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आज का विषय है - एक मानव समाज (One Human Society) है।
आज के दौर में, जब हम जाति, संप्रदाय और क्षेत्रीयता के कोलाहल से घिरे हैं, 'एक मानव समाज' के आदर्श की अलख जगाए रखना अपने आप में एक महान उपलब्धि है। यह चिंतन मानवता के मूल में इतना गहरा है कि इसकी प्रथम ज्योति कब प्रज्ज्वलित हुई, इसका कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। परंतु यह सत्य है कि इतिहास में जितने भी महापुरुष और दार्शनिक हुए हैं, उनके चिंतन का केंद्र हमेशा 'एक मानव समाज' या इससे कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं रहा है। इस धरा पर आदिम युग से लेकर आज के अत्याधुनिक युग तक, 'एक मानव समाज' का यह उदात्त चिंतन सदैव जीवित रहा है। मैं भविष्य को पूर्णतः नहीं जानता, लेकिन जितना दूर तक मैं देख सकता हूँ, उस अनुभव के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि 'एक मानव समाज' का यह चिंतन कभी भी नष्ट नहीं होगा।
'एक मानव समाज' के चिंतन में ऐसी क्या खासियत रही है कि यह हमारे समाज में इतने लंबे समय से प्रवाहित होता आ रहा है और भविष्य में भी इसके चलते रहने की प्रबल संभावना है?
इसका उत्तर एक ही है : मनुष्य ने कभी भी अपूर्णता को स्वीकार नहीं किया है; वह सदैव पूर्णता में ही अपने आपको देखना चाहता है। चूंकि 'एक मानव समाज' से कम कोई भी ऐसा चिंतन नहीं है जो मनुष्य को 'समग्रता' और 'पूर्णता' की झलक दिखा सके, इसलिए 'एक मानव समाज' का यह चिंतन सदैव शाश्वत (Eternal) रहा है।
इसका दूसरा उत्तर यह है कि यह मनुष्य की मौलिक आवश्यकता (Existential Need) भी है। मनुष्य 'एक मानव समाज' की अवधारणा के बिना जीवित नहीं रह सकता। उसे जीवन के हर पल में अलग-अलग धाराओं और पृष्ठभूमियों के लोगों की सहायता लेनी पड़ती है। एक कृषक, एक डॉक्टर, एक शिक्षक, एक इंजीनियर—ये सभी परस्पर निर्भर हैं। अतः, कोई भी मनुष्य समग्रता (Wholeness) और पारस्परिक सहयोग के बिना पूर्ण जीवन नहीं जी सकता।
ये दो कारण—पूर्णता की आकांक्षा और पारस्परिक निर्भरता की आवश्यकता—ही 'एक मानव समाज' के चिंतन को कभी मरने नहीं देते, और यह आशा है कि भविष्य में भी इसे जीवित रखेंगे।
मनुष्य के पास 'एक मानव समाज' जैसा उदात्त चिंतन होने के बावजूद भी जाति, संप्रदाय तथा क्षेत्रीयता का संकीर्ण चिंतन क्यों विद्यमान है? यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है।
इसका भी एक ही उत्तर है: मनुष्य में विद्यमान पाशविक गुणों (Animalistic Instincts) का मानवीय गुणों पर प्रबल होना।
जैविक विज्ञान कहता है कि मनुष्य जैव जगत के क्रमिक विकास का परिणाम है, जबकि आध्यात्मिक विज्ञान यह मानता है कि प्रत्येक मनुष्य का आविर्भाव पशु जीवन की अवस्था से होकर हो रहा है। अतः, मनुष्य में व्याप्त पाशविक गुणधर्म—जैसे कि स्वार्थ, संचय की प्रवृत्ति, भय और प्रभुत्व की इच्छा—उसे 'एक मानव समाज' के विशाल विचार से विमुख करके संकीर्ण चिंतन की ओर आकर्षित करते हैं। इन्हीं पाशविक गुणों से वशीभूत होकर व्यवसायी-जीवी धूर्तों और स्वार्थी तत्वों ने 'एक मानव समाज' के मूल सूत्रों को तोड़-मरोड़ दिया है। यही विकृत रूप आज हमें जाति, संप्रदाय एवं क्षेत्रीयता के रूप में दिखाई देता है, जो मानवता को खंडित करता है।
यह 'एक मानव समाज' की थीम पर कार्य करने वाले मनुष्यों का सबसे गुरुत्वपूर्ण (Crucial) प्रश्न है। इसके सिद्ध न हो पाने के कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं -
सभी महापुरुषों ने 'एक मानव समाज' की आवश्यकता पर बल दिया, लेकिन इसकी निरंतर शिक्षण और क्रियान्वयन (Continuous Education and Implementation) के लिए 'एक मानव समाज' की पाठशाला एवं कार्यशाला का निर्माण नहीं किया। ऐसा नहीं है कि प्रयास नहीं हुए; अनेक मानव समाज शास्त्रियों ने संस्थाएँ स्थापित करने का प्रयास किया। परंतु सुस्पष्ट दार्शनिक धारणा (Clear Philosophical Blueprint) के अभाव में, उनकी यह संस्थाएँ अंततः एक विशिष्ट मत (Sect) या पथ (Cult) में तब्दील होकर रह गईं, जो फिर से संकीर्णता का शिकार हो गया।
➡️ समाधान हेतु प्रश्न : 'एक मानव समाज' के निर्माण के लिए एक ऐसी पाठशाला एवं कार्यशाला की स्थापना कैसे की जाए जो सतत् रूप से कार्यरत रहे और किसी भी संकीर्ण मतवाद से मुक्त होकर केवल मानवीय मूल्यों पर केंद्रित हो?
महापुरुषों ने जातिवाद, सांप्रदायिकता तथा क्षेत्रीयता को 'एक मानव समाज' की जड़ों को खोखला करने वाला बताया, लेकिन इसकी सर्वाधिक मजबूत जड़ जातीय विवाह पद्धति है। जाति की पहचान, संरचना और उसके अस्तित्व की निरंतरता का मूल आधार केवल जातीय विवाह व्यवस्था है। जातीय विवाह को खत्म करने की दिशा में कोई भी सुव्यवस्थित, व्यापक और साहसिक योजना नहीं दी गई। इसके चलते जाति और संप्रदाय व्यवस्था खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। यहाँ तक कि कुछ तथाकथित पहलें, जो आगे बढ़ीं, वे भी सुव्यवस्था के अभाव में एक नई जाति या उप-संप्रदाय को जन्म देकर रह गईं।
➡️ समाधान हेतु प्रश्न : जातीय विवाह समाप्ति की व्यवस्था का निर्माण कैसे किया जाए? 'विप्लवी विवाह' (Revolutionary Marriage) इसका एक मंच हो सकता है, लेकिन इस पर सतत् नज़र रखनी होगी कि यह मंच भी किसी नए मत अथवा पथ का हिमायती बनकर संकीर्णता को बढ़ावा न दे। यह सुनिश्चित करना होगा कि विवाह केवल मानवीय मूल्यों और आदर्शों पर आधारित हो, न कि किसी संप्रदाय विशेष पर।
निष्कर्ष और आह्वान
'एक मानव समाज' केवल एक स्वप्न नहीं, बल्कि मनुष्य के पूर्ण अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है। यह चिंतन शाश्वत है, किंतु इसे धरातल पर उतारने के लिए हमें पाशविक गुणों पर मानवीय गुणों की विजय स्थापित करनी होगी।
अब वेला है कि हम केवल प्रश्नों पर ही न रुकें, बल्कि मिलकर इन समस्याओं का समाधान भी ढूँढ़ें।
आओ, मिलकर 'एक मानव समाज' की स्थापना के मार्ग पर अग्रसर हों।
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