अनन्त का सिद्धांत
अनन्त - अनन्त = ?
गणित के परिपेक्ष्य में अनन्त सिद्धांत : गणित और विशेष रूप से कैलकुलस (Calculus) के नजरिए से देखा जाए, तो अनन्त (infty) - अनन्त(infty) का उत्तर सीधा 0 नहीं होता। इसे गणित में "अनिर्धारित रूप" (Indeterminate Form) कहा जाता है।
अनन्त कोई निश्चित संख्या नहीं है : अनन्त (infty) एक विचार या अवधारणा (Concept) है, कोई एक निश्चित संख्या (Fixed Number) नहीं। चूँकि हमें यह नहीं पता कि एक अनन्त दूसरे अनन्त के बराबर है या उससे बड़ा, इसलिए हम उन्हें घटाकर किसी निश्चित नतीजे पर नहीं पहुँच सकते।
अलग-अलग परिणाम संभव हैं : सीमाओं (Limits) के सिद्धांत के अनुसार, infty - infty की स्थिति में उत्तर कुछ भी हो सकता है। इसे निम्नलिखित उदाहरणों से समझा जा सकता है:
उदाहरण A: यदि हम x में से x घटाते हैं जब x अनन्त की ओर बढ़ रहा हो:
उदाहरण B: यदि हम 2x में से x घटाते हैं:
उदाहरण C: यदि हम (x + 5) में से x घटाते हैं: है
आध्यात्मिक दृष्टि में अनन्त सिद्धांत :
आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टि से अनंत - अनंत = अनंत ही होता है। जहाँ गणित इसे 'अनिर्धारित' मानता है, वहीं आध्यात्म इसे 'पूर्णता' के सिद्धांत से समझाता है।
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ईशावास्य उपनिषद
आध्यात्मिक व्याख्या के मुख्य बिंदु
अक्षय ऊर्जा का सिद्धांत : आध्यात्मिक दृष्टि से 'अनंत' वह स्रोत है जो कभी कम नहीं होता। जैसे एक जलते हुए दीपक से यदि आप हजारों दीपक भी जला लें, तो पहले दीपक की लौ (ऊर्जा) कम नहीं होती। वह अपनी पूर्णता में वैसी ही बनी रहती है।
चेतना का विस्तार का सिद्धांत : यदि आप 'अनंत' (परमात्मा) को स्वयं से अलग करके घटाते भी हैं, तो भी जो शेष बचता है वह शून्य नहीं, बल्कि फिर से वह अनंत सत्य ही होता है। क्योंकि सत्य के टुकड़े नहीं किए जा सकते।
शून्य और अनंत का मिलन: कि परम शून्य और परम अनंत एक ही बिंदु पर मिलते हैं। जब व्यक्ति अपने अहंकार (जो कि एक सीमा है) को अनंत में विसर्जित कर देता है, तब वह स्वयं अनंत हो जाता है।
निष्कर्ष: आध्यात्मिक गणित के अनुसार, आप अनंत में कुछ जोड़ें (infty + infty) या कुछ घटाएं (infty - infty), परिणाम हमेशा अनंत ही रहेगा क्योंकि 'पूर्ण' कभी भी अपूर्ण नहीं हो सकता।
प्रउत दर्शन में अनन्त सिद्धांत
1. सृष्टि चक्र (Srishti cakra) और अनंत का अस्तित्व
आनंदमूर्ति जी के दर्शन के अनुसार, यह संपूर्ण ब्रह्मांड 'ब्रह्म' का ही एक हिस्सा है, जो कि स्वयं अनंत है। ब्रह्मचक्र में दो प्रक्रियाएं होती हैं :
संचर (Sancara): अनंत चेतना का जड़ पदार्थ (Matter) में परिवर्तित होना।
प्रतिसंचर (Pratisancara): जड़ पदार्थ का पुनः विकसित होकर अनंत चेतना में विलीन होना।
इस चक्र में, यदि आप भौतिक जगत (जो कि सीमित दिखता है पर ऊर्जा रूप में अनंत है) को मूल सत्ता से घटाते भी हैं, तो भी शेष 'ब्रह्म' ही बचता है। क्योंकि ब्रह्म 'अखंड' है, उसके टुकड़े नहीं किए जा सकते।
2. भौतिक संपदा बनाम आध्यात्मिक उपलब्धि
प्राउटिस्ट दर्शन में 'अनंत' की इस अवधारणा को व्यावहारिक रूप से लागू किया जाता है:
भौतिक वस्तुएं सीमित हैं : पृथ्वी पर संसाधन (भोजन, पानी, जमीन) सीमित हैं। इसलिए यहाँ "अनंत - अनंत" जैसी स्थिति नहीं हो सकती। यहाँ वितरण का नियम चलता है।
मानसिक और आध्यात्मिक प्यास अनंत है: मनुष्य की इच्छाएं अनंत हैं। यदि इन इच्छाओं को भौतिक वस्तुओं (सीमित) से भरने की कोशिश की जाए, तो परिणाम शून्य या नकारात्मकता होती है।
समाधान : जब मनुष्य अपनी 'अनंत प्यास' को 'अनंत परमात्मा' की ओर मोड़ देता है, तो वह पूर्णता प्राप्त करता है। यहाँ आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने के बाद भी स्रोत (परमात्मा) में कोई कमी नहीं आती।
3. सामाजिक न्याय और प्रउत (PROUT) का दृष्टिकोण
"शारीरिक जगत की वस्तुएं सीमित हैं, लेकिन उनका उपयोग 'अनंत' (प्रकृति) की संपदा मानकर करना चाहिए।"
जब हम समाज के संसाधनों को 'अनंत' की संपदा समझकर वितरित करते हैं, तो समाज से अभाव का अंत होता है।
प्रउत का पहला सिद्धांत :- संचय पर समाज का आदेश - भौतिक संपदा सीमित उनका संचय अनियंत्रित रहने पर अव्यवस्था का जन्म होता है। अतः मनुष्य को अपनी संचय करने की प्रवृत्ति (Acquisition instinct) को भौतिक वस्तुओं के बजाय ज्ञान, प्रेम और आध्यात्मिक आनंद (जो कि अनंत है) की ओर मोड़ना चाहिए।
प्रउत का दूसरा सिद्धांत :- (१) चरम उत्कर्ष का सिद्धांत : - यदि हम सीमित संसाधनों से अपनी "अनन्त" इच्छाओं को पूरा करने की कोशिश करते हैं, तो संघर्ष और गरीबी पैदा होती है। जब हम विज्ञान और तकनीक का उपयोग करके एक छोटे से संसाधन से अधिकतम लाभ निकालते हैं, तो हम उसे उसकी 'चरम सीमा' तक ले जाते हैं। भौतिक वस्तु भले ही सीमित हो, लेकिन उसे उपयोग करने वाली मानवीय बुद्धि और विचार 'अनन्त' हैं। इसलिए, संसाधनों का अभाव कभी नहीं होगा यदि हम अपनी वैचारिक शक्ति का सही उपयोग करें। (२) न्यायपूर्ण वितरण का सिद्धांत :- , समाज के हर व्यक्ति को भोजन, आवास आदि की गारंटी के साथ जो लोग समाज के लिए अतिरिक्त योगदान देते हैं (जैसे वैज्ञानिक, डॉक्टर), उन्हें अतिरिक्त सुविधाएं देना। इससे उन्हें अतिरिक्त सुविधाएं मिलनी चाहिए ताकि वे अपनी 'अनन्त' संभावनाओं का और विकास कर सकें।
प्रउत का तीसरा सिद्धांत : व्यष्टि व समष्टि की संभावनाओं का चरम उपयोग का सिद्धांत : जब व्यक्ति अपनी क्षमताओं को समाज के लिए पूरी तरह अर्पित कर देता है, तो वह शून्य नहीं होता, बल्कि समाज की "अनन्त" शक्ति का हिस्सा बन जाता है। इसि प्रकार समाज जब व्यक्ति को विकसित होने के अनन्त अवसर देता है, तो समाज की सामूहिक गरिमा बनी रहती है।
प्रउत का चौथा सिद्धांत :- व्यष्टि व समष्टि की क्षमताओं के उपयोग में सुसंतुलन का सिद्धांत :- जब समष्टि (समाज) अपने 'अनन्त' संसाधनों में से व्यक्ति (व्यष्टि) के विकास के लिए 'अनन्त' अवसर निकालती है, तो समाज दरिद्र नहीं होता। इसके विपरीत, वह व्यक्ति विकसित होकर समाज को और अधिक 'अनन्त' समृद्धि लौटाता है। प्रगति एक निरंतर प्रक्रिया है। जब तक एक भी व्यक्ति (व्यष्टि) दुखी या पिछड़ा है, तब तक समष्टि (समाज) का संतुलन बिगड़ा रहेगा। समष्टि व्यक्ति अपनी क्षमता का उचित समायोजन नहीं करता व्यक्ति क्षमता व्यर्थ चली जाती है।
प्रउत का पांचवां सिद्धांत :- विस्तार और उपयोग का निरंतर परिवर्तन :- यही सिखाता है कि उपयोग की पद्धति बदल सकती है, लेकिन सामूहिक प्रगति की यात्रा अनंत है।
संक्षेप में: आध्यात्मिक और प्राउटिस्ट दृष्टि से: अनंत (परमात्मा) - अनंत (सृष्टि) = अनंत (अपरिवर्तनीय सत्य) यह दर्शाता है कि संसार में सब कुछ बदल जाने या समाप्त हो जाने के बाद भी वह 'चेतना' हमेशा पूर्ण बनी रहती है।
नीचे प्रउत की विभिन्न नीतियों के संदर्भ में इस धारणा का विश्लेषण दिया गया है:
1. शिक्षा नीति (Education Policy)
शिक्षा केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं है, बल्कि 'सा विद्या या विमुक्तये' (शिक्षा वही है जो मुक्त करे) पर आधारित है। ज्ञान का भंडार अनंत है। प्रउत के अनुसार, शिक्षा को किसी भी वर्ग या शुल्क की सीमा में नहीं बांधना चाहिए। छात्र के भीतर की अनंत संभावनाओं को जागृत करना ताकि वह संकीर्णता से मुक्त होकर मानवता की सेवा कर सके।
2. चिकित्सा नीति (Medical Policy)
स्वास्थ्य को एक व्यापार (Business) के बजाय जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता है। जीवन अनमोल और अनंत महत्ता का है। चिकित्सा नीति का लक्ष्य केवल बीमारी ठीक करना नहीं, बल्कि मनुष्य को शारीरिक और मानसिक रूप से इतना सुदृढ़ बनाना है कि वह अपने जीवन के अंतिम लक्ष्य (अनंत) की ओर अग्रसर हो सके। आधुनिकतम चिकित्सा सुविधाएं और प्राकृतिक पद्धतियां (योग-आयुर्वेद, वेदक शास्त्र) समाज के हर सदस्य को बिना किसी भेदभाव के सुलभ कराना।
3. कृषि नीति (Agricultural Policy)
कृषि को प्रउत में सर्वोच्च प्राथमिकता प्राप्त है। पृथ्वी की उर्वरता और प्रकृति के संसाधन अनंत हैं यदि उनका वैज्ञानिक और संतुलित दोहन किया जाए। अनन्त' की धारणा यहाँ सहकारी खेती (Co-operative Farming) के रूप में दिखती है, जहाँ भूमि का उपयोग निजी संपत्ति के रूप में नहीं, बल्कि सामूहिक प्रगति के लिए होता है ताकि कोई भी भूखा न रहे।
4. उद्योग और व्यापार नीति (Industrial & Trade Policy)
प्रउत 'अधिकतम उपयोग और तर्कसंगत वितरण' (Maximum Utilization & Rational Distribution) की बात करता है। स्थानीय कच्चे माल का उपयोग कर विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था बनाना।बिचौलियों को समाप्त कर उपभोक्ता सहकारी समितियों के माध्यम से व्यापार करना। लाभ की इच्छा सीमित होनी चाहिए, लेकिन सेवा की भावना अनंत। संपत्ति पर किसी का व्यक्तिगत एकाधिकार नहीं होना चाहिए क्योंकि यह परम पुरुष की सामूहिक संपत्ति है।
5. श्रमिक नीति एवं रोजगार (Labor & Employment)
प्रउत 'काम के बदले अधिकार' नहीं, बल्कि 'अधिकार के रूप में काम' की वकालत करता है। (१) न्यूनतम आवश्यकताएँ: भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सा और शिक्षा की गारंटी हर नागरिक को होनी चाहिए। (२) क्रय शक्ति (Purchasing Power): केवल रोजगार देना काफी नहीं है, बल्कि लोगों की क्रय शक्ति को लगातार बढ़ाना 'अनन्त' प्रगति का सूचक है। (३) श्रमिक: श्रमिकों को उद्योगों का केवल कर्मचारी नहीं, बल्कि साझीदार (Partner) माना जाता है। प्राउटिस्ट सर्व समाज (PSS) इसी नीति और दर्शन को धरातल पर उतारने के लिए प्रयासरत है। इस प्रकार नियोजित करते हैं, तो परिणाम स्वरूप मिलने वाली सुख-शांति भी 'अनंत' होती है।
प्राउटिस्ट सर्व समाज (PSS) के वैचारिक ढांचे में 'अनंत' की यह अवधारणा केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे सामाजिक और आर्थिक न्याय का आधार माना गया है।
1. भौतिक जगत: सीमित वस्तुएं, सामूहिक उपयोग
प्रउत कहता है कि भौतिक जगत के संसाधन (जैसे धन, भूमि, खनिज) सीमित हैं। यहाँ "अनंत - अनंत" का अर्थ यह है कि यदि मुट्ठी भर लोग 'अनंत' संग्रह की लालसा करेंगे, तो शेष समाज के लिए 'शून्य' बचेगा।
PSS का लक्ष्य: संसाधनों का अधिकतम उपयोग और तर्कसंगत वितरण (Rational Distribution) करना ताकि किसी को भी अभाव न हो। यहाँ 'सीमित' को 'अनंत' प्रेम और सेवा के साथ बांटना ही समाधान है।
2. मानसिक जगत: अनंत ज्ञान का विस्तार
मानसिक स्तर पर ज्ञान और विचार 'अनंत' होते हैं। प्राउटिस्ट विचारधारा के अनुसार, ज्ञान बांटने से घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है।यहाँ अनंत - अनंत = अनंत का अर्थ है: समाज को जितना अधिक शिक्षित और जागरूक (Pubclicity and Publication) बनाया जाएगा, समाज की सामूहिक शक्ति उतनी ही बढ़ती जाएगी।
3. आध्यात्मिक जगत: परम लक्ष्य
प्रउत का अंतिम लक्ष्य "आत्म-मोक्षार्थं जगद्धिताय च" (स्वयं की मुक्ति और जगत का कल्याण) है। ब्रह्मचक्र का सिद्धांत: हर मनुष्य उस 'अनंत' (ब्रह्म) का हिस्सा है। जब एक व्यक्ति अपनी सीमित पहचान (अहंकार) को मिटा देता है, तो वह शून्य नहीं होता, बल्कि वह उस 'अनंत' में समाहित होकर स्वयं 'अनंत' हो जाता है।.
प्राउटिस्ट सर्व समाज (PSS) के संदर्भ में इस दर्शन का महत्व:
राष्ट्रीय कार्यकारिणी का उद्देश्य :- सकारात्मक मूल उद्देश्य इसी दार्शनिक सत्य को धरातल पर उतारना है:
भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सा और शिक्षा: ये पांच बुनियादी आवश्यकताएं न्यूनतम रूप से सबको मिलनी चाहिए।
जब समाज के हर व्यक्ति की न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं, तब उसकी मानसिक ऊर्जा मुक्त होती है। वह मुक्त ऊर्जा फिर 'अनंत' की खोज (आध्यात्मिक प्रगति) में लग सकती है।
निष्कर्ष: प्रउत के लिए 'अनंत' कोई गणितीय उलझन नहीं, बल्कि एक प्रेरणा है। यह हमें सिखाता है कि हम भौतिक रूप से चाहे जितने भी छोटे या सीमित क्यों न हों, हमारा लक्ष्य और हमारी क्षमता उस 'अनंत' सत्ता के समान ही विशाल है। प्रगतिशील उपयोगितावाद (PROUT/प्रउत) के दर्शन में 'अनन्त-अनन्त = अनन्त' का सिद्धांत एक क्रांतिकारी आध्यात्मिक और सामाजिक अवधारणा है। यह इस विचार पर आधारित है कि चूँकि परमात्मा (परम पुरुष) अनंत हैं और यह जगत उन्हीं की अभिव्यक्ति है, इसलिए संसाधनों का प्रबंधन भी इसी व्यापक दृष्टिकोण से होना चाहिए ताकि हर व्यक्ति की अंतहीन शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक भूख शांत हो सके।
करण सिंह राजपुरोहित
प्रकाशन सचिव,
प्राउटिस्ट सर्व समाज
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