चतुर्थ सूत्र
१/४ "परमशिवः पुरुषोत्तमः विश्वस्य केन्द्रम्।”
भावार्थ :- त्रिगुणात्मिका प्राकृत शक्ति मूलतः पुरुष भाव को अपनी क्रमवर्द्धमान बन्धनी शक्ति के द्वारा आपातदृष्टि से जड़ में परिणत करती जा रही हैं। यह इसकी क्रिया की एक धारा है और दूसरी धारा वह है जो जड़ पर से गुणत्रय के प्रभाव को क्रमशः शिथिल कर पुरुष को स्वभाव में लौटा लाती है, अर्थात् बन्धन क्रिया की परिसमाप्ति कराती है। प्राकृत शक्ति की प्रथमोक्त धारा केन्द्रातिगा (centrifugal) है तथा अपरोक्त धारा केन्द्रानुगा (centripetal) है। इस केन्द्रातिगा और केन्द्रानुगा की मदद से ही ब्रह्मचक्र या सृष्टिचक्र व्यक्त होता है। इस ब्रह्मचक्र का जो प्राणकेन्द्र (nucleus) है वह पुरुष का स्व-भाव है। समग्र ब्रह्मचक्र का उपादान कारण पुरुष या शिव (Conciousness) है और उनके इस प्राणकेन्द्र को परम शिव या पुरुषोत्तम कहा जाता है।
सूत्र का विश्लेषण
१. परमशिवः (Paramashivah)
पद-विच्छेद: परम + शिवः
व्युत्पत्ति:
परम (Parama): यह शब्द 'पर' (Para) उपसर्ग से बना है, जिसमें 'म' (ma) प्रत्यय का योग है। यह 'पर' की उच्चतम अवस्था (Superlative degree) को दर्शाता है।
शिवः (Shivah): 'शि' (Shí) धातु से निष्पन्न, जिसका अर्थ है 'शयन करना' (to repose/to lie down in). यह पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन का रूप है।
व्याकरणिक स्थिति: यह शब्द कर्ता कारक (Nominative case) में प्रयुक्त हुआ है।
२. पुरुषोत्तमः (Purushottamah)
पद-विच्छेद: पुरुष + उत्तमः
समास: यह एक कर्मधारय समास (विशेषण-विशेष्य भाव) है, जहाँ 'पुरुष' विशेष्य है और 'उत्तम' विशेषण है।
व्युत्पत्ति:
पुरुष (Purusha): 'पुरी' (Puri - शरीर या नगर) + 'श' (Sha - निवास करने वाला धातु/प्रत्यय)। अर्थात्, जो शरीर रूपी नगर में निवास करता है।
उत्तमः (Uttamah): 'उत्' (Ud - ऊपर/श्रेष्ठ) उपसर्ग + 'तम' (Tama - superlative प्रत्यय)। 'तम' प्रत्यय का प्रयोग संस्कृत में सर्वोच्चता (Superlative) दर्शाने के लिए होता है।
व्याकरणिक स्थिति: पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
३. विश्वस्य (Vishvasya)
मूल शब्द: विश्व (Vishva)
व्युत्पत्ति: 'विश्' (Vish) धातु, जिसका अर्थ है 'प्रवेश करना' या 'व्याप्त होना'। 'अ' प्रत्यय लगाकर 'विश्व' शब्द बनता है, जिसका अर्थ है जो सब जगह व्याप्त है।
व्याकरणिक स्थिति: यह शब्द षष्ठी विभक्ति (Genitive case), एकवचन में है। 'स्य' (asya) प्रत्यय का प्रयोग यहाँ 'का/के/की' (Possessive - 'of') का अर्थ देने के लिए किया गया है। अतः 'विश्वस्य' का अर्थ है "विश्व का"।
४. केन्द्रम् (Kendram)
मूल शब्द: केन्द्र (Kendra)
व्युत्पत्ति: यह संज्ञा शब्द है, जो किसी परिधि (circumference) के मध्य बिंदु या धुरी (pivot/nucleus) को इंगित करता है।
व्याकरणिक स्थिति: यह नपुंसकलिंग, प्रथमा विभक्ति (कर्ता के पूरक के रूप में), एकवचन का रूप है।
५. सूत्र का अर्थ
परमशिव जो कि पुरुषोत्तम है वह ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड ( विश्व का) के मूल केंद्र (Nucleus) हैं।
भावार्थ विश्लेषण
आनन्द सूत्रम् के इस सूत्र में ब्रह्मचक्र (सृष्टि की चक्रिय प्रक्रिया) के मूल क्रिया-सिद्धान्त को समझाया गया है। भावार्थ को समझने के लिए प्राकृत शक्ति (Prakrti) और पुरुष (Purusha) के अंतर्संबंधों को दो मुख्य धाराओं में विभाजित किया गया है:
क) सञ्चर (Saincara) - केन्द्रातिगा धारा (Centrifugal Force)
विवरण: त्रिगुणात्मिका प्राकृत शक्ति (सत्त्व, रज और तम गुणों से युक्त प्रकृति) मूलतः आदि पुरुष भाव (Pure Consciousness) को अपनी निरंतर बढ़ती हुई बंधनी शक्ति (Binding economic force) के द्वारा बांधती जाती है।
परिणाम: इस बंधन के कारण चैतन्य सत्ता आपातदृष्टि (सतही रूप से) 'जड़' (Matter) में परिणत होती चली जाती है।
प्रकृति: यह ब्रह्मचक्र की पहली धारा है, जिसे केन्द्रातिगा (Centrifugal Force) कहा जाता है। यह केन्द्र (पुरुषोत्तम) से बाहर की ओर, स्थूलता की ओर ले जाती है।
ख)प्रतिसञ्चर (Pratisaincara) - केन्द्रानुगा धारा (Centripetal Force)
विवरण: इसके विपरीत दूसरी धारा वह है जो जड़ (Matter) पर से तीनों गुणों (गुणत्रय) के प्रभाव को क्रमशः शिथिल (ढीला) करती है। जड़ से जीवन, जीवन से मन और मन से पुनः परम चैतन्य की ओर यात्रा शुरू होती है।
परिणाम: यह बंधन क्रिया की समाप्ति कराती है और जीव को उसके वास्तविक स्वभाव (परम पुरुष भाव) में लौटा लाती है।
प्रकृति: इस धारा को केन्द्रानुगा (Centripetal Force) कहा जाता है। यह स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर, अर्थात् केन्द्र (पुरुषोत्तम) की ओर आकर्षित करती है।
. दार्शनिक निष्कर्ष (Conclusion)
इस केन्द्रातिगा (Centrifugal) और केन्द्रानुगा (Centripetal) शक्तियों की अनवरत क्रिया-प्रतिक्रिया की मदद से ही ब्रह्मचक्र या सृष्टिचक्र व्यक्त होता है। इस पूरे चक्र का जो नियामक, नियंता और परम आश्रय है, वही परमशिव है जो पुरुषोत्तम रूप में ब्रह्मांड के ठीक केन्द्र (Nucleus) में स्थित है। प्रत्येक जीव जाने-अनजाने इसी केन्द्रानुगा धारा के प्रभाव में आकर अंततः अपने परम केन्द्र 'पुरुषोत्तम' में विलीन होने के लिए अग्रसर है।
सरलतम शब्दों में भावार्थ
यह सूत्र बताता है कि यह पूरी सृष्टि (Universe) एक चक्र की तरह काम करती है, जिसे 'ब्रह्मचक्र' कहते हैं। इस चक्र के ठीक बीचों-बीच (Center में) 'पुरुषोत्तम' (भगवान या परम चेतना) बैठे हैं।
इस चक्र को चलाने के लिए प्रकृति दो तरह की शक्तियों (Forces) का इस्तेमाल करती है:
1. पहली शक्ति: केन्द्र से बाहर ले जाने वाली (Centrifugal Force)
क्या होता है?: इसे 'केन्द्रातिगा धारा' कहते हैं। इसमें प्रकृति की शक्ति परम चेतना (Spirit) को धीरे-धीरे बांधना शुरू करती है।
असर: इस बंधन के कारण चेतना भारी और स्थूल होने लगती है और अंत में हमें 'जड़' (Matter/पत्थर/मिट्टी) के रूप में दिखाई देती है। यह यात्रा केन्द्र से दूर बाहर की तरफ होती है।
2. दूसरी शक्ति: वापस केन्द्र की तरफ खींचने वाली (Centripetal Force)
क्या होता है?: इसे 'केन्द्रानुगा धारा' कहते हैं। यहाँ से वापसी का सफर शुरू होता है। प्रकृति का बंधन धीरे-धीरे ढीला होने लगता है।
असर: इसके प्रभाव से जड़ (Matter) के अंदर से पहले पौधे, फिर जीव-जंतु, फिर इंसानी मन और अंत में आत्मा का विकास होता है। यह शक्ति हर जीव को वापस अपने मूल घर यानी 'केन्द्र' (पुरुषोत्तम) की तरफ खींचती है।
एक आसान उदाहरण से समझें:
जैसे एक स्प्रिंग (Spring) को जब हम बल लगाकर बाहर की तरफ खींचते हैं, तो वह फैलती है (यह केन्द्रातिगा धारा है)। लेकिन जैसे ही वह बल ढीला पड़ता है, स्प्रिंग वापस अपने असली रूप में सिकुड़ जाती है (यह केन्द्रानुगा धारा है)।
निष्कर्ष: यह पूरी दुनिया और कुछ नहीं, बल्कि भगवान (केन्द्र) से शुरू होकर वापस भगवान में ही मिल जाने का एक अद्भुत चक्र है, और इसी चक्र के केंद्र-बिंदु को 'पुरुषोत्तम' कहा गया है।
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