तृतीय सूत्र
१/३"तयोः सिद्धिः सञ्चरे प्रतिसञ्चरे च।”
भावार्थ :- किसी सत्ता का अस्तित्व उसकी कर्मधारा, भावना धारा अथवा साक्षित्व से निष्पन्न होता है। साक्षित्व भाव पुरुष का तथा शेष दो भाव मूलतः प्रकृति के हैं। इसीलिए कर्मधारा या भावनाधारा की हेतुभूत सत्ता के रूप में प्रकृति की सत्ता तभी सिद्ध होती है जब वह स्वयं विषय भाव ग्रहण करती है, वह स्वयं विषय भाव के साथ मिलकर एक हो जाती है। प्रकृति जो विषय भाव ग्रहण करती है, वह पुरुष के ऊपर उसके क्रमवर्द्धमान प्रभाव के कारण ही होता है। प्रकृति के इस विषय भाव का ग्रहण, पुरुष पर उसके क्रमवर्द्धमान प्रभाव से अर्थात् सञ्चरक्रिया में या क्रमह्रस्वमान प्रभाव से अर्थात् प्रतिसञ्चर क्रिया में निष्पन्न होता है। प्रकृति का प्रकाश सञ्चर या प्रतिसञ्चर क्रिया में ही होता है। प्रकृति के इस प्रकार के उपादान कारण के रूप में पुरुष तो है ही, इसके अतिरिक्त सर्वावस्था में पुरुष का साक्षित्व है।
सूत्र का विश्लेषण
इस सूत्र में मुख्य रूप से चार शब्दों का प्रयोग हुआ है। इनका व्याकरणिक विश्लेषण इस प्रकार है:
1. तयोः (Tayoh)
मूल शब्द: तत् (तद्) (सर्वनाम)।
व्याकरण: यह 'तद्' शब्द का षष्ठी विभक्ति (Genitive Case) का द्विवचन (Dual Number) रूप है।
अर्थ: 'उन दोनों का'। यहाँ यह 'पुरुष' और 'प्रकृति' (जो पूर्व के सूत्रों में वर्णित हैं) के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है। यह संबंध कारक को दर्शाता है, जिसका अर्थ है कि सिद्धि (उपलब्धि/साधना) उन दोनों से संबंधित है।
2. सिद्धिः (Siddhih)
मूल शब्द: सिध् (धातु) + क्तिन् (प्रत्यय)।
व्याकरण: 'सिद्धि' शब्द स्त्रीलिंग का प्रथमा विभक्ति का एकवचन रूप है। 'सिध्' धातु का अर्थ है 'पूरा करना', 'प्राप्त करना' या 'सिद्ध होना'।
अर्थ: उपलब्धि, पूर्णता, निष्पत्ति, या अस्तित्व का प्रमाण। यहाँ इसका तात्पर्य है कि अस्तित्व या अभिव्यक्ति का पूर्ण होना।
3. सञ्चरे (Sanchare)
मूल शब्द: सम् + चर् (धातु) + घञ् (प्रत्यय)।
व्याकरण: यह 'सञ्चर' शब्द की सप्तमी विभक्ति (Locative Case) का एकवचन रूप है।
अर्थ: 'सञ्चर' का अर्थ है संचरण, बाह्यमुखी गति (Extroversion), या सृजन की प्रक्रिया। सप्तमी विभक्ति होने के कारण इसका अर्थ 'सञ्चर की अवस्था में' या 'सञ्चर प्रक्रिया में' है।
4. प्रतिसञ्चरे (Pratisanchare)
मूल शब्द: प्रति + सम् + चर् (धातु) + घञ् (प्रत्यय)।
व्याकरण: यह 'प्रतिसञ्चर' शब्द की सप्तमी विभक्ति का एकवचन रूप है।
अर्थ: 'प्रतिसञ्चर' का अर्थ है प्रति-गमन, अन्तर्मुखी गति (Introversion), या विलय की प्रक्रिया। सप्तमी विभक्ति के कारण इसका अर्थ 'प्रतिसञ्चर की अवस्था में' है।
च (Cha)
यह एक अव्यय (Indeclinable) है जिसका अर्थ है 'और'।
निष्कर्ष
व्याकरण की दृष्टि से यह सूत्र यह स्पष्ट करता है कि सिद्धि (अस्तित्व की पूर्णता या अभिव्यक्ति) का आधार सञ्चर (विकास/सृजन) और प्रतिसञ्चर (लय/विलय) की प्रक्रियाएं हैं, और ये दोनों प्रक्रियाएं 'तयोः' (पुरुष और प्रकृति) के परस्पर संबंधों पर आधारित हैं।
भावार्थ का विश्लेषण
सूत्र की विस्तृत दार्शनिक मीमांसा निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत की जा सकती है:
अस्तित्व के तीन मापदंड:
दार्शनिक दृष्टिकोण से किसी भी सत्ता या तत्व का अस्तित्व तीन मुख्य आधारों पर प्रमाणित (निष्पन्न) होता है:
कर्मधारा: क्रिया या कार्य करने की क्षमता।
भावना धारा: विचार, अनुभूति या भाव की क्षमता।
साक्षित्व: दृष्टा या साक्षी होने का भाव।
पुरुष और प्रकृति का स्वरूप:
उपर्युक्त तीन मापदंडों में से 'साक्षित्व भाव' विशुद्ध रूप से पुरुष (चेतना/शिव) का गुण है। पुरुष केवल एक दृष्टा या साक्षी है। शेष दो भाव (कर्मधारा और भावना धारा) मूल रूप से प्रकृति (शक्ति) के अंतर्गत आते हैं।
प्रकृति की सत्ता की सिद्धि:
प्रकृति की सत्ता (कर्म और भावना के कारणभूत तत्व के रूप में) केवल तभी सिद्ध होती है, जब वह स्वयं कोई 'विषय भाव' (Objective identity) ग्रहण करती है। जब प्रकृति स्वयं को विषय भाव के साथ एकाकार कर लेती है, तभी उसकी अभिव्यक्ति संभव हो पाती है। यह विषय भाव अकारण नहीं होता, बल्कि यह पुरुष (चेतना) पर प्रकृति के पड़ने वाले प्रभाव के कारण उत्पन्न होता है।
सञ्चर और प्रतिसञ्चर की प्रक्रिया:
यह सूत्र स्पष्ट करता है कि प्रकृति द्वारा विषय भाव का यह ग्रहण दो विशेष अवस्थाओं में ही निष्पन्न होता है:
सञ्चर (Sancara): जब पुरुष पर प्रकृति का प्रभाव क्रमवर्द्धमान (लगातार बढ़ता हुआ) होता है, तो सृष्टि के स्थूलीकरण की प्रक्रिया होती है। इस विकास-क्रम को 'सञ्चर क्रिया' कहते हैं।
प्रतिसञ्चर (Pratisancara): जब पुरुष पर प्रकृति का प्रभाव क्रमह्रस्वमान (लगातार घटता हुआ) होता है, तो चेतना अपने मूल स्वरूप की ओर लौटने लगती है। इस वापसी-क्रम को 'प्रतिसञ्चर क्रिया' कहते हैं।
प्रकृति का वास्तविक प्रकाश और उसकी क्रियाशीलता केवल इन्हीं दो धाराओं (सञ्चर या प्रतिसञ्चर) में ही दृष्टिगोचर होती है।
पुरुष का उपादान एवं साक्षित्व:
इस संपूर्ण ब्रह्मांडीय क्रीड़ा (सञ्चर और प्रतिसञ्चर) में प्रकृति जो भी रूप धारण करती है, उसके मूल उपादान कारण (Material cause) के रूप में 'पुरुष' (चेतना) सदैव विद्यमान रहता है। इसके अतिरिक्त, सृष्टि की प्रत्येक अवस्था—चाहे वह सञ्चर हो या प्रतिसञ्चर—पुरुष का 'साक्षित्व' (Witnessing entity) सर्वत्र और सर्वदा अडिग रहता है।
निष्कर्ष
तृतीय सूत्र का यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि शिव (पुरुष) और शक्ति (प्रकृति) कोई अमूर्त या निष्क्रिय कल्पनाएँ नहीं हैं। उनके अस्तित्व का प्रमाण और उनकी पूर्णता इसी विश्व-ब्रह्मांड की निरंतर चलने वाली 'सञ्चर' (विकास) और 'प्रतिसञ्चर' (लय/मोक्ष) की चक्रीय प्रक्रिया में प्रमाणित होती है, जहाँ पुरुष नित्य साक्षी और उपादान है, तथा प्रकृति अपनी क्रिया और भावना के माध्यम से अभिव्यक्ति पाती है।
सरल व्याख्या
इस सूत्र का मुख्य उद्देश्य यह समझाना है कि इस ब्रह्मांड का निर्माण कैसे हुआ है और इसमें 'पुरुष' (विशुद्ध चेतना/शिव) तथा 'प्रकृति' (ऊर्जा/शक्ति) की क्या भूमिका है। इसे हम आम जीवन के उदाहरणों के साथ निम्नलिखित सरल भागों में समझ सकते हैं:
१. अस्तित्व के तीन आधार (हम कैसे जानें कि कोई चीज़ है?)
दर्शनशास्त्र कहता है कि किसी भी सत्ता (अस्तित्व) को पहचानने के केवल तीन तरीके हैं:
कर्म (काम करना): यदि कोई चीज़ काम कर रही है या उसमें हलचल है।
भावना (महसूस करना): यदि कोई चीज़ सोच सकती है या महसूस कर सकती है।
साक्षित्व (देखना या गवाह होना): यदि कोई चुपचाप केवल देख रहा है, साक्षी है।
२. पुरुष और प्रकृति का बँटवारा
सृष्टि के निर्माण में दो मुख्य तत्व हैं—पुरुष और प्रकृति। ऊपर दिए गए तीन आधारों को इनमें इस प्रकार बाँटा गया है:
पुरुष (चेतना) केवल एक 'साक्षी' है: पुरुष कुछ भी करता या महसूस नहीं करता। वह केवल एक शांत दर्शक (गवाह) है जो सब कुछ देख रहा है।
प्रकृति (ऊर्जा) काम करती है: कर्म करना और भावना महसूस करना—ये दोनों काम पूरी तरह से प्रकृति के हैं। प्रकृति ही सक्रिय है।
३. प्रकृति की पहचान कैसे होती है? (विषय भाव का ग्रहण)
चूँकि प्रकृति ही सारा काम करती है, तो हमें उसका पता कैसे चलता है?
प्रकृति का अपना कोई स्वतंत्र रूप नहीं है, जब तक कि वह कोई 'विषय' (Objective Form) न बना ले। यानी, जब ऊर्जा किसी ठोस वस्तु, विचार या रूप में बदलती है, तभी हम कहते हैं कि "हाँ, प्रकृति काम कर रही है।"
यह रूप क्यों बनता है? प्रकृति अपने आप रूप नहीं बदलती। जब पुरुष (चेतना) का प्रभाव प्रकृति पर पड़ता है, तब प्रकृति उस प्रभाव के कारण अलग-अलग रूप (विषय) धारण करने लगती है।
४. सञ्चर और प्रतिसञ्चर (सृष्टि का चक्र)
प्रकृति के काम करने और रूप बदलने की यह पूरी प्रक्रिया दो रास्तों पर चलती है, जिसे सञ्चर और प्रतिसञ्चर कहते हैं:
सञ्चर (सृष्टि का फैलाव / स्थूलीकरण): जब पुरुष का दबाव प्रकृति पर लगातार बढ़ता है, तो चीज़ें सूक्ष्म (हल्की) से स्थूल (ठोस) होने लगती हैं। जैसे—आकाश से हवा, हवा से आग, आग से पानी और पानी से ठोस मिट्टी का बनना। यह सृष्टि के आगे बढ़ने का रास्ता है।
प्रतिसञ्चर (वापसी की यात्रा / सूक्ष्म होना): जब प्रकृति पर पुरुष का दबाव लगातार कम होने लगता है, तो ठोस चीज़ें वापस सूक्ष्म होने लगती हैं। यानी भौतिक शरीर के भीतर मन का विकास होना और अंततः आत्मा का वापस परमात्मा (पुरुष) में मिल जाना। यह घर वापसी का रास्ता है।
५. पुरुष की भूमिका (उपादान और साक्षी)
इस पूरे खेल (सञ्चर और प्रतिसञ्चर) में पुरुष (चेतना) की दो सबसे बड़ी भूमिकाएँ हैं:
उपादान कारण (कच्चा माल): जैसे मिट्टी के घड़े में मूल रूप से 'मिट्टी' ही है, वैसे ही प्रकृति जो भी रूप बनाए, उसका मूल आधार या कच्चा माल 'पुरुष' ही होता है।
सदा साक्षी (हमेशा देखने वाला): चाहे सृष्टि बन रही हो (सञ्चर) या वापस लौट रही हो (प्रतिसञ्चर), पुरुष हर अवस्था में केवल एक गवाह की तरह मौजूद रहता है।
सार रूप में: यह सूत्र बताता है कि संसार का यह पूरा चक्र (बनना और मिटना) चेतना (पुरुष) और ऊर्जा (प्रकृति) के आपसी संबंध से ही चलता है। चेतना देखती है और आधार बनती है, जबकि ऊर्जा रूप बदलती है और संसार का निर्माण करती है।
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