षोडश विधि - CSDK
( आचरण संहिता, सेमिनार, कर्तव्य एवं कीर्तन)
षोडश विधि का सोलहवाँ अंग — “CSDK” -
C - आचरण संहिता (Conduct rule)
S - सेमिनार (Seminar) -विचारगोष्ठी
D - कर्तव्य (Duty)
K - कीर्तन (Kiir’tan)
(क)
"आचरण संहिता”
स्रोत संदर्भ: 'आनन्द मार्ग चर्याचर्य’ - भाग -02 व षोडश विधि
१. प्रस्तावना एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि
आनन्द मार्ग दर्शन के अनुसार केवल सैद्धांतिक एवं बौद्धिक आध्यात्मिक ज्ञान साधक की प्रगति के लिए पर्याप्त नहीं है। जब तक साधक का दैनिक व्यावहारिक जीवन कड़े नैतिक अनुशासन और उच्च आदर्शों में न ढला हो, तब तक मानसिक स्थिरता और आत्म-साक्षात्कार की दिशा में आगे बढ़ना संभव नहीं है।
आनन्द मार्ग की 'षोडश विधि' (Sixteen Points) का १६वाँ बिंदु चार भागों में विभक्त है, जिसमें (क) घटक 'आचरण संहिता' (Code of Conduct) है। आचरण संहिता केवल बाह्य नियमों की सूची नहीं है, अपितु यह साधक के आन्तरिक मानस-तत्व और बाह्य सामाजिक पर्यावरण के मध्य संतुलन एवं सुसंगति स्थापित करने वाला सेतु है।
समाज में नैतिकता के पतन का कारण एवं 'जीवन वेद' का अवदान
षोडश विधि के अनुसार, अतीत में यम और नियम जैसे नैतिक सिद्धान्तों की वैज्ञानिक, तर्कसंगत और व्यावहारिक व्याख्या के अभाव के कारण साधारण समाज उन्हें दैनिक जीवन में अपनाने में असमर्थ रहा। पारंपरिक धर्माचार्यों द्वारा नैतिकता को इतना कठोर, जटिल और अव्यावहारिक बना दिया गया था कि गृहस्थ साधकों ने यह मान लिया कि पारिवारिक व सामाजिक जीवन में धर्म-मार्ग पर चलना प्रायः असंभव ही है। इस मानसिक निराशा के परिणामस्वरूप समाज नास्तिकता, भौतिकतावादी भटकाव और नैतिक पतन की ओर उन्मुख हुआ।
श्री श्री आनन्दमूर्ति जी ने अपने युगांतकारी ग्रन्थ 'जीवन वेद' में यम-नियम तथा चर्याचर्य आचरण संहिता की अत्यंत विद्वत्तापूर्ण, विवेकसंगत और व्यावहारिक-वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि नैतिकता कोई संन्यासी-केन्द्रित दमनकारी नियम नहीं है, अपितु गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी शरीर, मन और समाज को सुचारू रूप से चलाने का स्वाभाविक विज्ञान है।
२. आचरण संहिता की चार-स्तरीय संरचना
आचरण संहिता को चार मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
यम (Yama): ५ सामाजिक-नैतिक नियम
नियम (Niyama): ५ व्यक्तिगत-आन्तरिक अनुशासन
पंचदशशील (Panchadash Shila): १५ शील व चरित्र-निर्माण के नियम
सामाजिक शिष्टाचार (Social Etiquette): ३९ व्यावहारिक जीवन के नियम
३. यम एवं नियम: नैतिक साधना के १० शाश्वत स्तम्भ
(संस्कृत सूत्र: अहिंसा सत्यास्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रहाः यमः)
(क) यम (Yama - ५ नियम):
यम बाह्य जगत् एवं समाज के साथ साधक के संबंधों को नियंत्रित करते हैं:
अहिंसा (Ahimsa): किसी भी प्राणी को काया, वाक् या मन से दुःख या पीड़ा न पहुँचाना।
सत्य (Satya): परम कल्याण की भावना से प्रेरित होकर यथार्थ एवं हितकारी वचन बोलना तथा आचरण करना।
अस्तेय (Asteya): स्थूल या सूक्ष्म रूप से किसी दूसरे के अधिकार या वस्तु का अनधिकृत हरण (चोरी) न करना।
ब्रह्मचर्य (Brahmacharya): समस्त जगत् व वस्तुओं में परम चेतना (ब्रह्म) का ही भाव रखते हुए मन को उसी में संस्थित रखना।
अपरिग्रह (Aparigraha): जीवन-यापन के लिए आवश्यकता से अधिक भौतिक संसाधनों का संग्रह न करना।
(ख) नियम (Niyama - ५ नियम):
नियम आन्तरिक शुद्धि और व्यक्तिगत साधना की नींव रखते हैं:
शौच (Shauca): बाह्य शौच (शरीर, वस्त्र व पर्यावरण की स्वच्छता) तथा आन्तरिक शौच (मन और विचारों की पवित्रता)।
सन्तोष (Santosha): न्यायसंगत एवं ईमानदार प्रयास के पश्चात प्राप्त फल में मानसिक तृप्ति व प्रसन्नता बनाए रखना।
तप (Tapa): दुःखी, पीड़ित एवं असहाय जीवों की सेवा हेतु सहर्ष कष्ट सहना व आत्म-त्याग करना।
स्वाध्याय (Svadhyaya): आध्यात्मिक ग्रन्थों व सत्-साहित्य का नियमित पठन, अध्ययन एवं मनन करना।
ईश्वर प्राणिधान (Ishvara Pranidhana): परमपुरुष के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण और नियमित ध्यान-साधना करना।
४. पंचदशशील (१५ शील): व्यक्तिगत एवं संगठनात्मक चरित्र के स्तम्भ
'शील' का अर्थ है उत्कृष्ट चरित्र और शीलवान व्यवहार। पंचदशशील साधक के व्यक्तित्व में नैतिक साहस, संयम और नेतृत्व गुणों का विकास करते हैं:
क्षमाशीलता: दूसरों की त्रुटियों व अपराधों को हृदय से क्षमा करने की उदारता।
मन की उदारता: संकीर्णता, पूर्वाग्रह व स्वार्थ से परे व्यापक सोच रखना।
व्यवहार और मिजाज पर सतत् नियंत्रण: आवेश, क्रोध, उग्रता व चिड़चिड़ेपन पर निरंतर अंकुश।
आदर्श के लिए त्याग की तत्परता: उच्च आध्यात्मिक व सामाजिक आदर्शों के लिए व्यक्तिगत सुख व वस्तुओं का त्याग करने हेतु प्रस्तुत रहना।
सर्वात्मक संयम: मन, वाणी, इन्द्रियों व जीवन की समस्त गतिविधियों में सर्वांगीण अनुशासन।
मधुर और हँसमुख व्यवहार: सभी के साथ मृदुभाषी, प्रसन्नचित्त व आत्मीय आचरण।
नैतिक साहस: सत्य, न्याय और सिद्धान्तों की रक्षा हेतु निर्भीकता से खड़े रहने का बल।
स्वयं आदर्श उपस्थित करना: दूसरों को उपदेश देने से पूर्व स्वयं अपने आचरण द्वारा उदाहरण प्रस्तुत करना।
निन्दा व दलबन्दी से अलग रहना: दूसरों की चुगली, आलोचना, कीचड़ उछालने और किसी भी प्रकार की गुटबाजी से पूर्णतः दूर रहना।
यम-नियम का कठोरतापूर्वक पालन: नैतिक सिद्धांतों पर किसी भी परिस्थिति में समझौता न करना।
भूल स्वीकारना एवं दण्ड स्वीकार करना: असावधानीवश अनजाने में हुई भूल को तुरंत स्वीकार करना और उसका दण्ड सहर्ष सहना।
शत्रु के प्रति भी घृणा/क्रोध से मुक्ति: विरोधी या शत्रु के साथ भी द्वेष, घृणा, क्रोध और दम्भ से रहित होकर व्यवहार करना।
अतिकथन से दूर रहना: अतिशयोक्ति, डींगें हाँकने या बातों को बढ़ा-चढ़ाकर कहने से बचना।
संरचनात्मक अनुशासन का पालन: संस्था एवं संगठन के संरचनात्मक नियमों का निष्ठापूर्वक अनुपालन।
उत्तरदायित्व का बोध: अपने कर्तव्यों एवं सौंपे गए दायित्वों के प्रति पूर्णतः जागरूक और जवाबदेह रहना।
५. सामाजिक शिष्टाचार: ३९ नियमों का विस्तृत एवं सूक्ष्म वर्गीकरण
चर्याचर्य में कुल ३९ सामाजिक शिष्टाचारों का उल्लेख है। दैनिक जीवन में इनकी उपयोगिता एवं विषय-वस्तु के आधार पर इन्हें ५ प्रमुख व्यावहारिक डोमेन (Domains) में वर्गीकृत किया गया है:
(क) सम्भाषण, शिष्टाचार एवं पारस्परिक सम्मान (१४ नियम)
१. किसी से भी सेवा प्राप्त करने के उपरांत उसे आदरपूर्वक धन्यवाद (Thank You) देना चाहिए।
२. किसी के नमस्कार करने पर तुरंत उसी प्रकार नम्रता से प्रति-नमस्कार करना चाहिए।
३. विशेष भेंट मुद्रा: किसी को कोई वस्तु या भेंट देते अथवा लेते समय अपने दाहिने हाथ को आगे बढ़ाएँ तथा बाएँ हाथ से दाहिने हाथ की कोहनी को स्पर्श करते हुए आदान-प्रदान करें।
४. जब कोई सम्मानित या ज्येष्ठ व्यक्ति सामने आए, तो सम्मान में तुरंत खड़ा हो जाना चाहिए।
६. बातचीत के दौरान जो व्यक्ति उपस्थित न हो, उसके प्रति भी सदैव सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
१०. जो लोग आपस में बातचीत कर रहे हों, उनके पास अनुमति लेकर ही जाना चाहिए।
१४. सम्भाषण में कभी भी कड़े, अशिष्ट या कटु शब्दों का प्रयोग न करें; जो बात कहनी हो, उसे अप्रत्यक्ष व सौम्य रूप से कहें।
१८. बातचीत करते समय केवल स्वयं न बोलें, दूसरों को भी अपने विचार व्यक्त करने का अवसर दें।
१९. सक्रिय श्रवण (Active Listening): किसी की बात सुनते समय बीच-बीच में सिर हिलाने या संकेत देने का नियम, जिससे वक्ता को पता चले कि आप ध्यानपूर्वक सुन रहे हैं।
२०. बात करते समय अपनी आँखें या मुँह दूसरी ओर न मोड़ें।
२४. यदि बातचीत में कोई बात समझ में न आए, तो विनयपूर्वक "क्षमा करें" (Pardon me) कहकर पुनः पूछें।
२५. यदि कोई आपके स्वास्थ्य एवं समाचार के बारे में पूछे, तो उसे हार्दिक धन्यवाद देना चाहिए।
२६. किसी व्यक्ति से मिलने पर सबसे पहले नमस्कार करना चाहिए।
२८. किसी से कोई अप्रिय, नकारात्मक या मनाही की बात करनी हो तो "क्षमा करें" कहकर बात शुरू करनी चाहिए।
(ख) व्यक्तिगत स्वच्छता, कायिक व्यवहार एवं देह-भाषा (८ नियम)
५. जम्हाई (उबासी) लेते समय मुँह को हाथ से ढँक लेना चाहिए और चुटकी बजानी चाहिए।
७. छींकने से पूर्व रुमाल या हाथ से मुँह व नाक को ढँक लेना चाहिए।
८. नाक साफ करने के पश्चात् हाथ धोना चाहिए। भोजन करते समय छींक या खँखार आए तो तुरंत हाथ धोने चाहिए।
९. शौच प्रक्षालन विधि: शौच के पश्चात् जल का प्रयोग करते समय दाहिने हाथ में साबुन लगाना चाहिए, फिर दाहिने हाथ से बाएँ हाथ को धोकर साफ करना चाहिए।
२१. 'जमींदारी ठाट' (चौड़े होकर) से बैठकर पैर नहीं हिलाना चाहिए; यह अत्यंत भद्दा लगता है।
२३. अँगुलियों को मुँह में न रखें और नखों को दाँतों से न काटें।
३४. खड़ा होकर स्नान नहीं करना चाहिए और न ही खड़ा होकर जल ग्रहण करना चाहिए।
३५. खड़ा होकर पेशाब या पाखाना (मल-मूत्र त्याग) नहीं करना चाहिए।
(ग) गोपनीयता, मर्यादा एवं संगठनात्मक अनुशासन (८ नियम)
११. बस, ट्रेन या अन्य सार्वजनिक वाहनों में यात्रा करते समय संगठन संबंधी गोपनीय विषयों पर बातचीत नहीं करनी चाहिए।
१२. बिना पूर्व स्वीकृति/अनुमति के दूसरों की वस्तु को नहीं उठाना चाहिए।
१३. किसी दूसरे व्यक्ति की वस्तु का बिना अनुमति उपयोग नहीं करना चाहिए।
१५. दूसरों के दोषों, षड्यन्त्रों या गलत कार्यों में कभी लिप्त नहीं होना चाहिए।
१६. किसी कार्यालय में किसी से मिलने जाने के पूर्व अनुमति लेनी चाहिए, परिचय-पत्र (Visiting Card) भेजना चाहिए या मौखिक आज्ञा लेनी चाहिए।
१७. दूसरों के व्यक्तिगत पत्रों को पढ़ने से बचना चाहिए।
२२. यदि कोई व्यक्ति कुछ लिख रहा हो तो उसके लिखे हुए को झाँककर न पढ़ें।
२७. रात्रि ९ बजे के पश्चात् किसी के घर नहीं जाना चाहिए।
(घ) आहार, भोजन एवं प्रक्षालन सम्बन्धी नियम (९ नियम)
२९. भोजन ग्रहण करने से पूर्व हाथ और पैर अच्छी तरह धो लेने चाहिए।
३०. यदि मधु (शहद) का सेवन करना हो, तो उसे सदैव जल के साथ मिलाकर ही लेना चाहिए।
३१. यदि कोई भोजन कर रहा हो, तो उसके सामने खड़े होकर बातचीत नहीं करनी चाहिए।
३२. भोजन करते समय छींकें या खँखारें नहीं।
३३. बाएँ हाथ से किसी को भी भोजन की थाली नहीं परोसनी चाहिए।
३६. स्वर-विज्ञान आधारित आहार नियम: जब बायाँ स्वर (इड़ा नाड़ी) चल रहा हो तब केवल तरल पदार्थ लेना चाहिए, और जब दाहिना स्वर (पिंगला नाड़ी) प्रधान हो तब ठोस भोजन ग्रहण करना चाहिए।
३७. इड़ा स्वर एवं साधना: जब इड़ा नाड़ी (बायाँ स्वर) चल रही हो, उस समय का उपयोग साधना (ध्यान) में करना चाहिए।
३८. यदि किसी को पीने के लिए जल दे रहे हों, तो पहले ग्लास को धोना चाहिए और ग्लास को नीचे के भाग से पकड़कर देना चाहिए।
३९. भोजन करते समय यदि अत्यधिक पसीना आ रहा हो तो उसे रुमाल से पोछ लेना चाहिए।
६. स्वर-विज्ञान (Swara Yoga) एवं जैव-मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
आनन्द मार्ग आचरण संहिता की सबसे अद्वितीय विशेषता इसका स्वर-विज्ञान (Nasal Cycle & Swara Science) और मानव शरीर-विज्ञान के साथ प्रत्यक्ष अंतर्संबंध है, जैसा कि नियम ३६ और ३७ में वर्णित है:
वैज्ञानिक आधार:
पिंगला नाड़ी (सूर्य स्वर): दाहिनी नासिका चलने पर शरीर का चयापचय (Metabolism) और जठराग्नि (Digestive enzymes) तीव्र होती हैं। इसलिए इस समय ठोस भोजन (Solid food) पचाना सुगम होता है।
इड़ा नाड़ी (चंद्र स्वर): बास नासिका चलने पर मस्तिष्क शांत होता है और शरीर शीतलता अनुभव करता है। इस समय जठराग्नि मन्द होती है, अतः केवल तरल पदार्थ (Fluids) ग्रहण करने की सलाह दी जाती है। इड़ा नाड़ी की मानसिक सौम्यता ध्यान और साधना (Sadhana) के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होती है।
७. निष्कर्ष
आनन्द मार्ग षोडश विधि का १६ (क) बिंदु 'आचरण संहिता' केवल धार्मिक या नैतिक नियमों का संग्रह नहीं है; यह व्यक्ति के दैहिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रूपांतरण का एक सुव्यवस्थित विज्ञान है।
श्री श्री आनन्दमूर्ति जी द्वारा रचित पुस्तक 'जीवन वेद' ने नैतिकता को रूढ़िवादिता और जटिलता से मुक्त करके उसे गृहस्थ साधक के दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बना दिया। जब साधक इन ५ यम, ५ नियम, १५ शील और ३९ सामाजिक शिष्टाचारों का निष्ठापूर्वक पालन करता है, तो वह न केवल एक उच्च आध्यात्मिक साधक बनता है, अपितु समाज में एक अनुशासित, संवेदनशील और आदर्श नागरिक का निर्माण करता है।
(ख)
‘सेमीनार’
स्रोत संदर्भ: 'आनन्द मार्ग षोडश विधि
१. दार्शनिक एवं समाजशास्त्रीय बोध का विकास
पुस्तकीय ज्ञान की सीमा एवं समाधान: केवल पुस्तकों का अध्ययन करने से दर्शन और समाजशास्त्र की जटिल गुत्थियों व समस्याओं का समाधान संभव नहीं हो पाता। सेमीनार में विद्वान वक्ताओं के संपर्क में आने और उनके व्याख्यानों से सैद्धांतिक व व्यावहारिक संशयों का निवारण होता है।
नूतन दर्शन की वैज्ञानिक प्रासंगिकता: आनन्द मार्ग दर्शन आधुनिक वैज्ञानिक युग के परिप्रेक्ष्य में संरचित एक नूतन दर्शन है। सेमीनार में इस बात का सूक्ष्म विश्लेषण होता है कि प्राचीन दर्शनों की सीमाओं से असंतुष्ट मानव मन की जिज्ञासाओं को यह नया दर्शन किस प्रकार पूरा करता है।
त्रिशास्त्र का सर्वांगपूर्ण ज्ञान: सेमीनार के माध्यम से आनन्द मार्ग के 'त्रिशास्त्र' (दर्शन शास्त्र, समाज शास्त्र एवं आध्यात्मिक वांग्मय) की संपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
२. साधक का नैतिक दायित्व एवं सांगठनिक अनुशासन
अपूर्ण ज्ञान के दुष्परिणाम: दर्शन का अधूरा ज्ञान होने पर यदि दूसरे लोग मार्ग से भटकते हैं, तो यह साधक का अपना दोष माना गया है। दूसरों को सत्पथ का निर्देशन करना प्रत्येक आनन्द मार्गी का परम कर्तव्य है।
पूर्ण सहभागिता: सेमीनार का पूरा लाभ उठाने के लिए साधक को पूरे सामान के साथ २ से ३ दिनों की पूरी अवधि के लिए रुकना चाहिए और अपने आसपास के साधकों को भी साथ लाना चाहिए।
संगठन का विश्वासभाजन: सेमीनार में प्राप्त कर्तव्यों को पूरा करने से साधक संगठन का विश्वासभाजन बनता है और संगठन उसे अन्य स्थानों पर सेमीनार लेने का उत्तरदायित्व देता है।
३. व्यावहारिक कर्मक्षेत्र और सामाजिक प्रगाढ़ता
आत्मविश्वास और बौद्धिक क्षमता: जब साधक दर्शन को दूसरों को समझाता है, तब उत्पन्न कठिनाइयों को सुलझाने से उसकी बुद्धि का विकास होता है, आत्मविश्वास बढ़ता है और सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध होता है।
अव्यावहारिक आलोचना का अंत: जो लोग कर्मक्षेत्र में स्वयं प्रवेश नहीं करते, वे घर बैठे कार्यकर्ताओं की आलोचना करते हैं जिससे भ्रांतियाँ पैदा होती हैं। सेमीनार में साथ मिलकर काम करने से ही साथियों का वास्तविक परिचय और उनके व्यावहारिक गुणों का ज्ञान होता है।
४. सूक्ष्म-आध्यात्मिक तरंगें एवं इष्टदेव का सानिध्य
सूक्ष्म साक्षात्कार: धर्म महाचक्र में जहाँ इष्टदेव का स्थूल साक्षात्कार होता है, वहीं सेमीनार जैसे समष्टि-कल्याणकारी आयोजनों में इष्टदेव सूक्ष्म रूप से उपस्थित रहते हैं।
आध्यात्मिक ऊर्जा एवं समस्या-समाधान: सेमीनार की विशेष आध्यात्मिक तरंगों से साधक को इष्टदेव का सूक्ष्म वरदान प्राप्त होता है। इस विकसित चैतन्य से साधना में मन लगता है और व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक समस्याएँ स्वतः सुलझने लगती हैं।
५. नूतन वांग्मय एवं प्रभात संगीत का सांस्कृतिक समाकलन
इतिहास व समाजशास्त्र की नई दिशा: सेमीनार में श्री श्री आनन्दमूर्ति जी के नूतन ग्रंथों (जैसे 'सभ्यता का आदि बिन्दु: राढ़', 'नमामि कृष्ण सुन्दरम्', 'नमः शिवाय शान्ताय', 'वर्ण विज्ञान', 'वर्ण विचित्रा', 'शब्द चयनिका') का अध्ययन होता है, जो राजाओं/युद्धों के स्थान पर जनता की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक प्रगति का वास्तविक इतिहास प्रस्तुत करते हैं।
प्रभात संगीत की भूमिका: १४ सितंबर १९८२ से रचित ५००० से अधिक 'प्रभात संगीत' (भाव, भाषा, छंद और सुर का अनुपम संगम) का अभ्यास सेमीनार का अभिन्न अंग है, जो साधकों की सामाजिक व आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।
(ग)
'कर्तव्य’
स्रोत संदर्भ: षोडश विधि
१. आदर्श की व्यावहारिक परिणति और आलस्य निवारण
आदर्श का मात्र बौद्धिक या सैद्धांतिक ज्ञान मनुष्य में अभिमान उत्पन्न करता है तथा क्रियान्वयन के अभाव में आलस्य को जन्म देता है।
इस आलस्य की निवृत्ति केवल आदर्श के अनुकूल कर्म क्षेत्र (कर्म भूमि) में प्रवेश करने से ही संभव होती है।
दर्शन शास्त्र एक बनी हुई सीमेंट की चौड़ी सड़क के समान है, जो क्या करना चाहिए और क्या नहीं (कर्तव्य-अकर्तव्य) के संशय को मिटाकर जीवन-लक्ष्य तक तीव्र गति से पहुँचाने में सहायता करता है।
२. जीवन-यात्रा का सांगोपांग रूपक (परिवहन मॉडल)
मार्ग: दर्शन शास्त्र।
परिवहन (वाहन): मनुष्य का स्वयं का 'व्यक्तित्व'। इसे साधना द्वारा गतिशील और स्वास्थ्य नियमों के पालन से सक्षम बनाया जाता है।
चालक: विवेक।
यात्री: आत्मा।
लक्ष्य: परमात्मा।
इन सभी साधनों के उपलब्ध रहते हुए भी कर्मविमुख होकर बैठे रहना चरम मूर्खता है; दर्शन-मार्ग पर अपने व्यक्तित्व रूपी वाहन को गति देना ही वास्तविक कर्तव्य है।
३. 'जगत् हिताय' बनाम 'स्वार्थ' का दार्शनिक विश्लेषण
आनन्द सूत्रम् (अध्याय ५) के सूत्र पर आधारित: "व्यष्टिसमष्टि शरीरमानसाध्यात्मिक सम्भावनायां चरमोपयोगश्च।"
स्वार्थ: जिससे दूसरों का अहित और केवल अपना हित हो। यह व्यक्तित्व रूपी वाहन को दलदल में फंसा देता है तथा ध्यान मार्ग से हटाकर गियर-हैंडल पर उलझा देता है, जिससे जीवन-दुर्घटना निश्चित हो जाती है।
परमार्थ (जगत् हिताय): जिससे समष्टि का हित हो। इसमें ध्यान दर्शन-मार्ग पर रहता है और 'मधुविद्या' के सहारे जीवन-वाहन का संतुलन स्वतः बना रहता है।
४. गतिशीलता, आन्तरिक सौंदर्य एवं सांगठनिक उत्तरदायित्व
कर्तव्य कर्म अकर्मण्यता रूपी जंग को मिटाकर जीवन के पहियों में ग्रीस (स्नेहक) का कार्य करता है।
यात्रा की दूरी का पूर्णतः समाप्त हो जाना ही 'मोक्ष' है; जो साधक समष्टि हित के कार्य में संलग्न नहीं होते, उन्हें आत्म-मोक्ष प्राप्त नहीं होता।
प्रत्येक साधक को अपने व्यक्तिगत व पारिवारिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए जगत् हित के कार्यों का लेखा-जोखा धर्मचक्र के दिन अधिकृत उत्तरदायी मनुष्य के पास प्रस्तुत करना चाहिए।
५. कर्मक्षेत्र में ईश्वर-साक्षात्कार एवं संग्राम का सिद्धांत
कर्तव्य पथ पर अग्रसर होने पर जटिल से जटिल कार्य आसान हो जाते हैं क्योंकि साधक को एक अदृश्य शक्ति के निरंतर सहयोग का प्रत्यक्ष अनुभव होता है।
अकर्मण्य रहकर परमात्मा की अनुभूति असंभव है। जिस प्रकार अर्जुन को श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप का दर्शन संग्राम (युद्ध क्षेत्र) में हुआ, उसी प्रकार जीवन-संग्राम के कर्मक्षेत्र में उतरने वाला ही प्रभु का वास्तविक साक्षात्कार कर पाता है।
दर्शन का व्यावहारिक उपयोग और सर्वत्र चरम उपयोग (Maximum Utilization) ही 'कर्तव्य' की परम परिणति है।
(घ)
'कीर्तन’
स्रोत संदर्भ: षोडश विधि
१. दार्शनिक, आध्यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक महत्व
ज्ञान से आलस्य व अभिमान उत्पन्न होता है और कर्म से भी कर्त्तृत्वाभिमान की सम्भावना बनी रहती है।
कीर्तन भक्ति का अंग है और भक्ति में अभिमान रह ही नहीं सकता, जिससे साधना के समय कीर्तन करने से अहंकार समाप्त हो जाता है।
भजन व्यक्तिगत (अकेले) किया जाता है, जबकि कीर्तन सदैव सामूहिक होता है।
कीर्तन के समय दोनों हाथों को ऊपर उठाकर नृत्य करना परम पुरुष के प्रति पूर्ण 'आत्म-समर्पण' का प्रतीक है।
"बाबा नाम केवलम्" आठ अक्षरों (अष्टाक्षर) का सिद्ध मंत्र है। इसमें 'बाबा' का अर्थ परमात्मा है, जो मनुष्य व सृष्टि के सबसे प्रिय हैं।
२. कीर्तन का विधान, समय मर्यादा एवं नियम
समय निर्धारण: कीर्तन की निश्चित समयावधि का पूर्व-संकल्प लिया जाता है; यह अखण्ड कीर्तन (२४ घंटे), आठ प्रहर, चार प्रहर, दो प्रहर या एक प्रहर (३ घंटे) का हो सकता है।
मर्यादा एवं निरंतरता: संकल्पित समय पूरा होने से पहले कीर्तन बीच में कदापि नहीं रुकना चाहिए।
नाम मर्यादा: कीर्तन में केवल "बाबा नाम केवलम्" का ही गायन होना चाहिए, यद्यपि इसे विभिन्न रागों व सुरों में गाया जा सकता है।
प्रारंभ एवं समापन: कीर्तन का शुभारंभ 'गौड़ चंद्रिका' (इष्ट का आवाहनात्मक मधुर भजन) से होता है। कीर्तन (ललित नृत्य) के पश्चात मन ऊपर उठ जाता है, इसलिए तुरंत बैठकर ईश्वर प्रणिधान कर लेना चाहिए।
सामाजिक एवं लिंग भेद नियम: परिवार में सभी स्त्री-पुरुष एक साथ मिलकर कीर्तन कर सकते हैं। सार्वजनिक जीवन में पुरुष वर्ग के कीर्तन/नृत्य करते समय स्त्रियाँ बैठकर कीर्तन करेंगी, या जिन समाजों में स्त्री-पुरुष साथ काम करते हैं वहाँ वे सम्मिलित रूप से कर सकते हैं।
कीर्तन समावेश: धार्मिक आयोजनों (जैसे धर्म महाचक्र) में बाहर से आने वाले साधक बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन से समूह में कीर्तन करते हुए सभास्थल तक पहुँचते हैं।
३. कीर्तन मंडप की भौतिक एवं सात्विक संरचना
संरचनात्मक केंद्र: मंडप के केंद्र में एक वर्गाकार/आयताकार टेबल रखकर उसे सादे कपड़े से ढका जाता है तथा चारों दिशाओं में सद्गुरुदेव की प्रतिकृति और प्रतीक को सजाया जाता है।
पाया एवं कलश स्थापना: मंडप के चारों पायों को केले के खंभों से बाँधा जाता है और प्रत्येक पाये के पास जल से भरा ढक्कनयुक्त कलश रखा जाता है जिसके ऊपर छिलके सहित नारियल स्थापित होता है।
सात्विक सज्जा: अशोक व आम के पत्ते, ताजे फूलों की मालाएँ, टहनियाँ, रंगीन कागज तथा वातावरण को सात्विक बनाने के लिए धूप व अगरबत्ती का प्रयोग होता है।
परिक्रमा दिशा: नर्तक मंडली मंडप के चारों ओर वामावर्त (Anti-clockwise) प्रदक्षिणा करते हुए नृत्य करती है।
४. चतुर्विध सांगठनिक प्रबंधन तंत्र
मंडप प्रधान: कीर्तन के संपूर्ण सर्वे-सर्वा एवं अध्यक्ष (Supervision)। तात्कालिक समस्याओं के समाधान हेतु सदैव मंडप के निकट उपस्थित रहते हैं।
वित्त प्रधान: आय-व्यय के प्रबंधक एवं हिसाब-किताब रखने वाले। धन के अभाव को दूर करने हेतु प्रेमी भक्तों से चंदा भी जुटा सकते हैं।
कीर्तन प्रधान: नृत्य टोलियों (प्रति टोली न्यूनतम ५ व्यक्ति) का समय-सारणी तैयार करते हैं। यह सुनिश्चित करते हैं कि कीर्तन मशीनी न बने और भाव-माधुर्य तथा विभिन्न वाद्ययंत्रों, रागों व सुरों का अविरल प्रवाह बना रहे।
प्रसाद प्रधान: इष्ट (सद्गुरु) को अर्पित आध्यात्मिक भाव-तरंगों से युक्त नैवेद्य की व्यवस्था व वितरण करते हैं तथा भक्तों द्वारा लाए गए फल/मिष्ठान्न स्वीकार कर प्रभु को निवेदित करते हैं।
५. शारीरिक, मानसिक व सामाजिक लाभ तथा नृत्य-शास्त्र
षड्विध महालाभ: कीर्तन व्यथा विदूरिकम् (कष्ट निवारक), वात रोग विदूरिकम् (वात रोग निवारक), चिंता विदूरिकम् (मानसिक चिंता निवारक), आयु वर्द्धकम् (आयु बढ़ाने वाला), साधना सहायकम् (साधना में सहायक) और आनंद दायकम् (परमानंद प्रदाता) है।
सामाजिक प्रभाव: यह व्यक्तिगत चिंता व राष्ट्र/समाज पर आई सामूहिक विपत्तियों का निवारण करता है तथा साधक-असाधक के भेद को समाप्त कर सभी को जोड़ता है।
नृत्य का विज्ञान: कीर्तन में केवल 'ललित नृत्य' ही उपयुक्त बताया गया है। भगवान शिव ने प्राचीन अस्वास्थ्यकर नृत्यों के स्थान पर वैज्ञानिक नृत्यों का आविर्भाव किया था।
तांडव नृत्य: 'तांडव' शब्द 'तण्डुल' (चावल) से बना है (जैसे ढेंकी में कूटते समय चावल उछलता है, वैसे ही व्यक्ति उछलता है)। यह अत्यंत कठिन नृत्य है जो केवल पुरुषों के लिए परिमित है।
CSDK का संयुक्त एवं समन्वयात्मक महत्व
आनन्द मार्ग षोडश विधि का १६वाँ बिंदु साधक के सर्वांगीण विकास का संपूर्ण मार्गदर्शक है। यह आचरण संहिता (अनुशासन), सेमीनार (विचार), कर्तव्य (कर्म) और कीर्तन (भक्ति) का ऐसा समन्वित चतुर्भुज है, जो व्यष्टि से समष्टि और व्यावहारिक जीवन से परमानंद की यात्रा को पूर्ण बनाता है।
१. चतुर्विध स्तंभों का समन्वयात्मक ढांचा
बिंदु | मुख्य आधार | साधन व माध्यम | व्यक्तिगत प्रभाव | समष्टिगत प्रभाव |
१६ (क) आचरण संहिता | अनुशासन व नैतिकता | यम-नियम व दैनिक नियमों का पालन | चरित्र निर्माण, मानसिक पवित्रता | सात्विक एवं शोषण-मुक्त समाज |
१६ (ख) सेमीनार | वैचारिक परिमार्जन | सामूहिक दार्शनिक विमर्श व अध्ययन | संशय-मुक्ति, बौद्धिक निखार | सांगठनिक सुदृढ़ता व एकता |
१६ (ग) कर्तव्य | व्यावहारिक प्रयोग | 'जगत् हिताय' कर्मक्षेत्र में प्रवेश | आलस्य का अंत, आत्म-विकास | लोक-कल्याण व समाज-सेवा |
१६ (घ) कीर्तन | भाव व अहंकार विसर्जन | अष्टाक्षर सिद्ध मंत्र व ललित नृत्य | कर्त्तृत्वाभिमान का नाश | सात्विक तरंगें व विपत्ति निवारण |
२. चारों बिंदुओं के संयुक्त अभ्यास का सूक्ष्म विश्लेषण
नींव से शिखर तक का क्रमिक विकास:
आचरण संहिता साधक के जीवन का नैतिक आधार (नींव) तैयार करती है।
सेमीनार उस अनुशासित साधक को दार्शनिक, सामाजिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान कर संशयों से मुक्त करता है।
कर्तव्य प्राप्त ज्ञान व सिद्धांतों को कर्मभूमि पर व्यावहारिक रूप देता है।
कीर्तन उस कर्म और ज्ञान को असीम भक्ति व सरसता से सराबोर कर परम पुरुष में विलीन कर देता है।
अहंकार और आलस्य के त्रिदोषों का समूल नाश:
केवल नियमों का पालन करने से साधक में 'आचरण का अहंकार' आ सकता है; ज्ञान प्राप्त होने पर 'बौद्धिक अभिमान' पैदा होता है; और कर्मक्षेत्र में उतरने पर 'कर्त्तृत्वाभिमान' पनपने लगता है। कीर्तन की अगाध भक्ति और "बाबा नाम केवलम्" का अष्टाक्षर मंत्र इन तीनों प्रकार के अभिमानों का समूल नाश कर देता है।
'जीवन-यात्री एवं परिवहन' का एकीकृत मॉडल:
आचरण संहिता: व्यक्तित्व रूपी वाहन की अनुशासित संरचना, स्वास्थ्य-रक्षा तथा यातायात के नियम हैं।
सेमीनार: दर्शन रूपी वह सीमेंटेड चौड़ी सड़क है, जो सही दिशा और लक्ष्य का स्पष्ट बोध कराती है।
कर्तव्य: वाहन की गतिशीलता है, जो समय-सीमा समाप्त होने से पूर्व साधक को लक्ष्य तक पहुँचाती है।
कीर्तन: इस यात्रा की 'मधुविद्या' रूपी स्नेहक (ग्रीस/ईंधन) है, जो वाहन को दुर्घटनाग्रस्त या दलदल में फँसने से बचाकर परमानंद का अनुभव कराती है।
व्यष्टि से समष्टि की ओर सर्वांगीण प्रगति:
आचरण संहिता से साधक का व्यक्तित्व निर्मल होता है; सेमीनार से वह संगठन का विश्वासभाजन और वैचारिक स्तंभ बनता है; कर्तव्य से वह समाज की भौतिक व मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है; तथा कीर्तन से वह जातीय, प्रांतीय व लिंग भेद भुलाकर संपूर्ण समष्टि को एक भाव-सूत्र में पिरोता है।
३. परम लक्ष्य (आत्म-मोक्ष एवं समष्टि-कल्याण) की सिद्धि
सैद्धांतिक ज्ञान की व्यावहारिक परिणति: बिना आचरण और कर्तव्य के ज्ञान मात्र चर्चा तक सीमित रहकर आलस्य पैदा करता है। चारों का संयुक्त अनुपालन साधक को संयमी, ज्ञानी, कर्मठ और परम भक्त बनाता है।
प्रभु साक्षात्कार का पथ: जिस प्रकार अर्जुन को जीवन-संग्राम में युद्ध करते हुए श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप का दर्शन हुआ, उसी प्रकार आचरण संहिता के दृढ़ पालन, सेमीनार के स्पष्ट पथ, कर्तव्य के कर्मक्षेत्र और कीर्तन के अनन्य भाव-समर्पण से ही साधक को इष्टदेव का सूक्ष्म साक्षात्कार प्राप्त होता है।
यह चारों बिंदु पृथक-पृथक नियम नहीं, बल्कि एक ही महासाधना के चार अनिवार्य चरण हैं—आचरण से ज्ञान की ओर, ज्ञान से कर्म की ओर, और कर्म से चरम भक्ति की ओर।
कहानी: आनन्द किरण की साधना यात्रा
अरावली की तलहटी में स्थित गाँव शिवतलाव के युवा साधक आनन्द किरण के जीवन में परम लक्ष्य को पाने का तीव्र उत्साह था, किंतु उसकी साधना यात्रा बार-बार असंतुलित होकर रुक जाती थी। प्रारंभ में उसने आचरण संहिता के कठोर नियमों को ही सर्वोपरि माना; वह यम-नियम, आहार-विहार और दैनिक अनुशासन का अक्षरशः पालन करता, जिससे उसका चरित्र तो अत्यंत निर्मल और निष्कलंक हो गया, किंतु जब जीवन में व्यावहारिक और सामाजिक जटिलताएँ आईं, तो उसके मन में भांति-भांति के वैचारिक संशय उठने लगे।
इन संशयों का निवारण करने के लिए उसने सेमीनार में भाग लेना शुरू किया। वहाँ वरिष्ठ साधकों के संग, सामूहिक अध्ययन और आनन्द मार्ग के नूतन दर्शन के वैज्ञानिक व व्यावहारिक विश्लेषण से उसकी बुद्धि तीक्ष्ण हो गई। उसे सीमेंट की बनी चौड़ी सड़क की भाँति अपने जीवन-लक्ष्य का स्पष्ट मार्ग दिखाई देने लगा। किंतु कुछ ही समय में केवल पुस्तकों के अध्ययन और दार्शनिक चर्चाओं ने उसके भीतर ज्ञान का सूक्ष्म अभिमान और अकर्मण्यता का आलस्य भर दिया।
अपनी इस भूल को समझते ही उसने स्वयं को कर्मक्षेत्र में झोंक दिया और कर्तव्य का पालन करने लगा। वह 'जगत् हिताय' के भाव से दिन-रात असहायों की सेवा करने लगा और समाज-कल्याण के कार्यों में पूरी निष्ठा से अग्रसर हुआ। उसका व्यक्तित्व रूपी वाहन तीव्रता से दौड़ने लगा, किंतु निरंतर कर्म करते-करते उसके भीतर अनजाने में ही 'मैं कर्ता हूँ' का अहंकार पनपने लगा। यह कर्त्तृत्वाभिमान उसके मन को थकाने लगा और उसकी निष्काम सेवा धीरे-धीरे शुष्क होने लगी।
एक दिन संध्या समय, मानसिक व्यथा से व्याकुल आनन्द किरण बैठा ही था कि पास के मंडप से अष्टाक्षर मंत्र "बाबा नाम केवलम्" का सुमधुर स्वर गूँज उठा। वह खिंचा चला गया और साधकों की मंडली में दोनों हाथ ऊपर उठाकर आत्म-समर्पण के भाव से कीर्तन में नृत्य करने लगा। कीर्तन के उस अलौकिक स्पंदन में बहते ही उसके भीतर का आचरण-अभिमान, ज्ञान-अभिमान और कर्म-अभिमान क्षण भर में गलकर बह गए।
उस पल आनन्द किरण को बोध हुआ कि आचरण संहिता उसके व्यक्तित्व रूपी वाहन की सुदृढ़ संरचना है, सेमीनार वह सुगम मार्ग है जो भटकाव से बचाता है, कर्तव्य उस वाहन की निरंतर गतिशीलता है जो मंजिल तक पहुँचाती है, और कीर्तन वह 'मधुविद्या' रूपी अमृत-स्नेहक है जो संपूर्ण यात्रा को अहंकार-मुक्त और परमानंदमय बनाता है। इन चारों के दिव्य समन्वय से ही साधक अकर्मण्यता से मुक्त होकर इष्टदेव का वास्तविक साक्षात्कार प्राप्त कर सकता है।
— करण सिंह शिवतलाव
नोट : यह कहानी एवं पात्र काल्पनिक हैं। पात्र अथवा स्थान ऐतिहासिक पात्रों मिलना एक सहयोग मात्र है।
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