसे वास्तविक आनन्द नहीं दे पातीं। जिसकी जेब में आज सौ रुपये हैं, वह एक हजार पाना चाहता है; जिसके पास एक हजार हैं, वह लाखों का मालिक बनना चाहता है। इच्छाओं की यह दौड़ कभी खत्म नहीं होती। जो व्यक्ति अपने जिले में प्रभावशाली है, वह पूरे प्रदेश में प्रभावशाली बनना चाहता है; प्रादेशिक नेता राष्ट्रनेता बनना चाहता है और राष्ट्रनेता बनने के बाद उसके मन में विश्व नेता बनने की वासना जाग उठती है।
यह सीमित सम्पत्ति, यश, शक्ति और प्रभाव मनुष्य की वासनाओं को शांत नहीं करते, बल्कि उसके भोग की वृत्ति को और अधिक बढ़ा देते हैं। इसके कारण मनुष्य की 'अनन्त क्षुधा' हमेशा अतृप्त ही रह जाती है। आप कितना भी धन पा लें, अनन्त सुख के प्यासे मानव मन को वह कभी पूरी तरह तृप्त नहीं कर सकता। कारण यह है कि यह पृथ्वी स्वयं एक सीमित सत्ता है, और इस पर मिलने वाली सभी भौतिक वस्तुएँ भी सीमित हैं। किसी सीमित चीज़ को अनन्त रूप में पाना असंभव है। इसलिए पार्थिव प्राप्ति चाहे जितनी बड़ी क्यों न हो—चाहे पूरा भूमंडल ही क्यों न मिल जाए—वह कभी शाश्वत नहीं हो सकती।
तो फिर वह शाश्वत सत्ता क्या है जो मनुष्य को चिरन्तन और सच्चा सुख दे सकती है?
वह है—भूमा सत्ता यानी अनन्त एवं शाश्वत ब्रह्म। केवल उसी की उपलब्धि से मनुष्य की अनन्त क्षुधा की आत्यंतिक निवृत्ति संभव है। इस नश्वर और सीमित संसार के मान, ऐश्वर्य और शक्ति ने हमें यह सिखा दिया है कि सान्त और सीमित पृथ्वी की किसी भी वस्तु से अनन्त सुख पाने की हमारी इच्छा कभी हमेशा के लिए तृप्त नहीं हो सकती। यह तृप्ति केवल उस विभुसत्ता 'ब्रह्म' की प्राप्ति से ही संभव है। वास्तव में, मनुष्य की हर अनन्त भोगवासना के पीछे उस ब्रह्मोपलब्धि की इच्छा ही प्रच्छन्न रूप से छिपी होती है। इसीलिए, ब्रह्मोपलब्धि ही मनुष्य का वास्तविक धर्म है और जीवमात्र का यही स्वभाव है।
यहाँ 'धर्म' शब्द का बहुत ही सुंदर अर्थ समझाया गया है। धर्म का अर्थ है—सत्तागत विशेषता या गुण, जिसका अंग्रेजी प्रतिशब्द 'characteristic' या 'nature' है। जैसे अग्नि का धर्म या स्वभाव जलाना है, अग्नि और उसकी दाहकता को कभी अलग नहीं किया जा सकता, ठीक उसी प्रकार मनुष्य और उसके भीतर की ब्रह्मोपलब्धि की इच्छा एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकती। यही हमारा मूल स्वभाव और धर्म है।
इकाई 2
मनुष्य और पशु जीवन का तुलनात्मक विश्लेषण
बिन्दु
2.1 मानव जीवन में द्विमुखी गति: जड़ाभिमुखी (पशुत्व की ओर) और सूक्ष्माभिमुखी (चैतन्य/विवेक की ओर) गतियाँ।
2.2 पशु और मनुष्य की भोगवृत्ति में अंतर: पशुओं की सीमित आवश्यकता बनाम मनुष्य की अनन्त भोगलालसा।
2.3 विवेक और पशुत्व का संघर्ष: जागतिक भोगों और ब्रह्माभिमुखी प्रेरणा के बीच मन का द्वंद्व।
2.4 चैतन्य का सदव्यवहार और मानव धर्म: विवेकहीन आचरण से मनुष्य का पशुवत होना तथा 'मानव धर्म / विश्वमतवाद' की स्थापना।
विस्तार
सृष्टि के क्रमविकास (evolution) की धारा को यदि हम देखें, तो मानव जीवन का विकास पशु जीवन से ही हुआ है। इसी कारण मानव जीवन के भीतर एक विशेष बात दिखाई देती है—वृत्ति की द्विमुखी गति।
एक ओर मनुष्य की 'जड़ाभिमुखी गति' (भौतिक दिशा) है, जो उसे नीचे पशुत्व की ओर खींचती है। दूसरी ओर उसकी 'सूक्ष्माभिमुखी गति' है, जो उसे पशुता के बंधनों से मुक्त करके सूक्ष्मता एवं परम चैतन्य की ओर ले जाती है। पशु जीवन में केवल पशुत्व का ही व्यापक प्रसार होता है, लेकिन मानव जीवन में चैतन्य का अधिकाधिक विकास होने के कारण विचार, तर्क और विवेक का महत्त्व परिलक्षित होता है।
अब आइए, पशु और मनुष्य की भोगवृत्ति के मूल अंतर को समझें। पशुओं की आवश्यकताएँ और उनकी भोग-इच्छाएँ सीमित होती हैं। एक पशु का पेट भर जाए, तो वह अपनी आवश्यकता से अधिक भोजन या भोग्य वस्तुओं को ग्रहण नहीं करता। उसकी तृप्ति सीमित वस्तुओं से हो जाती है। किन्तु मनुष्य का स्वभाव ऐसा नहीं है। मनुष्य की भोगलालसा अनन्त है। मनुष्य का विकसित चैतन्य ही इन दोनों के बीच यह अंतर पैदा करता है, जिसके कारण मनुष्य की अनन्त भूख नश्वर सीमित पार्थिव सुख-ऐश्वर्य से नहीं मिटती।
इसी वजह से मनुष्य के भीतर पशुत्व और विवेक के बीच निरंतर एक संघर्ष चलता रहता है। मनुष्य का पशुत्व उसे सांसारिक और जागतिक भोगों की ओर धकेलता है, जबकि उसका अतृप्त और जागृत विवेक उसे ब्रह्म की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। यदि संसार की भोग-सामग्रियाँ असीम और अनन्त होतीं, तो वे विवेक की अनन्त क्षुधा को तृप्त कर सकती थीं। परन्तु ये पार्थिव वस्तुएँ सीमित हैं, इसीलिए दुनिया के नश्वर भोगों की चरम सीमा भी मनुष्य को शाश्वत शांति प्रदान नहीं कर पाती।
बंधुओं! इस अंतर को समझना ही मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य है। चैतन्य का व्यापक विकास ही मनुष्य और पशु में भेद बताता है। यदि मनुष्य अपने इस चैतन्य या विवेक का सदुपयोग न करे और केवल पशुत्व में ही लीन रहे, तो उसका आचरण पशु के समान हो जाएगा। वास्तव में, ऐसा व्यक्ति पशु से भी अधम है, क्योंकि चैतन्य का व्यापक विकास पाकर भी वह इस सुयोग का लाभ नहीं उठा पाता। ऐसे सभी व्यक्ति केवल मानव शरीर में पशु ही हैं।
हमारे चैतन्य का सच्चा धर्म यही है कि हम उस अखण्ड सत्ता ब्रह्म को पाने का निरंतर प्रयास करें। इच्छा की परिपूर्ति ही आनंद है और इच्छित वस्तु न मिलने पर मन दुःख से भर जाता है। विकसित चैतन्य ही मनुष्य को पशुता से मुक्त करता है और ब्रह्मोपलब्धि के मार्ग पर चलाता है। इसीलिए, अनन्त या ब्रह्म की उपलब्धि में संलग्न होना ही 'मानव धर्म' या 'विश्वमतवाद' है, जिसके अनुशीलन से ही मनुष्य शाश्वत सुख और परम शांति पा सकता है।
इकाई 3
मन की कार्यप्रणाली और विषय-ग्रहण (Sensory Perception)
बिन्दु
3.1 इन्द्रियाँ बनाम मन: 10 इन्द्रियाँ केवल कार्य का माध्यम हैं, जबकि कर्म का यथार्थ कर्त्ता 'मन' है।
3.2 मन की निष्क्रियता के प्रभाव: बेख्याली या अचेतन अवस्था में इन्द्रियों का काम न करना।
3.3 तन्मात्र (Tanmatra) की परिभाषा: इन्द्रियों के माध्यम से सूक्ष्म तरंगों का मानस-पट पर ग्रहण होना।
3.4 विषय-ग्रहण की प्रक्रिया: चक्षु, स्पर्श और श्रवणेन्द्रिय के माध्यम से चित्त का विषय-रूप धारण करना।
विस्तार
सामान्यता आपात दृष्टि से हम अपनी दस इन्द्रियों को ही अपने सभी कार्यों का कर्ता समझ बैठते हैं। लेकिन गहराई से विचार करने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इन्द्रियाँ स्वयं कोई कार्य नहीं कर सकतीं। कर्म का वास्तविक कर्ता हमारा मन है और इन्द्रियाँ केवल उसके प्रकटीकरण का माध्यम मात्र हैं। उदाहरण के लिए, जब हम कोई पुस्तक पढ़ते हैं, तो आँखें नहीं, बल्कि आँखों के माध्यम से मन ही पढ़ने का कार्य करता है।
यदि मन निष्क्रिय हो जाए या इन्द्रिय से अलग हट जाए, तो आँखें खुली रहने पर भी हमें कुछ दिखाई नहीं देता। जैसे बेहोश करने वाली औषधि देने पर शरीर के सारे अंग-प्रत्यंग और इन्द्रियाँ ठीक रहने पर भी निष्क्रिय हो जाते हैं। अक्सर हम देखते हैं कि जब हम किसी गहन विचार में डूबे होते हैं, तो सामने खड़े अपने मित्र को भी नहीं पहचान पाते या पहचानने में देर कर देते हैं। इसका एकमात्र कारण यही है कि कर्म का वास्तविक कर्ता—मन—उस समय निष्क्रिय या अनवधान (बेख्याल) था।
अब प्रश्न यह उठना स्वाभाविक है कि कर्म का वास्तविक कर्ता मन इन्द्रियों के माध्यम से बाहरी विषयों को ग्रहण कैसे करता है?
इसे समझने के लिए हमें 'तन्मात्र' के सिद्धांत को समझना होगा। इन्द्रियों के माध्यम से किसी भी स्थूल वस्तु के सूक्ष्मतम रूप को हमारे मानस-पट पर ग्रहण करना ही 'तन्मात्र' कहलाता है। हमारे चारों ओर की वस्तुओं से निरंतर तन्मात्र की तरंगें प्रवाहित होती रहती हैं।
उदाहरण के लिए, जब आँखें किसी वस्तु को देखती हैं, तो 'रूप तन्मात्र' की तरंगें आँखों के माध्यम से हमारे चित्त को स्पंदित करती हैं। इस संघर्ष के फलस्वरूप मन का वह अंश जो आकृति ग्रहण करता है—जिसे चित्त कहते हैं—स्वयं उस वस्तु का रूप धारण कर लेता है। आँखें बंद रहने पर भी अंधकार में हम स्पर्श के द्वारा 'स्पर्श तन्मात्र' से वस्तु को पहचान लेते हैं। इसी प्रकार जब हमारा अहंतत्त्व ("मैं करता हूँ" वाला भाव) कुछ सुनना चाहता है, तो चित्त कानों के सानिध्य में आकर 'शब्द तन्मात्र' ग्रहण करता है और स्वयं शब्द-स्वरूप हो जाता है।
अर्थात् अहंतत्त्व जैसा चाहता है या करता है, चित्त वही रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार हमारे सभी कार्यों का बाहरी प्रकाश चित्त के इसी रूपांतरण पर निर्भर करता है।
इकाई 4
मन की आंतरिक संरचना (Layers of Mind / Antahkarana)
बिन्दु
4.1 चित्त (Chitta): बाहर की वस्तु या भाव का आकार ग्रहण करने वाला मन का स्थूलतम अंश।
4.2 अहंतत्त्व (Ahamtattva): "मैं करता हूँ" (कर्म का कर्त्ता 'मैं') का बोध कराने वाला अंश।
4.3 महत्तत्त्व / बुद्धितत्त्व (Mahattattva): "मैं हूँ" (अस्तित्व-बोध या आत्म-बोध) कराने वाला अंश।
4.4 अन्तःकरण का समग्र रूप: चित्त, अहंतत्त्व और महत्तत्त्व का सामूहिक समन्वय।
विस्तार
पिछली चर्चा में हमने समझा कि मन इन्द्रियों के माध्यम से बाहरी जगत के विषयों को ग्रहण करता है। अब आइए, मन की इस अद्भुत आंतरिक संरचना और उसके तीन प्रमुख स्तरों को गहराई से समझें, जिसे दर्शनशास्त्र में 'अन्तःकरण' कहा गया है।
हमारा यह मन वास्तव में तीन प्रमुख अंशों या परतों से मिलकर बना है—चित्त, अहंतत्त्व और महत्तत्त्व।
1. चित्त (Chitta):
जब हम किसी वस्तु को देखते, सुनते या सोचते हैं, तो मन का स्थूलतम अंश उस वस्तु की आकृति या स्वरूप को धारण कर लेता है। मन के इसी अंश को 'चित्त' कहते हैं। उदाहरण के लिए, पुस्तक को देखते समय मन का एक हिस्सा स्वयं पुस्तक का आकार ले लेता है। किन्तु चित्त स्वयं कोई क्रिया नहीं कर सकता, यह केवल आकृति ग्रहण करने का कार्य करता है।
2. अहंतत्त्व (Ahamtattva):
जब चित्त किसी वस्तु का आकार धारण कर लेता है, तो उसे देखने और अनुभव करने का काम मन का दूसरा अंश करता है, जिसे 'अहंतत्त्व' कहते हैं। यही अहंतत्त्व हमारे भीतर "मैं करता हूँ" या "मैं देखता हूँ" की भावना जगाता है। चित्त किस वस्तु का रूप धारण करेगा, यह भी इसी अहंतत्त्व की इच्छा और निर्देश पर निर्भर होता है।
3. महत्तत्त्व / बुद्धितत्त्व (Mahattattva):
अब विचार कीजिए कि यदि "मैं हूँ" का मूल भाव ही न रहे, तो "मैं देखता हूँ" या "मैं काम करता हूँ" कैसे संभव होगा? इसीलिए मन का तीसरा और सबसे सूक्ष्म अंश है—'महत्तत्त्व' (बुद्धितत्त्व)। यह हमारे भीतर "मैं हूँ" का आत्म-बोध या अस्तित्व-बोध उत्पन्न करता है। इस अस्तित्व-बोध के बिना कोई भी ज्ञान या कर्म संभव ही नहीं है।
अन्तःकरण का समग्र रूप:
इस प्रकार, चित्त (वस्तु का रूप लेने वाला), अहंतत्त्व (कार्य करने वाला 'मैं') और महत्तत्त्व ("मैं हूँ" का बोध कराने वाला 'मैं')—इन तीनों का सामूहिक एवं समन्वित रूप ही मन या अन्तःकरण है। मन के सभी कार्य और भाव इन्हीं तीनों अंशों की क्रमिक अभिव्यक्ति हैं।
इकाई 5
आत्मा (अणुचैतन्य) और प्रकृति (Atman & Prakriti)
बिन्दु
5.1 मन से परे साक्षी 'मैं': मन के पीछे 'ज्ञाता', 'द्रष्टा' या 'साक्षी' के रूप में अणुचैतन्य/आत्मा।
5.2 आत्मा और मन का भिन्न अस्तित्व: अणुचैतन्य और मन का अंतर तथा उनका परस्पर संबंध।
5.3 प्रकृति (Prakriti) का स्वरूप: प्र + कृ + क्तिन्, आत्मा को गुणान्वित करने वाली क्रियाशील शक्ति।
5.4 आत्मा और प्रकृति का अविभाज्य संबंध: अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति के उदाहरण से प्रकृति की स्थिति।
विस्तार
चित्त, अहंतत्त्व और महत्तत्त्व के सामूहिक रूप को हमने मन के रूप में समझा। लेकिन अब प्रश्न यह उठता है कि क्या मन ही सब कुछ है, या मन के पीछे भी कोई सत्ता विद्यमान है?
गहराई से विचार करने पर पता चलता है कि मन के भीतर "मैं हूँ" का अस्तित्व-बोध कराने वाले 'मैं' के पीछे भी एक 'ज्ञाता', 'द्रष्टा' या 'अधिकारी मैं' मौजूद है, जो मन से परे है। वही हमारे सभी कर्मों का वास्तविक कर्त्ता है और मन का अस्तित्व भी उसी पर निर्भर करता है। मन के इसी द्रष्टा 'मैं' को दर्शनशास्त्र में अणुचैतन्य या आत्मा कहा गया है।
सूक्ष्म रूप से विचार करें, तो अणुचैतन्य (आत्मा) और मन—ये दो पृथक सत्ताएँ हैं। पृथक सत्ताएँ होने के बावजूद ये दोनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। मन का कार्य करने वाला अंश (अहंतत्त्व), विषय का रूप धारण करने वाला अंश (चित्त) और "मैं हूँ" का बोध कराने वाला अंश (महत्तत्त्व)—ये सभी उस साक्षी 'आत्मा' की उपस्थिति के कारण ही संभव हो पाते हैं। आत्मा ही वह साक्षी सत्ता है जो इस पूरे मन को चेतना और अस्तित्व प्रदान करती है।
अब आइए समझें कि प्रकृति (Prakriti) क्या है?
आत्मा भिन्न-भिन्न रूपों में कार्य करने के गुण से गुणान्वित होती है। जिस सत्ता या शक्ति के कारण आत्मा गुणान्वित होकर महत्तत्त्व आदि स्थूल रूपों में अभिव्यक्त होती है, उसी को 'प्रकृति' कहते हैं। 'प्रकृति' शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के प्र + कृ + क्तिन् से हुई है, जिसका अर्थ है—विशेष रूप से प्रकार-भेद या विविध सृष्टि करना। इसलिए प्रकृति स्वयं कोई गुण नहीं, बल्कि आत्मा को गुणान्वित करने वाली एक विशेष क्रियाशील शक्ति है।
आत्मा और प्रकृति का अविभाज्य संबंध:
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह प्रकृति किसकी शक्ति है? प्रकृति आत्मिक शक्ति ही है और आत्मिक सत्ता में ही इसकी अवस्थिति होती है।
इसे समझाने के लिए अग्नि का सुंदर उदाहरण दिया गया है। जैसे अग्नि और उसकी जलाने की शक्ति (दाहिका शक्ति) को कभी एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता, ठीक उसी प्रकार आत्मा और प्रकृति का संबंध भी पूर्णतः अविभाज्य है। प्रकृति के प्रभाव के बिना अणुचैतन्य (आत्मा) का अस्तित्व अभिव्यक्त नहीं होता और आत्मा के अभाव में प्रकृति की कोई स्थिति नहीं देखी जाती।
इस प्रकार, आत्मा वह परम साक्षी चैतन्य है और प्रकृति वह क्रियाशील शक्ति है जो उस चैतन्य को विविध रूपों में अभिव्यक्त करती है।
इकाई 6
त्रिगुण और मन का क्रमिक विकास (Evolution of Mind through 3 Gunas)
बिन्दु
6.1 सत्त्वगुण (Sattvaguna): अणुचैतन्य में "मैं हूँ" (महत्तत्त्व) के अस्तित्व-बोध की सृष्टि।
6.2 रजोगुण (Rajoguna): महत्तत्त्व से "मैं करता हूँ" (अहंतत्त्व) का विकास।
6.3 तमोगुण (Tamoguna): अहंतत्त्व का कर्म-फल के रूप में 'चित्त' में रूपांतरण।
6.4 कर्मफल का सिद्धांत: अहंतत्त्व की इच्छा और चित्त का रूपांतरण।
विस्तार
अब तक हमने मन की तीन परतों (चित्त, अहंतत्त्व और महत्तत्त्व) तथा आत्मा व प्रकृति के संबंध को समझा। अब प्रश्न यह उठता है कि निरंजन और निराकार आत्मा से इस मन का निर्माण और विकास कैसे होता है?
इसी रहस्य को समझने के लिए प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण—के प्रभाव को जानना आवश्यक है। इन्हीं तीन गुणों के बन्धन के कारण अणुचैतन्य (आत्मा) क्रमिक रूप से मन के विभिन्न स्तरों में विकसित होता है।
1. सत्त्वगुण (Sattvaguna) और महत्तत्त्व की सृष्टि:
जब प्रकृति का सत्त्वगुण अणुचैतन्य (आत्मा) पर अपना प्रभाव डालता है, तो उस साक्षी चैतन्य में सबसे पहले "मैं हूँ" का अस्तित्व-बोध जाग उठता है। सत्त्वगुण के प्रभाव से ही अणुचैतन्य के भीतर महत्तत्त्व या बुद्धितत्त्व का निर्माण होता है। यह मन की सबसे सूक्ष्म अवस्था है, जहाँ केवल अपने होने का बोध (I am-ness) रहता है।
2. रजोगुण (Rajoguna) और अहंतत्त्व का विकास:
अब जब इस बुद्धितत्त्व (महत्तत्त्व) पर प्रकृति के रजोगुण का प्रभाव पड़ता है, तो केवल "मैं हूँ" का शांत बोध ही नहीं रहता, बल्कि कार्य करने का गुण और चंचलता उत्पन्न होती है। रजोगुणी प्रभाव से बुद्धितत्त्व स्वयं विकसित होकर अहंतत्त्व का रूप ग्रहण कर लेता है। यहाँ "मैं करता हूँ" या "मैं क्रियाशील हूँ" का भाव पैदा होता है।
3. तमोगुण (Tamoguna) और चित्त का निर्माण:
जब अहंतत्त्व किसी कार्य को करता है या किसी विषय की इच्छा करता है, तो उस पर प्रकृति के तमोगुण का प्रभाव पड़ता है। तमोगुणी प्रभाव के कारण अहंतत्त्व अपने कर्म के फल का रूप ग्रहण कर लेता है, जिसे चित्त कहा जाता है।
4. कर्मफल और मन का रूपांतरण:
प्रत्येक कर्म का फल निश्चित रूप से होता है। अहंतत्त्व जिस समय जो इच्छा करता है, चित्त उसी विषय के आकार में ढल जाता है। उदाहरण के लिए, जब अहंतत्त्व पुस्तक को देखता है, तो चित्त स्वयं पुस्तक का आकार धारण कर लेता है; जब वह कोई शब्द सुनता है, तो चित्त शब्द-स्वरूप हो जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि चित्त धातु की पूरी संरचना अहंतत्त्व की इच्छा पर ही निर्भर करती है।
निष्कर्ष:
इस प्रकार, मौलिक सत्ता अणुचैतन्य (आत्मा) ही प्रकृति के सत्त्वगुण से प्रभावित होकर 'महत्तत्त्व' ("मैं हूँ"), रजोगुण से 'अहंतत्त्व' ("मैं करता हूँ"), और तमोगुण से 'चित्त' (विषय/आकृति) के रूप में क्रमिक रूप से स्थूलता को प्राप्त करता है।
इकाई 7
परमात्मा / ब्रह्म की अवधारणा (Concept of Brahma)
बिन्दु
7.1 व्यष्टि आत्मा और समष्टि चैतन्य: संसार में असंख्य व्यष्टि मन और उनका मूल आधार।
7.2 परमात्मा / भूमाचैतन्य (Universal Soul): सभी अणुचैतन्यों का सामूहिक रूप ही ब्रह्म, भगवान या परमात्मा है।
7.3 साकार भगवान की धारणा का खंडन: हाथ-पैर वाले मनुष्य-रूपी भगवान के स्थान पर ब्रह्म को अनन्त 'भूमाचैतन्य' स्वीकार करना।
विस्तार
अब तक के चिंतन में हमने यह समझा कि प्रत्येक व्यष्टि (व्यक्ति/जीव) में मन का विकास दिखाई देता है और इस मन के पीछे अणुचैतन्य या आत्मा की उपस्थिति अनिवार्य है। इस संसार में असंख्य व्यष्टि मन और असंख्य जीव हैं, जिससे प्रतीत होता है कि आत्माएँ अनेक हैं।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या ये सभी आत्माएँ एक-दूसरे से पूर्णतः भिन्न और कटी हुई हैं? या इनका भी कोई मूल आधार है?
दर्शनशास्त्र समझाता है कि इन सभी पृथक प्रतीत होने वाली व्यष्टि आत्माओं (अणुचैतन्यों) का सामूहिक और समष्टि रूप ही परमात्मा, भूमाचैतन्य, ब्रह्म या भगवान है।
इसे एक बहुत ही सरल और व्यावहारिक उदाहरण से समझा जा सकता है—जैसे १२ वस्तुओं के समूह को हम 'एक दर्जन' कहते हैं, २० को 'एक बीस' कहते हैं और बहुसंख्यक सैनिकों के समूह को 'सैन्यदल' कहा जाता है। ठीक उसी प्रकार, इस ब्रह्मांड के समस्त अणुचैतन्यों के सामूहिक रूप को ही परमात्मा, भूमाचैतन्य या ब्रह्म कहा जाता है। अंग्रेजी भाषा में 'आत्मा' के निकटतम शब्द के रूप में 'soul' का प्रयोग होता है, इसलिए भगवान का वास्तविक अर्थ 'Universal Soul' या भूमाचैतन्य ही है।
इस दार्शनिक सत्य को समझ लेने के बाद भगवान के बारे में हमारी एक बहुत बड़ी भ्रांति दूर हो जाती है। प्रायः मनुष्य भगवान की कल्पना हाथ-पैर वाले किसी अति-शक्तिशाली मनुष्य के रूप में कर लेता है, किन्तु ऐसी कल्पना करना एक भूल है।
भगवान कोई आकार या व्यक्ति विशेष नहीं हैं, बल्कि वे सर्वव्यापी अनन्त भूमाचैतन्य (Universal Consciousness) हैं। वे ही परम ब्रह्म हैं और वे ही आनन्दस्वरूप हैं।
निष्कर्ष:
इस प्रकार, अपने सीमित अहंतत्त्व और मन की सीमाओं को लांघकर उस अनन्त भूमाचैतन्य (परमात्मा) के साथ एकाकार होना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य और सच्चा 'मानव धर्म' है।
धर्म क्या है?
एक प्रश्नोत्तरी
प्रश्न: मनुष्य किस क्षमता के कारण अच्छा-बुरा निर्णय करने में सक्षम है?
उत्तर: मनुष्य अपने विकसित चैतन्य के कारण अच्छा-बुरा निर्णय करने तथा विपत्ति से मुक्ति पाने का मार्ग ढूँढने में सक्षम है।
प्रश्न: मनुष्य का मूल स्वभाव क्या है?
उत्तर: मनुष्य का मूल स्वभाव ही आनन्द को ढूँढ़ना है।
प्रश्न: आनन्द की खोज में मनुष्य सर्वप्रथम किस ओर आकृष्ट होता है?
उत्तर: आनन्द की खोज में मनुष्य सर्वप्रथम सांसारिक एवं पार्थिव भोगों की ओर आकृष्ट होता है।
प्रश्न: क्या धन, यश, शक्ति और पद से मनुष्य की इच्छाओं की निवृत्ति हो सकती है?
उत्तर: नहीं, सीमित संपत्ति, यश, शक्ति और प्रभाव मनुष्य की वासनाओं को शांत नहीं कर पाते, बल्कि वे भोग की वृत्ति को और अधिक बढ़ा देते हैं।
प्रश्न: मनुष्य की 'अनन्त क्षुधा' सांसारिक वस्तुओं से अतृप्त क्यों रह जाती है?
उत्तर: पृथ्वी स्वयं एक सीमित सत्ता है और इस पर निर्मित सभी वस्तुएँ सीमित हैं, इसलिए अनन्त सुख चाहने वाला मानव मन सीमित पार्थिव वस्तुओं से कभी तृप्त नहीं हो सकता।
प्रश्न: मनुष्य की अनन्त क्षुधा की आत्यन्तिक निवृत्ति किस सत्ता से सम्भव है?
उत्तर: अनन्त क्षुधा की आत्यन्तिक निवृत्ति केवल अनन्त एवं शाश्वत 'भूमा सत्ता' (ब्रह्म) की उपलब्धि से ही सम्भव है।
प्रश्न: 'धर्म' शब्द का वास्तविक अर्थ और इसका अंग्रेजी प्रतिशब्द क्या है
उत्तर: 'धर्म' शब्द का अर्थ सत्तागत विशेषता या गुण है, और इसका अंग्रेजी प्रतिशब्द 'characteristic', 'property' या 'nature' है।
प्रश्न: मानव जीवन में वृत्ति की द्विमुखी गति कौन-कौन सी है?
उत्तर: मानव जीवन में दो गतियाँ होती हैं: 'जड़ाभिमुखी गति' जो उसे नीचे पशुत्व की ओर खींचती है, और 'सूक्ष्माभिमुखी गति' जो उसे पशुत्व से मुक्त कर सूक्ष्मता की ओर ले जाती है।
प्रश्न: पशु और मनुष्य की भोगवृत्ति में क्या मुख्य अंतर है?
उत्तर: पशु की भोगलालसा सीमित होती है और वह अपनी आवश्यकता से अधिक ग्रहण नहीं करता, जबकि मनुष्य की भोगलालसा अनन्त होती है।
प्रश्न: मनुष्य के भीतर पशुत्व और विवेक का क्या संघर्ष रहता है?
उत्तर: पशुत्व मनुष्य को जागतिक भोगों की ओर धकेलता है, जबकि उसका जागृत विवेक उसकी ब्रह्माभिमुखी गति को बनाए रखता है।
प्रश्न: कौन से व्यक्ति मानव शरीर में पशु के समान कहे गए हैं?
उत्तर: जो व्यक्ति चैतन्य का व्यापक विकास पाकर भी उसका सदुपयोग नहीं करते और जिनका आचरण पशुत्व में ही लीन रहता है, वे मानव शरीर में पशु के समान हैं।
प्रश्न: 'मानव धर्म' या 'विश्वमतवाद' किसे कहा गया है?
उत्तर: अनन्त या ब्रह्म की उपलब्धि करना ही 'विश्वमतवाद' या 'मानव धर्म' है।
प्रश्न: कर्म का यथार्थ कर्त्ता कौन है और इन्द्रियों का क्या स्थान है?
उत्तर: कर्म का यथार्थ कर्त्ता 'मन' है, इन्द्रियाँ केवल उसके माध्यम के रूप में कार्य करती हैं।
प्रश्न: मन के बेख्याल या निष्क्रिय होने पर इन्द्रियों की क्या स्थिति होती है? उत्तर: मन के निष्क्रिय होने पर इन्द्रियाँ स्वयं कोई काम नहीं कर सकतीं और उनका स्वाभाविक कार्य बंद हो जाता है।
प्रश्न: 'तन्मात्र' किसे कहते हैं?
उत्तर: इन्द्रियों के माध्यम से किसी भी स्थूल वस्तु के सूक्ष्मतम रूप को मानस पट पर ग्रहण करना 'तन्मात्र' कहलाता है।
प्रश्न: मन या अन्तःकरण के तीन प्रमुख अंश कौन-कौन से हैं?
उत्तर: मन या अन्तःकरण के तीन अंश हैं: चित्त, अहंतत्त्व और महत्तत्त्व।
प्रश्न: 'चित्त' का क्या कार्य है? उत्तर: चित्त मन का वह स्थूलतम अंश है जो तन्मात्र के सहारे बाहरी वस्तु या भाव की आकृति धारण करता है।
प्रश्न: 'अहंतत्त्व' का क्या कार्य है?
उत्तर: अहंतत्त्व मन का वह क्रियाशील अंश है जो कार्य करने और "मैं करता हूँ" का भाव उत्पन्न करने का कार्य करता है।
प्रश्न: 'महत्तत्त्व' (बुद्धितत्त्व) का क्या कार्य है?
उत्तर: महत्तत्त्व मन का वह सूक्ष्म अंश है जो मनुष्य में "मैं हूँ" का अस्तित्व-बोध या आत्म-बोध उत्पन्न करता है।
प्रश्न: 'अणुचैतन्य' या 'आत्मा' किसे कहते हैं? उत्तर: मन के भीतर अस्तित्व-बोध कराने वाले 'मैं' के पीछे जो 'ज्ञाता', 'द्रष्टा' या 'अधिकारी मैं' (मन से परे 'मैं') है, उसे अणुचैतन्य या आत्मा कहते हैं।
प्रश्न: क्या आत्मा और मन एक ही हैं?
उत्तर: नहीं, सूक्ष्म रूप से विचार करने पर अणुचैतन्य (आत्मा) और मन दो पृथक सत्ताएँ हैं।
प्रश्न: 'प्रकृति' क्या है और इसकी शब्द-व्युत्पत्ति क्या है?
उत्तर: प्रकृति वह क्रियाशील शक्ति है जिसके प्रभाव से आत्मा गुणान्वित होकर महत्तत्त्व आदि रूपों में अभिव्यक्त होती है। इसकी व्युत्पत्ति 'प्र + कृ + क्तिन्' से हुई है, जिसका अर्थ विशेष प्रकार से भेद या सृष्टि करना है।
प्रश्न: आत्मा और प्रकृति का सम्बन्ध किस उदाहरण द्वारा समझाया गया है?
उत्तर: आत्मा और प्रकृति का सम्बन्ध अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति के समान अविभाज्य बताया गया है।
प्रश्न: प्रकृति के तीनों गुणों से मन का विकास किस क्रम में होता है?
उत्तर:
सत्त्वगुण: अणुचैतन्य में "मैं हूँ" का बोध जगाकर 'महत्तत्त्व' (बुद्धितत्त्व) की सृष्टि करता है।
रजोगुण: बुद्धितत्त्व में कार्य करने की शक्ति उत्पन्न कर उसे 'अहंतत्त्व' में विकसित करता है।
तमोगुण: अहंतत्त्व को उसके कर्म-फल के रूप में 'चित्त' में परिणत करता है।
25. प्रश्न: 'परमात्मा', 'भूमाचैतन्य' या 'भगवान' का वास्तविक दार्शनिक अर्थ क्या है?
उत्तर: इस विश्व के सभी असंख्य अणुचैतन्यों (आत्माओं) के सामूहिक रूप को ही परमात्मा, भूमाचैतन्य, ब्रह्म या भगवान (Universal Soul) कहते हैं।
26. प्रश्न: हाथ-पैर युक्त मनुष्य-रूपी भगवान की अवधारणा को दार्शनिक दृष्टिकोण से भूल क्यों माना गया है?
उत्तर: क्योंकि भगवान कोई हस्त-पदयुक्त शक्तिशाली व्यक्ति नहीं, बल्कि समस्त अणुचैतन्यों का सामूहिक एवं सर्वव्यापी रूप (भूमाचैतन्य या universal soul) हैं।
मुख्य दार्शनिक शब्दावली
चैतन्य (Consciousness): विवेक और निर्णय लेने की वह सूक्ष्म चेतना, जो मनुष्य को अच्छे-बुरे का भेद कराती है और पशु से अलग बनाती है।
धर्म (Characteristic / Nature): किसी भी वस्तु या जीव की अपनी मूल सत्तागत विशेषता, गुण या स्वभाव (जैसे—अग्नि का धर्म जलाना है)।
भूमा सत्ता / ब्रह्म (Infinite Reality): वह सर्वव्यापी, अनन्त और शाश्वत सत्ता, जिसे पाने से मनुष्य की अनन्त इच्छाएँ और भूख सदा के लिए तृप्त हो जाती हैं।
तन्मात्र (Tanmatra): इन्द्रियों की सहायता से किसी बाहरी स्थूल वस्तु के सूक्ष्मतम रूप (तरंग) को मन के पटल पर ग्रहण करना।
अन्तःकरण (Inner Mind): मन का पूरा तंत्र या सामूहिक रूप, जो चित्त, अहंतत्त्व और महत्तत्त्व—इन तीनों अंशों से मिलकर बनता है।
चित्त (Chitta): मन का वह स्थूलतम भाग जो किसी वस्तु, दृश्य या शब्द की आकृति/आकार को स्वयं पर ग्रहण (copy) कर लेता है।
अहंतत्त्व (Ahamtattva / Doer-I): मन का वह क्रियाशील भाग जो मनुष्य में "मैं करता हूँ" या "मैं देखता हूँ" का कर्त्ता-भाव जगाता है।
महत्तत्त्व / बुद्धितत्त्व (Mahattattva / Being-I): मन का वह सबसे सूक्ष्म भाग जो केवल "मैं हूँ" का अस्तित्व-बोध या आत्म-बोध कराता है।
अणुचैतन्य / आत्मा (Unit Soul): मन के पीछे रहने वाला वह निर्लिप्त द्रष्टा, साक्षी या 'ज्ञाता मैं', जो मन को अस्तित्व और चेतना प्रदान करता है।
प्रकृति (Prakriti): वह क्रियाशील आत्मिक शक्ति जो आत्मा को गुणान्वित करके उसे मन और जगत के विविध रूपों में अभिव्यक्त करती है।
सत्त्वगुण (Sattvaguna): प्रकृति का वह गुण जो आत्मा में "मैं हूँ" (महत्तत्त्व) के अस्तित्व-बोध को जगाता है।
रजोगुण (Rajoguna): प्रकृति का वह गुण जो महत्तत्त्व में क्रियाशीलता उत्पन्न कर "मैं करता हूँ" (अहंतत्त्व) का निर्माण करता है।
तमोगुण (Tamoguna): प्रकृति का वह गुण जो अहंतत्त्व को उसके कर्मफल के रूप में 'चित्त' (आकृति/विषय) में बदल देता है।
भूमाचैतन्य / परमात्मा / भगवान (Universal Soul): इस ब्रह्मांड की समस्त व्यक्तिगत आत्माओं (अणुचैतन्यों) का सामूहिक या समष्टि रूप।
व्यष्टि और समष्टि (Individual vs. Cosmic): 'व्यष्टि' का अर्थ है व्यक्तिगत/अकेला (जैसे एक व्यक्ति या एक जीव का मन) और 'समष्टि' का अर्थ है उन सभी का सामूहिक रूप (जैसे परमात्मा)।
नोट : विषय विस्तार से समझने के लिए पुस्तक आनन्द मार्ग ( प्रारंभिक दर्शन) का अध्ययन करें - संपादक
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