१/२ शक्ति: सा शिवस्य शक्ति:। (AS 1/2)

द्वितीय सूत्र

१/२ शक्ति: सा शिवस्य शक्ति:। 



भावार्थ :- प्रत्येक वस्तु के उपादान और निमित्त कारण होते हैं । इसके अतिरिक्त निमित्त के साथ उपादान का संयोगस्थापक क्रियाभाव भी है । इस क्रियाभाव की मात्रा के अनुसार ही निमित्त की उपादान के साथ दृढ़ता या शिथिलता निर्धारित होती है । सृष्टि के विकास में पुरुषतत्त्व उपादान कारण है; प्रकृतितत्त्व निमित्त के साथ उपादान की सम्पर्कस्थापिका शक्ति है तथा निमित्तकारण के रूप में पुरुषभाव मुख्य तथा प्रकृतिभाव गौण है ।

​पुरुष सर्वानुस्यूत सत्ता है। अतः इसके व्यतिरेक कुछ भी उपादान कारण के रूप में सिद्ध नहीं हो सकता। प्रकृतितत्त्व सर्वानुस्यूत नहीं होने के कारण पुरुष की आश्रिता है। पुरुष स्वदेह में प्रकृति को जितना कार्य करने का अवसर देता है, वह केवल उतना ही कार्य कर सकती है। इसीलिए सृष्टि के विज्ञान में कारण सत्ता के रूप में पुरुष को ही मुख्य निमित्त कारण कहा जा सकता है। प्रकृति पुरुष-प्रदत्त अधिकार को व्यवहार में ला कर कारक रूप में स्वयं को प्रतिपन्न करती है। इसीलिए वह गौण निमित्त कारण है। इस निमित्त कारण के द्वारा उपादान कारण में जो विकृति या अभिव्यक्ति होती रहती है जिसे हम जागतिक विकास कहते हैं वह प्राकृत गुणत्रय के द्वारा सम्पन्न होती है। इसीलिए प्रकृति निमित्त कारण तथा उपादान कारण की सम्पर्कस्थापिका शक्ति है। प्राकृत प्रभाव की अल्पता या अधिकता के ऊपर ही वस्तुदेह की दृढ़ता या शिथिलता सम्पूर्णरूपेण निर्भर करती है।

​सभी क्षेत्रों में पुरुष की ही भूमिका मुख्य है। पुरुष ने प्रकृति को कार्य करने का जितना अधिकार दिया है या देता है, प्रकृति उतना ही कार्य करती है या कर पाती है। सृष्टि के विकासक्रम में पुरुष उसे कार्य करने का अधिकार प्रदान करता है और प्रकृति कार्य करती चलती है। गुणत्रय के बन्धन के कारण सूक्ष्म पुरुष क्रमशः स्थूलत्व प्राप्त करता जाता है। स्थूलत्व की चरम अवस्था में पुरुष धीरे-धीरे प्रकृति के पूर्व-प्रदत्त सुयोग और स्वाधीनता को संकुचित करता रहता है। इसीलिए स्थूल पुरुष क्रमशः सूक्ष्मत्व अर्जन करते-करते चरम अवस्था में अपने स्वभाव में लौट आता है। प्राकृत बन्धन के कारण पुरुषदेह में जो विकासधारा है उसे दार्शनिक विचार से सञ्चर कहा जाता है और बन्धन की क्रमवर्द्धमान शिथिलता के कारण पुरुषदेह में जो क्रमिक मुक्ति का भाव आता है उसे प्रतिसञ्चर कहा जाता है। स्पष्ट है कि प्राप्त अधिकार के सद्व्यवहार में प्रकृति के स्वाधीना होने पर भी अधिकार पाना या न पाना पुरुष या चितिशक्ति पर निर्भर करता है। इसलिए कहना पड़ता है कि प्रकृति पुरुष की ही प्रकृति है-शक्तिः सा शिवस्य शक्तिः ।

सूत्र का विश्लेषण

​१. पद-विच्छेद (पदच्छेद):

​शक्ति: + सा + शिवस्य + शक्ति: ।

​२. व्याकरणगत शब्दार्थ एवं व्युत्पत्ति:

  • ​शक्ति: (Shaktih):

    • ​मूल धातु: 'शक्' (शकि - शक्तौ) धातु से 'क्तिन्' प्रत्यय के योग से निष्पन्न।

    • ​व्याकरण: प्रथमा विभक्ति, एकवचन।

    • ​अर्थ: सामर्थ्य, क्षमता, ऊर्जा। दर्शन के संदर्भ में, यह वह सृजनात्मक ऊर्जा है जिसके माध्यम से परम सत्ता (शिव) अभिव्यक्ति करती है। यहाँ यह 'प्रकृति' या 'मूल कारण' की द्योतक है।

  • ​सा (Saa):

    • ​व्याकरण: 'तद्' सर्वनाम शब्द, स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन।

    • ​अर्थ: वह। यह स्त्रीलिंग में 'शक्ति' शब्द के विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुआ है, जो उस विशिष्ट ऊर्जा की ओर संकेत करता है जो सृष्टि का आधार है।

  • ​शिवस्य (Shivasya):

    • ​मूल शब्द: 'शिव' (संज्ञा)।

    • ​व्याकरण: षष्ठी विभक्ति, एकवचन (सम्बन्ध कारक)।

    • ​अर्थ: शिव का। यहाँ 'शिव' का तात्पर्य उस परम चेतन सत्ता या निर्गुण ब्रह्म से है जो स्वयं में अक्रिय (Static) है। षष्ठी विभक्ति यह दर्शाती है कि शक्ति का अस्तित्व और उद्गम पूर्णतः शिव पर आधारित है (सम्बन्ध)।

  • ​शक्ति: (Shaktih - द्वितीय):

    • ​व्याकरण: प्रथमा विभक्ति, एकवचन।

    • ​अर्थ: शक्ति। यहाँ पुनरावृत्ति का अर्थ है कि वही शक्ति, जो शिव का ही स्वरूप है, स्वयं को अभिव्यक्ति के रूप में 'शक्ति' के रूप में प्रकट करती है।

​३. तात्त्विक विश्लेषण एवं व्याकरणगत सम्बन्ध:

  • ​सम्बन्ध सूचक अर्थ: यह सूत्र 'समानाधिकरण' (Apposition) और 'सम्बन्ध' को दर्शाता है। व्याकरण की दृष्टि से 'शिवस्य शक्ति:' (शिव की शक्ति) एक 'तत्पुरुष समास' (षष्ठी तत्पुरुष) जैसा सम्बन्ध बनाती है।

  • ​अद्वैत का बोध: 'सा' (वह) का प्रयोग करके यहाँ यह सिद्ध किया गया है कि शक्ति और शिव दो अलग तत्त्व नहीं हैं। 'शक्ति: सा शिवस्य शक्ति:' का अर्थ है—वह शक्ति जो है, वही वस्तुतः शिव की ही शक्ति है। शिव और शक्ति में 'अविनाभाव सम्बन्ध' (Inseparable relationship) है, जिसे व्याकरण में 'तादात्म्य' कहा जाता है।

​४. निष्कर्ष:

​इस सूत्र में व्याकरण का सूक्ष्म उपयोग दर्शन को स्पष्ट करने के लिए किया गया है। 'शक्ति:' (प्रथमा) को 'शिवस्य शक्ति:' (षष्ठी के साथ प्रथमा) के साथ जोड़ना यह स्पष्ट करता है कि सृष्टि की जो मूल ऊर्जा (शक्ति) है, उसका अधिष्ठान केवल 'शिव' (परम चैतन्य) ही है। यह व्याकरणिक संरचना 'कारण और कार्य' के अभेद को प्रतिपादित करती है।



भावार्थ विश्लेषण

​(अ) . भूमिका: सृष्टि का आधार तत्त्व

​आनन्द सूत्रम के इस द्वितीय सूत्र में सृष्टि के मूल आधार, अर्थात परम पुरुष (शिव) और उनकी सृजनात्मक ऊर्जा (शक्ति/प्रकृति) के अंतर्संबंधों का विवेचन किया गया है। सृष्टि केवल संयोग नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया है जिसमें 'पुरुष' (चेतना) और 'प्रकृति' (ऊर्जा) की परस्पर क्रियाशीलता अनिवार्य है।

​(ब) . कारण और कार्य का सिद्धांत (Causality)

​प्रत्येक वस्तु के निर्माण में दो प्रकार के कारण उत्तरदायी होते हैं:

  • ​उपादान कारण (Material Cause): वह तत्व जिससे वस्तु बनी है।

  • ​निमित्त कारण (Efficient/Instrumental Cause): वह शक्ति जो उस उपादान को रूप प्रदान करती है।

​इस सूत्र के अनुसार, सृष्टि के विकास में पुरुष (चेतना) 'उपादान' है, जबकि प्रकृति (शक्ति) वह 'निमित्त' शक्ति है जो उस चेतना को मूर्त रूप देने का कार्य करती है। पुरुष ही वह सत्ता है जिसे विज्ञान के दृष्टिकोण से मुख्य 'निमित्त कारण' माना जाता है, क्योंकि प्रकृति स्वयं में पुरुष द्वारा प्रदत्त अधिकार और ऊर्जा पर ही कार्य करने में सक्षम है।

सृष्टि का आधारभूत ढांचा

​यह सूत्र सृष्टि की संरचना के तीन प्रमुख स्तंभों को स्पष्ट करता है:

​१. उपादान कारण और निमित्त कारण का सिद्धांत

​किसी भी वस्तु के निर्माण में दो महत्वपूर्ण कारकों का योगदान होता है:

  • ​उपादान कारण (Material Cause): वह कच्चा माल या तत्व जिससे वस्तु बनी है (जैसे घड़े के लिए मिट्टी)। सृष्टि के विकास में 'पुरुषतत्त्व' (चेतना) को उपादान कारण माना गया है।

  • ​निमित्त कारण (Efficient/Instrumental Cause): वह शक्ति जो उपादान को आकार देती है (जैसे घड़ा बनाने वाला कुम्हार)। सृष्टि में 'प्रकृतितत्त्व' (ऊर्जा/शक्ति) को निमित्त कारण के रूप में कार्य करने वाली शक्ति माना गया है। इसमें भी पुरुष मुख्य तथा प्रकृति गौण कारक है

​२. क्रियाभाव की भूमिका

 'क्रियाभाव' को इन दोनों के बीच एक संयोजक (Coordinator) के रूप में परिभाषित किया गया है।

  • ​यह क्रियाभाव ही निर्धारित करता है कि किसी वस्तु के निर्माण में उपादान की 'दृढ़ता' (Solidification) कितनी होगी और 'शिथिलता' (Fluidity) कितनी।

  • ​सरल शब्दों में, जब चेतना (पुरुष) और ऊर्जा (प्रकृति) एक विशिष्ट अनुपात में मिलते हैं, तब ही सृष्टि का स्वरूप निर्धारित होता है।

​३. पुरुष और प्रकृति का पदानुक्रम

आनन्द सूत्रम‌ में स्पष्ट किया गया है कि पुरुष और प्रकृति समान स्तर पर नहीं हैं:

  • ​पुरुष (परम सत्ता): यह 'सर्वाणुस्यूत' है, अर्थात यह कण-कण में व्याप्त है। इसके बिना कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकता। यह 'मुख्य' है।

  • ​प्रकृति (शक्ति): यह पुरुष की ही 'आश्रित' (dependent) सत्ता है। वह स्वतंत्र नहीं है। वह केवल उतनी ही क्रिया करने में समर्थ है, जितना उसे पुरुष द्वारा अधिकार (अवसर) दिया गया है।

  • ​निष्कर्ष: इसलिए, सृष्टि के विज्ञान में पुरुष को ही 'मुख्य निमित्त कारण' माना गया है, क्योंकि प्रकृति केवल उस अधिकार का उपयोग करके स्वयं को 'कारक' (कार्यकर्ता) के रूप में सिद्ध करती है।


​(स). पुरुष और प्रकृति का तादात्म्य

​सूत्र का भाव यह है कि पुरुष और प्रकृति को अलग नहीं देखा जा सकता। पुरुष 'सर्वाणुस्यूत सत्ता' (सर्वव्यापी चैतन्य) है।

  • ​परस्पर निर्भरता: प्रकृति स्वयं चेतन नहीं है, अतः उसे कार्य करने के लिए पुरुष की चेतना का आधार चाहिए। पुरुष प्रकृति को कार्य करने का जो अवसर (अधिकार) देता है, प्रकृति केवल उसी सीमा तक विकास कर सकती है।

  • ​अधिकार का हस्तांतरण: पुरुष, प्रकृति को जो अधिकार प्रदान करता है, उसी के परिणामस्वरूप सृष्टि का विकासक्रम आगे बढ़ता है। पुरुष के बिना प्रकृति जड़ है और प्रकृति के बिना पुरुष की अभिव्यक्ति असंभव है।

प्रकृति की भूमिका और सीमाएँ

​यह अनुभाग स्पष्ट करता है कि प्रकृति (शक्ति) किस प्रकार कार्य करती है और उसकी सीमाएँ क्या हैं:

​१. प्रकृति की गौण स्थिति

आनन्द सूत्रम‌ में स्पष्ट किया गया है कि प्रकृति, पुरुष द्वारा प्रदत्त अधिकारों के दायरे में ही कार्य करती है।

  • ​प्रकृति स्वयं को 'कारक' (कार्यकर्ता) के रूप में तभी प्रतिपन्न (स्थापित) कर पाती है, जब उसे पुरुष से अधिकार प्राप्त होता है।

  • ​इसी कारण, प्रकृति को एक 'गौण निमित्त कारण' कहा गया है; क्योंकि उसकी कार्य करने की क्षमता पूरी तरह से पुरुष की इच्छा और अधिकार पर निर्भर है।

​२. जागतिक विकास और गुणत्रय

​सृष्टि के जिस विकास को हम 'जागतिक विकास' के रूप में देखते हैं, उसके पीछे का तंत्र 'प्रकृत गुणत्रय' (सत्व, रज और तम) है।

  • ​प्रकृति का कार्य केवल उपादान कारण में विकार या अभिव्यक्ति (manifestation) उत्पन्न करना है।

  • ​यह परिवर्तन गुणत्रय के आपसी संतुलन या असंतुलन द्वारा संचालित होता है।

​३. वस्तुदेह की दृढ़ता और शिथिलता का निर्धारण

​प्रकृति के प्रभाव की तीव्रता ही भौतिक जगत के अस्तित्व को निर्धारित करती है:

  • ​किसी भी 'वस्तुदेह' (भौतिक वस्तु) की दृढ़ता (solidification) या शिथिलता (fluidity) पूरी तरह से 'प्राकृत प्रभाव' (प्रकृति का कार्य) पर निर्भर करती है।

  • ​यदि प्राकृत प्रभाव अधिक है, तो वस्तु अधिक स्थूल होगी, और यदि प्राकृत प्रभाव कम है, तो वह अधिक सूक्ष्म या शिथिल होगी।

​४. पुरुष की प्रधानता

​इस बिन्दु का मूल निष्कर्ष यह है कि संपूर्ण सृष्टि के खेल में पुरुष ही मुख्य भूमिका में है:

  • ​प्रकृति केवल उतनी ही गति कर सकती है जितनी पुरुष उसे अनुमति देता है।

  • ​जैसे ही पुरुष विकासक्रम में प्रकृति को अधिकार देता है, प्रकृति कार्य करना शुरू कर देती है।

​(द) . विकासक्रम: सञ्चर और प्रतिसञ्चर

​सूत्र का गहन दार्शनिक भाव सृष्टि की दो प्रमुख धाराओं की ओर संकेत करता है:

  • ​सञ्चर (Evolution/Creation): जहाँ पुरुष का गुण प्रकृति के बंधन में बंधकर स्थूल रूप धारण करता जाता है। इस प्रक्रिया में पुरुष की स्वाधीनता धीरे-धीरे संकुचित होती जाती है।

  • ​प्रतिसञ्चर (Devolution/Involution): जहाँ चेतना, बंधन की शिथिलता के माध्यम से अपने मूल स्वरूप (शिवभाव) की ओर लौटती है।

सञ्चर, विकास, स्थूलता और प्रतिसञ्चर

​यह अनुभाग स्पष्ट करता है कि सृष्टि की गतिशीलता किस प्रकार चक्राकार है और चेतना किस प्रकार अपने मूल स्वरूप की ओर लौटती है:

​१. विकास का चरम और संकुचन

आनन्द सूत्रम‌ के अनुसार, सृष्टि के विकासक्रम (सञ्चर) में पुरुष धीरे-धीरे प्रकृति के बंधन में बंधता जाता है।

  • ​जब 'गुणत्रय' का बंधन अत्यधिक प्रबल हो जाता है, तो पुरुष 'स्थूलत्व' (Physicality/Materiality) प्राप्त करता है।

  • ​इस चरम अवस्था में, पुरुष की वह स्वाधीनता और सुयोग जो उसे पहले प्राप्त था, वह संकुचित (restricted) हो जाता है।

​२. स्व-स्वरूप में वापसी (प्रतिसञ्चर)

 कैसे स्थूल होने के बाद पुरुष पुनः सूक्ष्म होने की यात्रा शुरू करता है:

  • ​स्थूल पुरुष धीरे-धीरे 'सूक्ष्मत्व' अर्जित करता है, जिससे वह अपनी चरम अवस्था से वापस अपने 'स्वभाव' (आध्यात्मिक मूल स्वरूप) की ओर मुड़ता है।

  • ​इसी क्रमिक मुक्ति की प्रक्रिया को दर्शन में 'प्रतिसञ्चर' कहा गया है।

​३. सञ्चर और प्रतिसञ्चर का दार्शनिक अर्थ

आनन्द सूत्रम‌ इन दो मुख्य दार्शनिक प्रक्रियाओं को परिभाषित करता है:

  • ​सञ्चर (Sanchar): वह विकासधारा जहाँ चेतना का भौतिक बंधन (स्थूलता) बढ़ता है।

  • ​प्रतिसञ्चर (Pratisanchar): वह प्रक्रिया जहाँ बंधन की क्रमिक शिथिलता के कारण चेतना अपने मूल स्थान की ओर लौटती है।

​४. पुरुष की भूमिका का स्पष्टीकरण

​अंतिम निष्कर्ष में यह स्पष्ट किया गया है कि प्रकृति का स्वतंत्र होना या न होना पूरी तरह से पुरुष की चितिशक्ति (Consciousness) पर निर्भर करता है।

  • ​यह पुरुष की इच्छा है जो उसे प्रकृति के बंधन में धकेलती है (सञ्चर) और वही इच्छा उसे मुक्त भी करती है (प्रतिसञ्चर)।

  • ​इसीलिए लेखक यह निष्कर्ष निकालता है कि प्रकृति, पुरुष की ही शक्ति है: "शक्ति: सा शिवस्य शक्ति:"।

​(य) . सार तत्व

​यह सूत्र अंततः इस सत्य को स्थापित करता है कि "शक्ति: सा शिवस्य शक्ति:"—अर्थात, जो कुछ भी हम दृश्य जगत में देख रहे हैं, वह उस परम चैतन्य (शिव) की ही शक्ति का प्रकटीकरण है। प्रकृति केवल शिव का वह उपकरण है जिसके माध्यम से वे स्वयं को अभिव्यक्त करते हैं। अतः, सृष्टि के समस्त कार्य-व्यापार और विकासक्रम के पीछे मूल सत्ता पुरुष की ही है।

​इसका सरल शब्दों में अर्थ है—"यह जो 'शक्ति' (सृष्टि की ऊर्जा) हम देख रहे हैं, वह वास्तव में उस 'शिव' (परम चैतन्य पुरुष) की ही शक्ति है।"

​सम्पूर्ण भावार्थ का सरल व्याख्या

​इस दार्शनिक विचार को निम्नलिखित बिंदुओं में सरलता से समझा जा सकता है:

  • ​दो मुख्य कारण: संसार की कोई भी चीज़ बनने के लिए दो चीज़ें चाहिए—एक जिससे वह बनी है (मिट्टी जैसे) और दूसरा जिसने उसे बनाया (कुम्हार जैसे)। यहाँ 'पुरुष' (चेतना) उस तत्व का आधार है, और 'प्रकृति' (शक्ति) वह ऊर्जा है जो सब कुछ बनाती है।

  • ​प्रकृति का आश्रय: 'प्रकृति' स्वतंत्र नहीं है। वह पूरी तरह से 'पुरुष' (शिव) पर निर्भर है। पुरुष प्रकृति को जितना काम करने का अधिकार देता है, प्रकृति उतना ही काम कर पाती है।

  • ​सृष्टि का चक्र:

    • ​सञ्चर: यह वह प्रक्रिया है जिसमें चेतना धीरे-धीरे भौतिक पदार्थों (स्थूलता) में बंधती चली जाती है।

    • ​प्रतिसञ्चर: यह वह वापसी की यात्रा है जहाँ वही चेतना धीरे-धीरे बंधन मुक्त होकर वापस अपने मूल आध्यात्मिक स्वरूप (शिवभाव) में लौट आती है।

  • ​अंतिम निष्कर्ष: अंत में, सारा खेल 'पुरुष' का ही है। प्रकृति केवल उस परम चेतना की एक अभिव्यक्ति या उपकरण है। जो कुछ भी संसार में घटित हो रहा है, वह उसी 'शिव' की शक्ति का खेल है।

​सरल शब्दों में, यह सूत्र हमें यह याद दिलाता है कि जड़ जगत के पीछे जो अनंत ऊर्जा काम कर रही है, वह किसी और की नहीं, बल्कि उसी परम सत्ता की अपनी शक्ति है।

और सरलतम

आनन्द सूत्रम‌ के अनुसार, सृष्टि विज्ञान (Cosmology) में इस सूत्र का अत्यंत गहरा महत्व है। इसे निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:

​क. कारण मीमांसा (उपादान और निमित्त कारण):

सृष्टि में प्रत्येक वस्तु के दो प्रमुख कारण होते हैं— 'उपादान कारण' (Material Cause - जिससे वस्तु बनती है) और 'निमित्त कारण' (Efficient Cause - जो वस्तु को बनाता है)। आनन्द सूत्रम‌ के अनुसार, इन दोनों के अतिरिक्त एक 'संयोगस्थापक क्रियाभाव' (Linking force) भी होता है, जिसकी मात्रा से ही निर्माण की दृढ़ता या शिथिलता तय होती है।

सृष्टि के विकास में 'पुरुषतत्त्व' (चेतना) ही मुख्य उपादान कारण है और मुख्य निमित्त कारण भी वही है। वहीं, 'प्रकृतितत्त्व' (शक्ति) गौण निमित्त कारण है और वह उपादान के साथ निमित्त का सम्पर्क स्थापित करने वाली शक्ति मात्र है।

"उपादान कारण" (Material Cause) और "निमित्त कारण" (Efficient Cause) के माध्यम से यह समझाया गया है कि इस सृष्टि (ब्रह्मांड) का निर्माण कैसे हुआ है।

​इसे एक बहुत ही आसान और दैनिक जीवन के उदाहरण से समझते हैं।

​१. पहले इन दोनों शब्दों का अर्थ समझें:

​दुनिया में जब भी कोई नई चीज़ बनती है, तो उसे बनाने के लिए मुख्य रूप से दो चीज़ों की आवश्यकता होती है:

  • ​उपादान कारण (कच्चा माल / Raw Material): वह मूल सामग्री जिससे कोई चीज़ बनती है।

  • ​निमित्त कारण (बनाने वाला / Maker): वह व्यक्ति या शक्ति जो उस कच्चे माल को एक नया आकार देकर वस्तु बनाता है।

​सरल उदाहरण: मान लीजिए कि एक मिट्टी का घड़ा बनाया जा रहा है।

  • ​यहाँ 'मिट्टी' उपादान कारण है (क्योंकि घड़ा मिट्टी से बना है)।

  • ​और 'कुम्हार' निमित्त कारण है (क्योंकि कुम्हार ने उसे बनाया है)।

​२. अब इसे सृष्टि (ब्रह्मांड) के निर्माण पर लागू करते हैं:

​जब हम इस पूरी दुनिया के बनने की बात करते हैं, तो आनन्द सूत्रम् का यह दर्शन बताता है कि यहाँ स्थिति थोड़ी अलग और बहुत गहरी है।

​परम पुरुष (शिव/चेतना) की भूमिका:

संसार के उदाहरण में कुम्हार और मिट्टी अलग-अलग होते हैं। लेकिन इस ब्रह्मांड के निर्माण में, परम पुरुष (शिव) ने इस दुनिया को बनाने के लिए बाहर से कोई 'कच्चा माल' नहीं लिया। उन्होंने स्वयं को ही इस सृष्टि के रूप में प्रकट किया है।

  • ​इसलिए, इस ब्रह्मांड का मुख्य उपादान कारण (कच्चा माल) परम पुरुष ही है।

  • ​और चूँकि इसे बनाने की मूल इच्छा भी परम पुरुष की ही है, इसलिए मुख्य निमित्त कारण (बनाने वाला) भी परम पुरुष ही है।

​प्रकृति (शक्ति) की भूमिका:

अगर पुरुष ही बनाने वाला है और पुरुष ही कच्चा माल है, तो फिर प्रकृति क्या है?

प्रकृति कुम्हार के हाथ की कला, ऊर्जा या उसके घूमने वाले चाक (पहिये) की तरह है। कुम्हार (निमित्त) अपनी ऊर्जा (शक्ति) का उपयोग करके ही मिट्टी (उपादान) को घड़े में बदलता है।

  • ​प्रकृति वह 'संयोगस्थापक क्रियाभाव' (Linking Force / जोड़ने वाली शक्ति) है, जो बनाने वाले के विचार को कच्चे माल के साथ जोड़कर रूप देती है।

  • ​चूँकि प्रकृति स्वयं अपने आप में कुछ नहीं बना सकती, वह केवल पुरुष के आदेश या उसकी दी गई आज़ादी के अनुसार ही काम करती है, इसलिए प्रकृति को 'गौण निमित्त कारण' (Secondary Efficient Cause / सहायक कारण) कहा गया है।


​ख. प्रकृति की पुरुष पर निर्भरता:

चूँकि पुरुष (शिव/चेतना) 'सर्वानुस्यूत सत्ता' (सब जगह व्याप्त) है, अतः उसके बिना कोई भी उपादान सिद्ध नहीं हो सकता। प्रकृति सर्वव्यापक नहीं है, इसलिए वह पूर्ण रूप से पुरुष (शिव) के आश्रित है। पुरुष अपने भीतर (स्वदेह में) प्रकृति को कार्य करने का जितना अवसर या अधिकार देता है, प्रकृति केवल उतना ही कार्य कर सकती है। अतः प्रकृति कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है, बल्कि पुरुष द्वारा प्रदत्त अधिकार से ही व्यवहार में स्वयं को अभिव्यक्त करती है।

​ग. सञ्चर और प्रतिसञ्चर की प्रक्रिया:

प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) के प्रभाव से जब सृष्टि का विकास होता है, तो सूक्ष्म पुरुष क्रमशः स्थूल (Gross) होता चला जाता है।

  • ​सञ्चर (Sainchara): प्राकृत बन्धन के कारण पुरुष की जो यह विकासधारा (सूक्ष्म से स्थूल की ओर) है, उसे दार्शनिक भाषा में 'सञ्चर' कहा जाता है। स्थूलत्व की चरम अवस्था में प्रकृति की स्वाधीनता संकुचित हो जाती है।

  • ​प्रतिसञ्चर (Pratisainchara): जब यह बन्धन क्रमशः शिथिल होने लगता है और स्थूल देह से मुक्ति का भाव उत्पन्न होता है (स्थूल से वापस सूक्ष्म की ओर यात्रा), तो इसे 'प्रतिसञ्चर' कहा जाता है। इसी प्रक्रिया के माध्यम से इकाई वापस अपने मूल स्वभाव (शिव भाव) में लौट आती है।

​४. निष्कर्ष

​समग्र दार्शनिक विचार का सार यही है कि प्रकृति (शक्ति) को जो भी अधिकार प्राप्त है या वह जो भी कार्य कर पाती है, वह सब परम पुरुष (चितिशक्ति/शिव) की इच्छा और उनके द्वारा दिए गए अधिकार पर ही निर्भर है। चूँकि शक्ति की अपनी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है और वह पूर्णतः शिव के अधीन है, इसीलिए यह अकाट्य सत्य है कि प्रकृति शिव की ही शक्ति है — "शक्तिः सा शिवस्य शक्तिः।"

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