संतोष साधना : उसके अनुप्रयोग
(सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अपराधों के विरुद्ध एक वैचारिक क्रांति")
जीवनवेद के आलोक में संतोष की दार्शनिक एवं व्यावहारिक व्याख्या
स्रोत संदर्भ: जीवन वेद
१. प्रस्तावना: 'तोष' और 'सन्तोष' का तात्विक अर्थ
आमतौर पर लोग 'सन्तोष' को केवल इच्छाओं को मार लेना या निष्क्रिय हो जाना मान लेते हैं, जो कि पूर्णतः भ्रामक है।
तोष का अर्थ: 'तोष' शब्द का मूल अर्थ है—मन के आराम की अवस्था।
सन्तोष का अर्थ: 'सन्तोष' का अर्थ है—सम्यक रूप से आराम। जब मन को एक ऐसी स्थायी तृप्ति और शांति मिल जाए जहाँ वह बिना किसी व्याकुलता के स्थिर हो सके, वही वास्तविक सन्तोष है।
साधारण अवस्था में मनुष्य का मन कभी पूर्ण आराम या तृप्ति नहीं पा सकता। जब तक मन में 'भोगाभिमुखी वृत्ति' (भोगों की ओर भागने की प्रवृत्ति) रहती है, तब तक मन एक जड़ वस्तु की ओर उसी तरह अनियंत्रित होकर दौड़ता है जैसे कोई कुत्ता किसी वस्तु के पीछे भागता है। इस अंधी दौड़ में क्रम-विश्लेषण करने पर पता चलता है कि मनुष्य जिन भोग्य वस्तुओं को इकट्ठा करता जाता है, समय के साथ उनकी संख्या और इच्छाएँ दोनों बढ़ती ही जाती हैं, जिससे मन की दौड़ कभी समाप्त नहीं होती।
२. असन्तोष का मनोविज्ञान और अर्थोपार्जन का उन्माद
मनुष्य की क्षुधा (भूख और इच्छा) का कोई अंत नहीं है। एक लखपति करोड़पति बनना चाहता है, क्योंकि लाख रुपये पाकर भी वह सन्तुष्ट नहीं होता। यदि किसी करोड़पति से पूछा जाए कि "क्या तुम रुपये पाकर सुखी हो?", तो उसका उत्तर होगा—"रुपया कहाँ है, किसी प्रकार दिन काटा जा रहा है।"
अपरिग्रह बोध का अभाव और उसके दुष्प्रभाव:
इस मानसिक स्थिति में अपरिग्रह बोध (आवश्यकता से अधिक संचय न करने की भावना) का पूर्ण अभाव दिखाई देता है। यह अपरिग्रह-विरोधी भाव मनुष्य के देह और मन पर अत्यंत घातक प्रभाव डालता है:
लोभ-लालसा का उन्माद: शरीर और मन अत्यधिक लोभ में उन्मत्त हो जाते हैं। मनुष्य एक प्रकार के 'उन्माद' (Madness) में केवल अर्थोपार्जन (धन कमाने) या धन-संचय में ही लगा रहता है।
जीवन का संकुचित होना: इस अंधी दौड़ का परिणाम यह होता है कि रुपया ही जीवन का सर्वस्व (सब कुछ) मान लिया जाता है।
मन और शरीर की जड़ता: अत्यधिक धन की हाय-तौबा में मन जड़ (Insensitive) हो जाता है। दीर्घकाल तक मानसिक और शारीरिक विश्राम न मिलने के कारण और प्रकृति के नियमों की अवज्ञा करने के कारण शरीर 'अपटु' (अक्षम/बीमार) हो जाता है।
३. सन्तोष साधना: परिभाषा एवं मानसिक प्रचेष्टा
इस प्रोजेक्ट का मुख्य निष्कर्ष यह है कि स्वाभाविक परिश्रम से, अर्थात् शरीर या मन के ऊपर उसकी सामर्थ्य से अतिरिक्त बोझ न देकर, जो धन या सम्पत्ति उपार्जित की जाती है, उससे ही तृप्त रहने का नाम 'सन्तोष साधना' है।
यह कोई निष्क्रिय अवस्था नहीं है, बल्कि एक विशेष प्रकार की मानसिक प्रचेष्टा (Mental Effort) है। साधक को लगातार अपने मन में एक ऐसा प्रयास बनाए रखना पड़ता है जो उसे सदा अतिलोभात्मक कार्यों से दूर रहने में सहायता करे। यह मन को विकृतियों से बचाने का एक सजग सुरक्षा कवच है।
४. सन्तोष साधना की व्यावहारिक पद्धतियाँ (Techniques)
मन को किसी भी नकारात्मक या अतिलोभी वृत्ति से दूर हटाने के लिए इस पाठ में दो अत्यंत प्रभावशाली प्रक्रियाओं का उल्लेख किया गया है:
क) स्वागत अभिभावन (Auto-suggestion)
जब मन किसी हीन वृत्ति (जैसे अत्यधिक लोभ या संचय की इच्छा) में लगा हो, तब उसके ठीक विपरीत 'विरोधी विचारधारा' को मन ही मन सदा जपते रहना चाहिए। बार-बार सकारात्मक और सन्तोषी विचारों का मंथन करने से स्वभाव में परिवर्तन आना आवश्यक है। सन्तोष साधना में साधक को हर समय इसी 'स्वागत अभिभावन' की सहायता लेनी चाहिए।
ख) परगत अभिभावन (Outer-suggestion)
यदि कोई दूसरा व्यक्ति किसी के कान में बार-बार उसी प्रकार की उच्च और कल्याणकारी बातें सुनाता रहे, तो उससे भी सुनने वाले के स्वभाव में परिवर्तन आता है। इसे 'परगत अभिभावन' कहते हैं।
५. एक बहुत बड़ी गलतफहमी का निवारण: सामाजिक न्याय और अधिकार
सन्तोष साधना का अर्थ कायरता या अन्याय को सहना बिल्कुल नहीं है। इस सिद्धांत को बहुत स्पष्ट रूप से समझना होगा:
"सन्तोष साधना का उद्देश्य यह नहीं है कि कोई तुम्हें किसी प्रकार ठग ले, या तुम्हारे सीधेपन का सुयोग पाकर तुम्हारे ऊपर अत्याचार करे और तुम मुँह बन्द करके उसको सह लो।"
अस्तित्व की रक्षा: अपने अस्तित्व की रक्षा का अपना अधिकार और अपनी न्यायोचित भावना का त्याग करना कभी भी उचित नहीं माना जा सकता।
मिलित संघर्ष: जीवन के सभी क्षेत्रों में अधिकार की प्रतिष्ठा के लिए मनुष्य को सदैव मिलित रूप से (सामूहिक रूप से) संघर्ष करते रहना होगा।
चेतावनी: संघर्ष करते समय केवल एक बात का ध्यान रखना है कि कभी भी अति-लोभ के वश में होकर अपनी शारीरिक तथा मानसिक शक्ति को नष्ट नहीं करना है और न ही सन्तोष भाव के विरुद्ध जाना है।
६. निष्कर्ष एवं जीवन-दर्शन
'नियम साधना' के अंतर्गत 'सन्तोष साधना' जीवन जीने का एक उत्कृष्ट मार्ग (जीवनवेद) है। यह हमें सिखाती है कि:
परिश्रम का सम्मान करें: अपनी क्षमता के अनुसार न्यायपूर्ण जीविकोपार्जन करें।
सजकता से जिएँ: मानसिक भटकाव और धन के उन्माद से बचने के लिए लगातार ऑटो-सजेशन (स्वागत अभिभावन) का प्रयोग करें।
अन्याय का विरोध करें: सन्तोषी होने का अर्थ शोषित होना नहीं है। समाज में अधिकारों के लिए संघर्ष अनिवार्य है, बशर्ते वह लोभ से प्रेरित न होकर न्याय पर आधारित हो।
मूल मंत्र: अपनी मानसिक और शारीरिक ऊर्जा को धन की अंधी दौड़ में नष्ट करने के बजाय, उसे सम्यक आराम (सन्तोष) और समष्टिगत कल्याण में लगाना ही मानव जीवन की असली सार्थकता है।
अतिलोभ के उन्माद पर प्रहार: सन्तोष साधना और युग-परिवर्तन का शंखनाद
प्रस्तुति: [श्री] आनंद किरण 'देव'
आज का मानव समाज एक भयानक, आत्मघाती और अंधे मोड़ पर खड़ा है। चारों तरफ एक अघोषित होड़ मची है—और अधिक पाने की, और अधिक छीनने की। यह होड़ नहीं, बल्कि एक मानसिक महामारी है, जिसने समूची मानवता को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। 'जीवनवेद' को जब हम खंगालते हैं, तो यह कड़वा सच हमारी आंखों के सामने तैरने लगता है कि आधुनिक सभ्यता जिस दौड़ को 'प्रगति' कह रही है, वह वास्तव में 'भोगाभिमुखी वृत्ति' का एक घिनौना रूप है, जहाँ मनुष्य एक जड़ वस्तु के पीछे अपनी सुध-बुध खोकर इस कदर भाग रहा है जैसे कोई कुत्ता किसी सूखी हड्डी के पीछे दौड़ता है।
लखपति-करोड़पति का ढोंग और आंतरिक दरिद्रता
इस तथाकथित आधुनिक और विकसित समाज से एक तीखा सवाल पूछने का वक्त आ गया है। आज लखपति करोड़पति बनना चाहता है और करोड़पति अरबपति बनने की अंधी हवस में दिन-रात एक कर रहा है। लेकिन क्या कोई इस धन के अंबार को पाकर सचमुच सुखी है? किसी भी रईस की मखमली मसनद को टटोलकर देखिए, भीतर से एक ही कराह सुनाई देगी—"रुपया कहाँ है, बस किसी प्रकार दिन काटा जा रहा है।"
यह कैसी प्रगति है जो बाहर से अट्टालिकाएं खड़ी करती है और भीतर से मनुष्य को कंगाल बना देती है? यह अपरिग्रह बोध का अभाव ही है जो देह और मन के ऊपर एक आत्मघाती बोझ डाल रहा है। रुपया आज जीवन जीने का साधन नहीं, बल्कि जीवन का सर्वस्व बन बैठा है। इस अंतहीन लोभ-लालसा के उन्माद में चौबीसों घंटे डूबा रहने के कारण मनुष्य का मन 'जड़' हो चुका है और प्रकृति के नियमों की निरंतर अवज्ञा करने के कारण उसका शरीर 'अपटु' और रुग्ण हो चुका है।
सन्तोष: कोई कायरता नहीं, एक क्रांतिकारी प्रचेष्टा
वक्त आ गया है कि इस भ्रांति को जड़ से उखाड़ फेंका जाए कि 'सन्तोष' का मतलब हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाना या भाग्य के भरोसे निष्क्रिय हो जाना है। नहीं! सन्तोष कोई बुझी हुई राख या कायरों का बहाना नहीं है। स्वाभाविक परिश्रम से, अर्थात् अपने शरीर और मन पर उसकी सामर्थ्य से अतिरिक्त बोझ दिए बिना जो धन या सम्पत्ति उपार्जित की जाती है, उससे ही तृप्त रहने का नाम 'सन्तोष साधना' है।
यह एक प्रचंड मानसिक प्रचेष्टा है, एक ऐसा आंतरिक विद्रोह है जो मनुष्य को अतिलोभात्मक और विनाशकारी कार्यों की तरफ बढ़ने से पूरी ताकत से रोकता है। यह अपने ही मन की विकृतियों के खिलाफ लड़ा जाने वाला एक ओजस्वी और अनवरत संग्राम है, जिसे 'स्वागत अभिभावन' (Auto-suggestion) की वैचारिक तलवार से जीता जाता है। जब-जब मन में लोभ और वासना की हीन वृत्तियां जागेंगी, तब-तब सन्तोष का साधक उसके ठीक विपरीत 'विरोधी विचारधारा' का प्रचंड मानसिक जप करके अपने स्वभाव को बदलने का पराक्रम दिखाएगा।
अधिकारों की प्रतिष्ठा और मिलित महासंग्राम
शोषक और अत्याचारी कान खोलकर सुन लें—सन्तोष साधना का अर्थ यह कतई नहीं है कि कोई सीधे-साधे इंसान को ठग ले, या उसके सीधेपन का नाजायज फायदा उठाकर उस पर जुल्म ढाए और वह साधु बनने के ढोंग में मुँह बंद करके सब कुछ सहता रहे। अपने अस्तित्व की रक्षा करना और अपनी न्यायोचित भावना के लिए अड़ जाना ही सच्ची साधना है। सीधेपन के नाम पर कायरता को स्वीकार करना आत्मघाती है।
"जीवन के सभी क्षेत्रों में अधिकार की प्रतिष्ठा के लिए तुम्हें सदैव मिलित रूप से (सामूहिक रूप से) संग्राम करते रहना होगा।"
यह जीवनवेद का सीधा और तेजतर्रार संदेश है। हमें समाज से आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और नैतिक अपराधों को उखाड़ फेंकने के लिए प्रउत (PROUT) और नव्य-मानवतावाद (Neo-humanism) के सिद्धांतों को अपनी ढाल बनाना होगा। अपनी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा को धन के उन्माद में नष्ट करने के बजाय, उसे समष्टिगत कल्याण और सामाजिक न्याय के महायज्ञ में आहुति बनाना होगा।
उद्घोष
उठो! और इस अंधी, भोगवादी और विनाशकारी व्यवस्था की छाती पर पैर रखकर यह उद्घोष करो कि हम अब और जड़ता के दास नहीं रहेंगे। हम अपनी स्वाभाविक क्षमता से सृजन करेंगे, न्याय के लिए मिलित संघर्ष करेंगे और अपनी आंतरिक चेतना को जागृत कर इस धरती पर एक अनूठे, शोषण-मुक्त और परम आनंदित समाज की स्थापना करेंगे। यही वास्तविक सन्तोष साधना है और यही युग-परिवर्तन का सच्चा शंखनाद है!
संतोष प्रगति में बाधक नहीं, प्रगति का सूचक है
यह विचार पहली नज़र में विरोधाभासी लग सकता है, क्योंकि आम धारणा यह है कि असंतोष ही मनुष्य को आगे बढ़ने और प्रगति करने के लिए प्रेरित करता है। परंतु यदि संतोष अध्याय" में दिए गए 'जीवन वेद' के गहरे दर्शन और व्यावहारिक मनोविज्ञान को समझें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वास्तविक संतोष ही सच्ची प्रगति का आधार और सूचक है।
1. मानसिक शांति (सम्यक आराम) ही प्रगति की नींव है
जीवनवेद के अनुसार, संतोष का अर्थ 'मन के सम्यक आराम की अवस्था' से है। प्रगति करने के लिए मनुष्य के मस्तिष्क और ऊर्जा का संतुलित होना अनिवार्य है।
भटकाव से मुक्ति: जब मन अतिलोभ के कारण "कुत्ते की तरह जड़ की ओर" दौड़ता रहता है, तो उसकी ऊर्जा केवल और अधिक भौतिक वस्तुएं जुटाने के अंतहीन चक्र में नष्ट हो जाती है।
एकाग्रता का उदय: इसके विपरीत, जब मन में संतोष (सम्यक आराम) होता है, तब मानसिक भटकाव रुकता है। ठहराव से विचार स्पष्ट होते हैं और यही स्पष्टता मनुष्य को रचनात्मक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्रों में वास्तविक प्रगति करने के योग्य बनाती है।
2. अंधाधुंध संचय बनाम रचनात्मक विकास
असंतोष अक्सर मनुष्य को 'लखपति से करोड़पति' बनने की अंधी दौड़ में धकेल देता है, जहाँ धन ही जीवन का सर्वस्व बन जाता है। इस स्थिति को प्रगति नहीं कहा जा सकता, क्योंकि:
जीवनवेद के अनुसार, इस अंधी दौड़ से मन में 'जड़ता' आती है और शरीर 'अपटु' (अक्षम) होने लगता है।
जो मनुष्य अपने सामर्थ्य से अधिक मानसिक और शारीरिक बोझ उठाता है, वह भीतर से खोखला हो जाता है।
वास्तविक प्रगति का सूचक यह है कि मनुष्य अपने विवेक और न्यायोचित उपार्जन से संतुष्ट रहकर अपनी ऊर्जा का उपयोग समाज के उत्थान, कला, विज्ञान और आत्मिक विकास जैसे उच्च उद्देश्यों में करे।
3. संतोष अकर्मण्यता नहीं, बल्कि जागृत चेतना है
अक्सर लोग संतोष को कायरता या भाग्यवादिता मान लेते हैं, लेकिन 'जीवन वेद' का दर्शन इस भ्रम को पूरी तरह तोड़ता है:
अधिकारों के लिए संग्राम: जीवनवेद में स्पष्ट कहा गया है कि संतोष का अर्थ यह नहीं है कि कोई आपके सीधेपन का फायदा उठाकर आप पर अत्याचार करे और आप उसे चुपचाप सह लें। अपने अस्तित्व की रक्षा और न्यायोचित अधिकारों की प्रतिष्ठा के लिए जीवन के सभी क्षेत्रों में "मिलित रूप से संग्राम" करना ही सच्ची प्रगति है।
लोभ रहित संघर्ष: जब हम अतिलोभ के वश में हुए बिना, शांत चित्त से न्याय और प्रगति के लिए संघर्ष करते हैं, तो वह हमारी आंतरिक शक्ति और चेतना की प्रगति का सूचक होता है।
4. प्रगति का वास्तविक पैमाना
प्रगति केवल भौतिक वस्तुओं या बैंक बैलेंस की संख्या बढ़ाना नहीं है। यदि एक करोड़पति भी मानसिक रूप से दरिद्र है और "रुपया कहाँ है, दिन काटा जा रहा है" जैसी मानसिक स्थिति में जी रहा है, तो वह वास्तव में प्रगतिशील नहीं है।
असली प्रगति का सूचक 'संतोष साधना' है, जिसके माध्यम से मनुष्य 'स्वगत अभिभावन' (Auto-suggestion) द्वारा अपने मन को हीन और लोभी प्रवृत्तियों से ऊपर उठाता है। जब समाज का हर व्यक्ति आंतरिक रूप से संतुष्ट और बाहरी रूप से प्रगतिशील होगा, तभी एक स्वस्थ, न्यायसंगत और उन्नत समाज का निर्माण संभव है।
निष्कर्ष
संतोष प्रगति की राह में कोई गतिरोध (स्पीड ब्रेकर) नहीं है, बल्कि यह वह ईंधन है जो मन की मशीनरी को बिना गर्म (Overheat) हुए लंबी दूरी तय करने की शक्ति देता है। असंतोष हमें केवल दौड़ाता है, जबकि संतोष हमें सही दिशा में आगे बढ़ाता है। इसलिए, संतोष प्रगति में बाधक नहीं, बल्कि मानव चेतना की वास्तविक प्रगति का सबसे बड़ा सूचक है।
संतोषी जीवन सदा सुखी, खुशहाल एवं अग्रगामी
यह उक्ति मानव जीवन के उस परम सत्य को रेखांकित करती है जिसे समझे बिना भौतिक रूप से कितनी भी उन्नति कर ली जाए, जीवन अधूरा ही रहता है। संतोष अध्याय में प्रतिपादित 'जीवन वेद' के व्यावहारिक दर्शन के आलोक में यदि हम इस विचार का विश्लेषण करें, तो इसके तीन स्पष्ट आयाम उभरकर सामने आते हैं: सुख (आंतरिक शांति), खुशहाली (मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य), और अग्रगामी (प्रगतिशील दृष्टिकोण)।
1. संतोषी जीवन सदा सुखी (सम्यक आराम की स्थिति)
सच्चा सुख किसी बाह्य वस्तु में नहीं, बल्कि मन की एक विशेष अवस्था में होता है।
क्षणिक सुख बनाम स्थायी सुख: जब मन किसी इच्छा के पीछे भागता है, तो वस्तु मिलने पर उसे एकाध घंटे के लिए तो आराम मिल सकता है, लेकिन उसके तुरंत बाद मन किसी दूसरी ओर भागने लगता है। इस अंतहीन दौड़ में सच्चा सुख कभी नहीं मिलता।
तोष से संतोष: 'तोष' का अर्थ है मन के आराम की अवस्था और 'सन्तोष' का अर्थ है सम्यक (पूर्ण) रूप से आराम। जब मनुष्य अपनी तीव्र इच्छाओं पर नियंत्रण पाकर मन को स्थिर करता है, तब उसे वह आंतरिक सुख प्राप्त होता है जो किसी भी भौतिक संपदा से बड़ा है।
2. संतोषी जीवन सदा खुशहाल (जड़ता और व्याधियों से मुक्ति)
खुशहाली का सीधा संबंध हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से है। जब जीवन में संतोष का अभाव होता है, तो खुशहाली गायब हो जाती है।
अतिलोभ के दुष्परिणाम: जब एक लखपति या करोड़पति बनने की अंधी दौड़ में व्यक्ति अपरिग्रह के बोध को खो देता है, तो वह दिन-रात केवल अर्थोपार्जन और धन संचय के उन्माद में लगा रहता है।
स्वास्थ्य की रक्षा: इस अत्यधिक लोभ-लालसा के कारण मन में 'जड़ता' आ जाती है और दीर्घकाल तक मानसिक शांति की उपेक्षा करने से शरीर 'अपटु' (अक्षम व बीमार) होने लगता है। इसके विपरीत, संतोष साधना अपनाने वाला व्यक्ति अपने सामर्थ्य से अधिक बोझ नहीं उठाता, जिससे उसका शरीर और मन दोनों स्वस्थ, ऊर्जावान और खुशहाल बने रहते हैं।
3. संतोषी जीवन सदा अग्रगामी (प्रगतिशील और संघर्षशील)
सबसे महत्वपूर्ण और अनूठा विचार यह है कि संतोषी जीवन कभी रुकता नहीं, बल्कि वह सदैव 'अग्रगामी' यानी आगे बढ़ने वाला होता है। जीवन वेद का दर्शन स्पष्ट करता है कि संतोष का मतलब भाग्य के भरोसे बैठ जाना या अकर्मण्य होना नहीं है।
शोषण के विरुद्ध सजगता: संतोष का अर्थ यह कदापि नहीं है कि कोई आपके सीधेपन का अनुचित लाभ उठाकर आपको ठग ले या आप पर अत्याचार करे और आप उसे चुपचाप सह लें। अपने अस्तित्व की रक्षा और न्यायोचित अधिकारों की प्रतिष्ठा के लिए जीवन के सभी क्षेत्रों में सदैव "मिलित रूप से संग्राम" करते रहना ही अग्रगामी होने की पहचान है।
भय और लोभ मुक्त प्रगति: एक संतोषी व्यक्ति ही बिना किसी अति-लोभ के, शांत मस्तिष्क और दृढ़ संकल्प के साथ समाज को सही दिशा में आगे ले जा सकता है। उसकी प्रगति केवल व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं होती, बल्कि पूरे समाज के कल्याण के लिए होती है।
निष्कर्ष
संतोषी जीवन वास्तव में एक 'संतोष साधना' है। यह साधना हमें 'स्वगत अभिभावन' (Auto-suggestion) के माध्यम से अपनी निम्न प्रवृत्तियों को जीतकर उच्च प्रवृत्तियों की ओर बढ़ना सिखाती है। जो मनुष्य न्यायोचित रूप से उपार्जित साधनों में तृप्त रहना सीख जाता है और साथ ही अपने अधिकारों व लोक-कल्याण के लिए संघर्षरत रहता है, उसका जीवन वास्तव में सदा सुखी, खुशहाल और निरंतर अग्रगामी बना रहता है।
संतोष जीवन का आधार, पहचान एवं पुकार
यह वाक्य मानव जीवन के आंतरिक विकास और उसकी सामाजिक भूमिका को एक बेहद ऊंचे धरातल पर स्थापित करता है। संतोष अध्याय में दिए गए 'जीवन वेद' के अनूठे दर्शन के प्रकाश में यदि हम इन तीनों शब्दों — आधार, पहचान और पुकार — को समझें, तो संतोष का एक अत्यंत क्रांतिकारी रूप हमारे सामने प्रकट होता है।
1. संतोष जीवन का 'आधार' (The Foundation)
जिस प्रकार किसी भी विशाल इमारत को टिकने के लिए एक मजबूत नींव या आधार की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार एक स्थिर और प्रगतिशील जीवन के लिए संतोष ही एकमात्र आधार है।
भटकाव का अंत: जीवनवेद के अनुसार, मन की साधारण अवस्था में मनुष्य "कुत्ते की तरह जड़ की ओर" दौड़ता रहता है, जहाँ उसकी इच्छाओं का अंत नहीं होता। भौतिक वस्तुओं के पीछे भागने से मन कभी तृप्त नहीं हो सकता।
मानसिक विश्राम: संतोष का वास्तविक अर्थ ही 'मन का सम्यक आराम' है। जब जीवन को यह आधार मिलता है, तब मन की अंतहीन दौड़ थम जाती है। मन को वह स्थिरता प्राप्त होती है, जिसके बिना किसी भी नैतिक, आध्यात्मिक या रचनात्मक जीवन की कल्पना असंभव है। यह मनुष्य को अतिलोभ की उस अंधी दौड़ से बचाता है जो मन में 'जड़ता' और शरीर में 'अपटुता' (अक्षमता) पैदा करती है।
2. संतोष जीवन की 'पहचान' (The Identity)
एक सच्चे साधक, नैतिक व्यक्ति और समाज सुधारक की वास्तविक पहचान उसके भीतर का संतोष ही है।
अखंड व्यक्तित्व: समाज में 'लखपति और करोड़पति' बनने के उन्माद में लोग अपनी पहचान खो देते हैं। वे धन संचय को ही जीवन का सर्वस्व मान लेते हैं और "रुपया कहाँ है, दिन काटा जा रहा है" जैसी दीन मानसिक स्थिति में जीते हैं।
साधना से निर्मित चरित्र: एक संतोषी व्यक्ति की पहचान उसके संतुलित और अडिग चरित्र से होती है। वह 'स्वगत अभिभावन' (Auto-suggestion) की मानसिक प्रचेष्टा के माध्यम से अपने मन को निम्न प्रवृत्तियों से दूर रखता है। उसकी पहचान इस बात से नहीं होती कि उसके पास कितनी भोग्य वस्तुएं हैं, बल्कि इस बात से होती है कि उसका अपने मन पर कितना नियंत्रण है और वह न्यायोचित उपार्जन में कितना तृप्त है।
3. संतोष जीवन की 'पुकार' (The Clarions Call)
यह इस दर्शन का सबसे ऊर्जस्वी (Energetic) और गतिशील पहलू है। संतोष कोई ठहरी हुई या चुपचाप बैठ जाने वाली अवस्था नहीं है, बल्कि यह अन्याय और अतिलोभ के विरुद्ध एक 'पुकार' है।
अन्याय के विरुद्ध संघर्ष: जीवनवेद स्पष्ट रूप से उद्घोष करती है कि संतोष का अर्थ यह नहीं है कि कोई आपके सीधेपन का अनुचित लाभ उठाकर आपको ठग ले, या आप पर अत्याचार करे और आप मुँह बंद करके उसे सहते रहें। अपने अस्तित्व की रक्षा और अपनी न्यायोचित भावना का त्याग करना कभी उचित नहीं है।
सम्मिलित संग्राम की पुकार: जीवन के सभी क्षेत्रों में अधिकारों की प्रतिष्ठा के लिए "सदैव मिलित रूप से संग्राम" करते रहना ही संतोष की वास्तविक पुकार है। यह पुकार हमें सिखाती है कि समाज में शोषण के खिलाफ लड़ते हुए भी, हमें अपने भीतर अति-लोभ को प्रवेश नहीं करने देना है।
निष्कर्ष
संतोष वास्तव में जीवन को स्थिरता देने वाला 'आधार' है, मनुष्य के उच्च और नैतिक चरित्र की 'पहचान' है, और समाज में न्याय व अधिकारों की रक्षा के लिए सम्मिलित रूप से लड़ने की एक सशक्त 'पुकार' है। जब संतोष इन तीनों रूपों में हमारे जीवन में प्रकट होता है, तब वह व्यक्ति और समाज दोनों को एक नई चेतना और वास्तविक खुशहाली से भर देता है।
संतोष से विकास की ओर
यह विषय इस शाश्वत सत्य को उजागर करता है कि जीवन में वास्तविक और स्थायी विकास (Development) की शुरुआत केवल आंतरिक संतोष से ही संभव है। जब मनुष्य का मन असंतोष की अंधी दौड़ से मुक्त होकर संतोष को अपना आधार बनाता है, तभी वह समग्र विकास के पथ पर अग्रसर हो सकता है।
संतोष अध्याय में प्रतिपादित 'जीवन वेद' के व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक दर्शन के अनुसार, 'संतोष से विकास' की यह यात्रा निम्नलिखित महत्वपूर्ण चरणों से होकर गुजरती है:
1. मानसिक भटकाव का अंत और ऊर्जा का संचय
विकास के लिए सबसे पहली आवश्यकता है — ऊर्जा की एकाग्रता (Focus)।
असंतोष में ऊर्जा का क्षय: जब मनुष्य का मन भौतिक इच्छाओं के वश में होकर "कुत्ते की तरह जड़ की ओर" दौड़ता रहता है, तो उसकी मानसिक और शारीरिक ऊर्जा केवल और अधिक संचय करने के अंतहीन चक्र में नष्ट हो जाती है।
संतोष से स्थिरता: संतोष का अर्थ है 'मन के सम्यक आराम की अवस्था'। जब मन को यह आराम मिलता है, तो उसका व्यर्थ का दौड़ना बंद हो जाता है। मन की इस स्थिरता से जो ऊर्जा बचती है, वही मनुष्य के रचनात्मक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास का ईंधन बनती है।
2. 'जड़ता' से 'चेतना' का विकास
अंधाधुंध भौतिक विकास, जहाँ केवल धन और संपदा का संचय ही सर्वस्व हो, वह वास्तव में मनुष्य को पीछे धकेलता है।
अंधाधुंध संचय के दुष्परिणाम: जीवनवेद के अनुसार, जब एक लखपति या करोड़पति अत्यधिक लोभ-लालसा में उन्मत्त रहता है, तो उसका मन 'जड़' हो जाता है और शरीर 'अपटु' (अक्षम) होने लगता है। ऐसे विकास का अंत केवल मानसिक तनाव और बीमारी में होता है।
चेतना का उदय: जब मनुष्य 'संतोष साधना' को अपनाता है और अपने सामर्थ्य के अनुसार न्यायोचित अर्जन में तृप्त रहता है, तब उसका मन जड़ता से मुक्त होकर उच्च चेतना की ओर बढ़ता है। यही मानसिक और आत्मिक प्रगति वास्तविक विकास है।
3. स्वगत अभिभावन से व्यक्तिगत रूपांतरण
संतोष से विकास की ओर बढ़ने के लिए 'जीवन वेद' में एक बहुत ही व्यावहारिक मनोवैज्ञानिक मार्ग सुझाया गया है — स्वगत अभिभावन (Auto-suggestion)।
जब हम निरंतर आत्म-निरीक्षण करते हैं और मन में उठने वाली लोभ या हीन वृत्तियों को अपने सकारात्मक विचारों (विरोधी भावधारा) से शांत करते हैं, तो हमारे स्वभाव में गहरा परिवर्तन आता है।
यह आंतरिक रूपांतरण मनुष्य को एक कुशल, विचारशील और संतुलित मार्गदर्शक के रूप में विकसित करता है, जो समाज के विकास में रचनात्मक योगदान दे सके।
4. सामूहिक विकास के लिए 'मिलित संग्राम'
'संतोष से विकास' का यह दर्शन व्यक्तिवादी नहीं है, बल्कि अत्यंत सामाजिक और प्रगतिशील है।
शोषण मुक्त विकास: संतोष का अर्थ कायरता या अत्याचार को सहना नहीं है। अपने अस्तित्व की रक्षा और न्यायोचित अधिकारों के लिए जीवन के सभी क्षेत्रों में "सदैव मिलित रूप से संग्राम" करना इस दर्शन का मूल मंत्र है।
संतुलित समाज का निर्माण: जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति अति-लोभ से मुक्त होकर सामूहिक अधिकारों और लोक-कल्याण के लिए संघर्ष करता है, तो एक ऐसे समतावादी समाज का विकास होता है जहाँ मूलभूत आवश्यकताएँ (भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सा, शिक्षा) सभी को सुलभ होती हैं।
निष्कर्ष
'संतोष से विकास की ओर' बढ़ना ही मानव सभ्यता की सच्ची उन्नति है। संतोष हमें सिखाता है कि विकास की अंधी दौड़ में हमें अपनी मानसिक शांति और शारीरिक क्षमता को नष्ट नहीं करना है। जब हमारा आंतरिक आधार 'संतोष' से सुदृढ़ होता है, तब हमारा बाहरी प्रयास समाज को एक न्यायसंगत, खुशहाल और निरंतर अग्रगामी विकास की दिशा में ले जाता है।
संतोष से समाधि की ओर
यह विषय मानव चेतना की उस सर्वोच्च यात्रा को दर्शाता है, जहाँ एक साधक लौकिक (भौतिक) बंधनों से मुक्त होकर पारलौकिक (आध्यात्मिक) आनंद में लीन हो जाता है। अष्टांग योग और भारतीय दर्शन में संतोष को केवल एक नैतिक गुण नहीं, बल्कि 'समाधि' जैसी उच्च अवस्था तक पहुँचने का एक अनिवार्य सोपान (सीढ़ी) माना गया है।
संतोष अध्याय में दिए गए 'जीवन वेद' के गहरे मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सिद्धांतों के आधार पर यदि हम इस यात्रा का विश्लेषण करें, तो 'संतोष से समाधि' का मार्ग निम्नलिखित चरणों में स्पष्ट होता है:
1. चित्त की स्थिरता (चित्तवृत्ति निरोध)
समाधि का अर्थ है मन की वह अवस्था जहाँ आत्मा परमात्मा में पूरी तरह विलीन हो जाती है और सभी मानसिक तरंगें शांत हो जाती हैं। परंतु यह तब तक संभव नहीं है जब तक मन में अशांति हो।
इच्छाओं का अंतहीन चक्र: जीवनवेद के अनुसार, साधारण अवस्था में मनुष्य का मन "भोगिभिमुखी वृत्ति लेकर कुत्ते की तरह जड़ की ओर" दौड़ता रहता है। जब तक मन वस्तुओं के पीछे भागता रहेगा, वह कभी एकाग्र नहीं हो सकता।
सम्यक आराम से एकाग्रता: संतोष का अर्थ है 'मन के सम्यक आराम की अवस्था'। जब मन अपनी इच्छाओं को विराम देकर आंतरिक रूप से शांत और संतुष्ट हो जाता है, तब चित्त की चंचलता समाप्त होती है। यही स्थिर चित्त समाधि की पहली आवश्यकता है।
2. 'जड़ता' से 'अध्यात्म' की ओर संक्रमण
जब मनुष्य अत्यधिक लोभ और धन संचय के उन्माद में लगा रहता है, तो उसका मन 'जड़' हो जाता है और वह केवल दृश्य जगत को ही सत्य मानने लगता है।
आंतरिक ऊर्जा का उर्ध्वगमन: संतोष साधना के माध्यम से जब मनुष्य अपने सामर्थ्य से अधिक बोझ उठाना बंद कर देता है, तो उसकी ऊर्जा बाह्य विषयों (जड़ वस्तुओं) से हटकर भीतर की ओर मुड़ने लगती है।
जब मन जड़ता को छोड़कर सूक्ष्म तत्वों की ओर बढ़ता है, तो साधक का झुकाव स्वतः ही ध्यान, धारणा और अंततः समाधि की ओर होने लगता है।
3. स्वगत अभिभावन (Auto-suggestion) और ध्यान का परिपक्व रूप
जीवनवेद में वर्णित 'स्वगत अभिभावन' (Auto-suggestion) की प्रक्रिया आध्यात्मिक मार्ग में 'मन्त्र जप' और 'ध्यान' का रूप ले लेती है।
मन का रूपांतरण: जब साधक निरंतर अपने मन में उठने वाली हीन या सांसारिक वृत्तियों को 'विरोधी भावधारा' (ईश्वरीय चिंतन या संतोष के भाव) से शांत करता है, तो मन के सारे मैल (संस्कार) धुल जाते हैं।
यह निरंतर मानसिक प्रचेष्टा साधक को 'सचेत ध्यान' से 'गहरे ध्यान' की ओर ले जाती है, जो आगे चलकर समाधि का मार्ग प्रशस्त करती है।
4. निडरता और अनासक्ति ( detachment )
'जीवन वेद' का यह दर्शन साधक को कायर या पलायनवादी नहीं बनाता, बल्कि उसे निडर बनाता है।
संग्राम और अनासक्ति: इसमें स्पष्ट कहा गया है कि अपने अस्तित्व की रक्षा और न्यायोचित अधिकारों के लिए "मिलित रूप से संग्राम" करना मनुष्य का कर्तव्य है।
एक सच्चा योगी संसार में रहते हुए अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा से करता है (जैसे कर्मयोग), परंतु वह कर्मों के फलों या भौतिक संपदा से आसक्त (attached) नहीं होता। यही अनासक्ति या वैराग्य उसे समाधि के उच्चतम शिखर पर ले जाता है।
निष्कर्ष
'संतोष से समाधि की ओर' की यात्रा वास्तव में 'बाहर से भीतर की ओर' लौटने की यात्रा है। संतोष मन की वह विश्राम अवस्था है जो साधक के अंतःकरण को शुद्ध और स्थिर करती है। जब संतोष साधना परिपक्व हो जाती है, तो मन पूरी तरह से शांत होकर शून्य या ब्रह्मांडीय चेतना में विलीन हो जाता है, जिसे 'समाधि' कहा जाता है। इसलिए, संतोष केवल सुखी जीवन का आधार नहीं, बल्कि परम मोक्ष और समाधि का द्वार भी है।
संतोष के अनुपालन से सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं चारित्रिक व नैतिक अपराधों से व्यक्ति दूर रहता है
यह कथन इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि संतोष केवल एक व्यक्तिगत या आध्यात्मिक गुण नहीं है, बल्कि यह एक स्वस्थ, सुरक्षित और अपराध-मुक्त समाज के निर्माण की सबसे बड़ी आधारशिला है।
जब मनुष्य जीवनवेद में प्रतिपादित 'जीवन वेद' के अनुसार 'संतोष साधना' को अपने जीवन में उतारता है, तो वह विभिन्न प्रकार के अपराधों और विकृतियों से स्वतः ही दूर हो जाता है। आइए इन सभी आयामों का गहराई से विश्लेषण करें:
1. आर्थिक अपराधों से मुक्ति (Prevention of Economic Crimes)
आज समाज में होने वाले अधिकांश अपराधों की जड़ में आर्थिक लोभ होता है।
अंधाधुंध संचय की प्रवृत्ति: जीवनवेद के अनुसार, जब मनुष्य के भीतर अपरिग्रह बोध का अभाव होता है, तो 'लखपति से करोड़पति' बनने का उन्माद उसे घेर लेता है। वह धन संचय को ही जीवन का सर्वस्व मान बैठता है।
अपराधों पर अंकुश: इस अतिलोभ के वश में होकर ही मनुष्य भ्रष्टाचार, जमाखोरी, ठगी, टैक्स चोरी और दूसरों के हकों को मारने जैसे आर्थिक अपराध करता है। जब व्यक्ति संतोष साधना के माध्यम से अपने सामर्थ्य के अनुसार न्यायोचित उपार्जन में तृप्त रहना सीख जाता है, तो उसके भीतर से इन आर्थिक अपराधों की इच्छा ही समाप्त हो जाती है।
2. सामाजिक एवं चारित्रिक-नैतिक अपराधों से दूरी (Social, Character & Moral Upliftment)
संतोष का सीधा संबंध मनुष्य के चरित्र और उसकी मानसिक प्रवृत्तियों से है।
मानसिक प्रचेष्टा द्वारा रूपांतरण: जीवनवेद में वर्णित 'स्वगत अभिभावन' (Auto-suggestion) वह मानसिक प्रक्रिया है, जिसमें साधक अपने मन में उठने वाली हीन और लोभात्मक वृत्तियों को 'विरोधी भावधारा' से शांत करता है।
चारित्रिक शुद्धता: जब मन में संतोष का वास होता है, तो काम, क्रोध, मद और लोभ जैसी हीन वृत्तियां शिथिल हो जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति सामाजिक व चारित्रिक अपराधों (जैसे हिंसा, शोषण, दुराचार और आपसी वैमनस्य) से दूर रहता है। संतोषी व्यक्ति का चरित्र समाज के लिए अनुकरणीय बन जाता है।
3. राजनैतिक अपराधों पर नियंत्रण (Political Integrity)
राजनैतिक क्षेत्र में संतोष का अनुपालन सत्ता के लोलुपों को सही मार्ग दिखाता है।
सत्ता और लोभ का गठजोड़: जब राजनीति में संतोष का अभाव होता है, तो नेता और नीति-निर्माता लोक-कल्याण को भूलकर केवल अपनी सत्ता बनाए रखने और अवैध रूप से धन इकट्ठा करने के लोभ में डूब जाते हैं। यही से राजनैतिक अपराधीकरण, भाई-भतीजावाद और पद का दुरुपयोग जनम लेता है।
नैतिक नेतृत्व का उदय: संतोषी जीवन जीने वाला राजनेता कभी भी अतिलोभ के वश में होकर अपनी शारीरिक और मानसिक शक्ति को नष्ट नहीं करता। वह राजनीति को व्यक्तिगत अर्जन का साधन नहीं, बल्कि समाज की सेवा और अधिकारों की रक्षा का माध्यम मानता है।
4. सांस्कृतिक अपराधों से रक्षा (Cultural Preservation)
सांस्कृतिक अपराध का अर्थ है अपनी मूल सांस्कृतिक विरासत, नैतिक मूल्यों और जीवन दर्शन की उपेक्षा करके अभद्र या विकृत प्रवृत्तियों को अपनाना।
जड़ता का विरोध: जीवनवेद के अनुसार, अत्यधिक लोभ-लालसा में उन्मत्त होकर मनुष्य का मन 'जड़' हो जाता है। यह जड़ता मनुष्य को अपनी संस्कृति और उच्च जीवन मूल्यों से विमुख कर देती है, जिससे सांस्कृतिक पतन होता है।
मूल्यों की पुनर्स्थापना: संतोष जीवन में एक ठहराव और विवेक लेकर आता है। यह विवेक मनुष्य को पाश्चात्य या बाजारवादी विकृतियों (अंधाधुंध उपभोक्तावाद) के सांस्कृतिक जाल में फंसने से बचाता है और उसे अपनी गौरवशाली सांस्कृतिक पहचान व मर्यादा में रहने की प्रेरणा देता है।
5. संतुलित संघर्ष: कायरता का निषेध
'जीवन वेद' के इस दर्शन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहाँ संतोष का अर्थ अपराधों के सामने घुटने टेकना या मूकदर्शक बनना नहीं है।
जीवनवेद में स्पष्ट किया गया है कि संतोष का उद्देश्य यह कदापि नहीं है कि कोई आपके सीधेपन का अनुचित लाभ उठाकर आप पर अत्याचार करे और आप मुँह बंद करके सहते रहें।
अपने अस्तित्व की रक्षा और न्यायोचित अधिकारों की प्रतिष्ठा के लिए जीवन के सभी क्षेत्रों में "सदैव मिलित रूप से संग्राम" करना ही सच्चा संतोष है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि हमें खुद तो लोभ के वश में होकर कोई अपराध नहीं करना है, परंतु यदि कोई दूसरा हमारे ऊपर अन्याय या अपराध करे, तो उसके खिलाफ सामूहिक रूप से आवाज़ उठानी है।
निष्कर्ष
संतोष का अनुपालन वास्तव में मनुष्य की चेतना को इतना ऊंचा उठा देता है कि वह किसी भी प्रकार के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक या नैतिक अपराध की ओर प्रवृत्त ही नहीं होता। संतोषी जीवन व्यक्ति को आंतरिक शांति देता है और समाज को अपराध-मुक्त, न्यायसंगत व पूरी तरह सुरक्षित बनाता है। इसलिए, संतोष केवल एक व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का अचूक अस्त्र है।
सन्तोष एक उद्घोष है: 'जीवनवेद' के आलोक में
प्रस्तुति : करण सिंह शिवतलाव
मनुष्य के इतिहास में क्रांतियाँ हमेशा नारों और उद्घोषों से जनमी हैं, लेकिन सबसे बड़ी क्रांति वह होती है जो मनुष्य के आंतरिक जगत को झकझोर कर रख दे। 'जीवनवेद' के गंभीर अध्ययन से यह सत्य उभरकर सामने आता है कि 'सन्तोष' कोई चुप्पी नहीं, कोई कायरता नहीं, बल्कि अतिलोभ और मानसिक दासता के विरुद्ध एक बुलंद उद्घोष है।
यह आलेख स्पष्ट करता है कि कैसे सन्तोष साधना मनुष्य को जड़ता से मुक्त कर एक जागृत योद्धा के रूप में स्थापित करती है।
१. जड़ता और मानसिक दासता के विरुद्ध उद्घोष
साधारण अवस्था में मनुष्य का मन स्वतंत्र नहीं है। वह "भोगाभिमुखी वृत्ति लेकर कुत्ते की तरह जड़ की ओर दौड़ता है" और बाह्य वस्तुओं का गुलाम बन जाता है। इस अंधी दौड़ में लखपति करोड़पति बनने के उन्माद में लगा रहता है और अपनी मानसिक व शारीरिक शक्ति को नष्ट कर बैठता है।
ऐसे समय में सन्तोष का पालन करना एक शक्तिशाली उद्घोष है। यह मन की इस अंधी और अनियंत्रित दौड़ को रोकने की "एक विशेष प्रकार की मानसिक प्रचेष्टा" है। यह उद्घोष घोषणा करता है: “मैं वस्तुओं का गुलाम नहीं हूँ। मैं अपनी सामर्थ्य से अतिरिक्त बोझ अपने शरीर और मन पर नहीं डालूँगा।” यह मानसिक प्रचेष्टा मनुष्य को अतिलोभात्मक कार्यों से दूर रखकर उसकी आंतरिक स्वतंत्रता की बहाली का शंखनाद करती है।
२. 'स्वागत अभिभावन' का वैचारिक उद्घोष
सन्तोष कोई निष्क्रिय अवस्था नहीं है, बल्कि यह मन के भीतर चलने वाला एक निरंतर वैचारिक युद्ध है। जब मन किसी हीन वृत्ति या लोभ की ओर भागता है, तो साधक 'स्वागत अभिभावन' (Auto-suggestion) की पद्धति को अपनाता है।
वह मन ही मन उस हीन वृत्ति के ठीक विपरीत 'विरोधी विचारधारा' का लगातार जप करता है। यह आंतरिक जप वास्तव में मन की विकृतियों के खिलाफ एक आत्मिक उद्घोष है, जो मनुष्य के स्वभाव को बदलकर उसे वासना और लोभ के दलदल से बाहर निकालता है।
३. कायरता के विरुद्ध और अधिकारों की रक्षा का उद्घोष
अक्सर लोग सन्तोष का गलत अर्थ निकालकर इसे शोषण सहने का हथियार मान लेते हैं। लेकिन यह आलेख इस धारणा को पूरी तरह ध्वस्त करता है। 'जीवनवेद' में अत्यंत तीखे शब्दों में उद्घोष किया गया है:
"सन्तोष साधना का उद्देश्य यह नहीं है कि कोई तुम्हें किसी प्रकार ठग ले, या तुम्हारे सीधेपन का सुयोग पाकर तुम्हारे ऊपर अत्याचार करे और तुम मुँह बन्द करके उसको सह लो।"
यह पंक्ति सिद्ध करती है कि सन्तोष अन्याय के सामने घुटने टेकना नहीं सिखाता। अपने अस्तित्व की रक्षा करना और अपनी न्यायोचित भावना को बनाए रखना प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। सच्चा सन्तोषी वह है जो अपनी ऊर्जा को लोभ में नष्ट नहीं करता, बल्कि उसे न्याय की स्थापना में लगाता है। यह सीधेपन और कायरता के विरुद्ध स्वाभिमान का एक सिंहनाद है।
४. मिलित संग्राम और सामाजिक क्रांति का उद्घोष
सन्तोष का अंतिम और सबसे व्यापक रूप सामाजिक धरातल पर प्रकट होता है। यह उद्घोष व्यक्ति को अकेले कोने में बैठने की सलाह नहीं देता, बल्कि जीवन के सभी क्षेत्रों में अधिकार की प्रतिष्ठा के लिए "सदैव मिलित रूप से (सामूहिक रूप से) संग्राम" करने की प्रेरणा देता है।
जब समाज का सन्तुष्ट और नैतिक वर्ग एकजुट होकर संघर्ष करता है, तो वह अतिलोभ से ग्रसित शोषकों के साम्राज्य को हिलाकर रख देता है। यह मिलित संग्राम ही समाज को अपराध-मुक्त और न्यायपूर्ण बनाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
निष्कर्ष
अतः यह पूरी तरह स्पष्ट है कि सन्तोष कोई बुझी हुई राख नहीं, बल्कि एक धधकती हुई मशाल है। यह 'अतिलोभ के विरुद्ध', 'मानसिक जड़ता के विरुद्ध' और 'अन्याय व शोषण के विरुद्ध' मानव चेतना का एक ऐसा अमर उद्घोष है, जो मनुष्य को आंतरिक शांति (सम्यक आराम) भी प्रदान करता है और समाज में न्याय की प्रतिष्ठा के लिए सामूहिक क्रांति का मार्ग भी दिखाता है। यह जीवन को सही अर्थों में जीने का 'जीवनवेद' है।
सन्तोष साधना (जीवनवेद)
— आनन्द किरण
'तोष' शब्द का अर्थ अनूठा, मन का सहज आराम है,
और 'सन्तोष' का सम्यक मतलब, पूर्ण तृप्ति का नाम है।
साधारण मानव का यह मन, सुख पाकर भी रोता है,
बिना साधना परम शान्ति का, अनुभव कहाँ होता है?
संतोषी मन सदा, संतोष है प्रगतिशीलता की पहचान
भोगाभिमुखी वृत्ति लिए यह, जग की ओर दौड़ता है,
जड़ वस्तुओं के पीछे मन, मर्यादा को छोड़ता है।
जैसे कुत्ता दौड़ रहा हो, सुध-बुध अपनी खोकर के,
मन भी वैसे ही भटका है, दास जगत का होकर के।
संतोषी मन सदा, संतोष है प्रगतिशीलता की पहचान
लखपति को सन्तोष कहाँ है, करोड़पति वह बनना चाहता,
करोड़ पाकर भी जीवन में, सुख का अंश न बुन पाता।
पूछो अगर अमीर से तुम क्या, 'रुपया पाकर सुखी हुए?'
वह रोकर कहता 'कहाँ रुपया, दिन कटते हैं मुए-मुए'।
संतोषी मन सदा, संतोष है प्रगतिशीलता की पहचान
अपरिग्रह का बोध नहीं है, अतिलोभों का डेरा है,
अर्थोपार्जन के उन्माद ने, मानव मन को घेरा है।
रुपया ही सर्वस्व बन गया, अन्धी दौड़ डराती है,
दीर्घकाल की यह अवज्ञा, तन को 'अपटु' बनाती है।
संतोषी मन सदा, संतोष है प्रगतिशीलता की पहचान
स्वाभाविक परिश्रम से जो, धन-सम्पत्ति आती है,
उससे ही सन्तुष्ट रहे मन, यह prachesta सुहाती है।
तन-मन पर अतिरिक्त बोझ न हो, यही नियम की साधना,
अतिलोभात्मक कार्यों से दूर, रखे यह आराधना।
संतोषी मन सदा, संतोष है प्रगतिशीलता की पहचान
हीन वृत्ति से मन हटाने, दो प्रक्रियाएँ फलप्रद हैं,
स्वागत और परगत अभिभावन, दोनों ही अति सरस-श्रम हैं।
मन ही मन विरोधी धारा का, जो साधक जप करता है,
'स्वागत अभिभावन' से उसका, जीवन नित निखरता है।
संतोषी मन सदा, संतोष है प्रगतिशीलता की पहचान
कानों में जब कोई आकर, बार-बार शुभ बात कहे,
'परगत अभिभावन' से फिर, दुर्गुण का न वास रहे।
पर सन्तोष का अर्थ नहीं यह, कोई तुमको ठग जाए,
सीधेपन का सुयोग उठाकर, तुम पर अत्याचार ढाए।
संतोषी मन सदा, संतोष है प्रगतिशीलता की पहचान
मुँह बन्द करके सहना अन्याय, सन्तोष का काम नहीं,
अस्तित्व रक्षा का अधिकार तजना, वीरों का नाम नहीं।
न्यायोचित भावना न त्यागो, अधिकारों पर अड़े रहो,
जीवन के हर एक क्षेत्र में, सीना ताने खड़े रहो।
संतोषी मन सदा, संतोष है प्रगतिशीलता की पहचान
अधिकारों की प्रतिष्ठा हित, तुमको लड़ना होगा,
'मिलित रूप से' महासंग्राम, जग में करना होगा।
पर अतिलोभ के वश में होकर, शक्ति नष्ट मत करना,
सन्तोष भाव के विरुद्ध जाकर, पाँवों को मत धरना।
संतोषी मन सदा, संतोष है प्रगतिशीलता की पहचान
0 Comments: