प्रउत के उदय ने यथार्थवाद को आईना दिखाया

प्रउत के उदय 
ने 
यथार्थवाद को आईना दिखाया

 

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यथार्थवाद बनाम प्रउत

यथार्थवाद (Realism) और प्रउत (PROUT - Progressive Utilization Theory) के बीच का संवाद दर्शन, राजनीति और अर्थशास्त्र के एक महत्वपूर्ण संगम को दर्शाता है। जहाँ यथार्थवाद दुनिया को उसके "वास्तविक" और अक्सर कठोर स्वरूप में देखता है, वहीं प्रउत उसे एक प्रगतिशील और आध्यात्मिक ढांचे के भीतर बदलने का प्रयास करता है।
यहाँ यथार्थवाद का विस्तृत विश्लेषण और प्रउत के दृष्टिकोण से उसका मूल्यांकन प्रस्तुत है:
1. यथार्थवाद (Realism) : एक परिचय
यथार्थवाद वह विचारधारा है जो आदर्शवाद (Idealism) के विपरीत कार्य करती है। यह इस बात पर जोर देती है कि दुनिया वैसी नहीं है जैसी "होनी चाहिए", बल्कि वैसी है जैसी "वह वास्तव में है"।
यथार्थवाद के मुख्य स्तंभ:
 * शक्ति की राजनीति : अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में यथार्थवाद का मानना है कि राज्य हमेशा अपनी शक्ति और सुरक्षा बढ़ाने का प्रयास करते हैं।
 * मानव स्वभाव : यथार्थवादी अक्सर मानव स्वभाव को स्वार्थी और सत्ता-लोलुप मानते हैं (जैसा कि मैकियावेली और हॉब्स ने वर्णित किया)।
 * अराजकता (Anarchy) : यथार्थवाद का मानना है कि वैश्विक स्तर पर कोई केंद्रीय सत्ता नहीं है, इसलिए हर राष्ट्र को अपनी रक्षा स्वयं करनी पड़ती है।
 * भौतिकवाद : यह विचारधारा नैतिक सिद्धांतों के बजाय व्यावहारिक परिणामों और भौतिक लाभ को प्राथमिकता देती है।
2. प्रउत (PROUT ) : संक्षिप्त अवलोकन
प्रउत का प्रतिपादन श्री प्रभात रंजन सरकार (श्री आनंदमूर्ति) द्वारा 1959 में किया गया था। यह सिद्धांत "सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय" पर आधारित है, लेकिन यह कोरी कल्पना नहीं है।
प्रउत के पांच बुनियादी सिद्धांत :
 * (1) सृष्टि की किसी भी संपत्ति का संचय समाज की अनुमति के बिना नहीं होना चाहिए।
 * (2) ब्रह्मांड की भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक क्षमता का अधिकतम उपयोग और तर्कसंगत वितरण होना चाहिए।
 * (3) मानव समाज की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संभावनाओं का पूर्ण विकास होना चाहिए।
 * (4) इन संसाधनों का उपयोग इस तरह हो कि समाज के बीच एक संतुलन बना रहे।
 * (5) बदलते समय और स्थान के साथ उपयोग की पद्धति बदलती रहनी चाहिए।
3. यथार्थवाद का प्रउत के दृष्टिकोण से मूल्यांकन
प्रउत यथार्थवाद को पूरी तरह से नकारता नहीं है, बल्कि उसे एक ऊंचे धरातल पर ले जाता है। प्रउत के प्रवर्तक श्री सरकार ने इसे "व्यक्तिपरक दृष्टिकोण के साथ वस्तुनिष्ठ समायोजन" (Objective adjustment with a subjective approach) कहा है।
क. मानव स्वभाव का विश्लेषण
 * यथार्थवाद : मानव को जन्मजात स्वार्थी और हिंसक मानता है।
 * प्रउत का दृष्टिकोण: प्रउत मानता है कि मनुष्य में "पशु प्रवृत्ति" और "दिव्य प्रवृत्ति" दोनों होती हैं। यथार्थवाद केवल पशु प्रवृत्ति (काम, क्रोध, लोभ) पर ध्यान केंद्रित करता है। प्रउत का कहना है कि सही आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था के माध्यम से मनुष्य की निम्न प्रवृत्तियों को नियंत्रित कर उसकी आध्यात्मिक क्षमता को जगाया जा सकता है।
ख. सत्ता और शक्ति (Power)
 * यथार्थवाद : शक्ति का अर्थ सैन्य और आर्थिक वर्चस्व है।
 * प्रउत का दृष्टिकोण : प्रउत "सामाजिक चक्र" (Social Cycle) की बात करता है। सत्ता कभी योद्धाओं (क्षत्रिय), कभी बुद्धिजीवियों (विप्र) और कभी व्यापारियों (वैश्य) के हाथ में होती है। प्रउत का लक्ष्य सत्ता को "सद्विप्र" (Sadvipras) के हाथ में देना है—ऐसे नैतिक और आध्यात्मिक व्यक्ति जो समाज के हर वर्ग के हितों की रक्षा कर सकें। यहाँ "शक्ति" का अर्थ शोषण नहीं, बल्कि सेवा है।
ग. संसाधनों का वितरण और भौतिकवाद
 * यथार्थवाद : संसाधनों पर कब्जा और संचय को राष्ट्र की मजबूती मानता है।
 * प्रउत का दृष्टिकोण : प्रउत इसे "मनो-आर्थिक रोग" मानता है। प्रउत के अनुसार, भौतिक संसाधनों का असीमित संचय दूसरों को उनके बुनियादी अधिकारों (भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सा, शिक्षा) से वंचित करता है। प्रउत एक "यथार्थवादी तर्कसंगत वितरण" का समर्थन करता है, न कि साम्यवाद की तरह पूर्ण समानता का, क्योंकि लोगों की क्षमताएं अलग-अलग होती हैं।
घ. राष्ट्रवाद बनाम विश्ववाद
 * यथार्थवाद : राष्ट्र-राज्य (Nation-state) को सर्वोच्च मानता है।
 * प्रउत का दृष्टिकोण : प्रउत संकीर्ण राष्ट्रवाद को मानवता के लिए खतरा मानता है। यह "नव्य-मानवतावाद" (Neo-humanism) का समर्थन करता है, जो मनुष्य के साथ-साथ पशु, पक्षी और पौधों के प्रति भी प्रेम और सम्मान सिखाता है। प्रउत एक "विश्व सरकार" की कल्पना करता है जो यथार्थवादी आधार पर क्षेत्रीय स्वायत्तता और वैश्विक एकता का संतुलन बनाए।
4. प्रउत का "यथार्थवादी" समाधान: आर्थिक लोकतंत्र
प्रउत केवल दर्शन नहीं है, यह व्यावहारिक यथार्थवाद पर आधारित है:
 * (१) विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था‌ : सत्ता और धन का केंद्र कुछ हाथों में न होकर स्थानीय समुदायों के पास होना चाहिए।
 * (२) न्यूनतम आवश्यकताएं‌ : हर व्यक्ति को जीवन की 5 बुनियादी ज़रूरतें गारंटी के साथ मिलनी चाहिए।
 * (३) अधिकतम क्रय शक्ति‌ : केवल आय बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, लोगों की "खरीदने की क्षमता" (Purchasing Power) बढ़ाना प्रउत का वास्तविक आर्थिक लक्ष्य है।
5. निष्कर्ष: एक नया समन्वय
यथार्थवाद जहाँ समाज की कड़वी सच्चाइयों और संघर्षों को उजागर करता है, वहीं प्रउत उन संघर्षों को समाप्त करने का एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक मार्ग प्रदान करता है। प्रउत का यथार्थवाद "शोषक" नहीं बल्कि "पोषक" है।
प्रउत के अनुसार, सच्चा यथार्थवाद वह है जो भौतिक जगत की सीमाओं को पहचानते हुए, मनुष्य को उसकी आध्यात्मिक अनंतता की ओर ले जाए। जैसा कि प्राउटिस्ट सर्व समाज (PSS) का उद्देश्य है—सभी के लिए बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करना और सामाजिक-आर्थिक विकास को गति देना—यही वह धरातल है जहाँ यथार्थवाद और आदर्शवाद का मिलन होता है।







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"यथार्थवाद जहाँ लड़खड़ाता है, वहाँ प्रउत सहारा देता है " 

यह कथन अत्यंत गहरा और तार्किक है। यथार्थवाद (Realism) अपनी तमाम व्यवहारिकता के बावजूद जहाँ मानवीय मूल्यों और सामाजिक न्याय के मोर्चे पर विफल होने लगता है, प्रउत (PROUT) वहाँ एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक समाधान प्रस्तुत कर समाज को गिरने से बचाता है।
​इसे हम निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझ सकते हैं:
​1. स्वार्थ बनाम परोपकार (मानव स्वभाव का द्वंद्व)
​यथार्थवाद जहाँ लड़खड़ाता है : यथार्थवाद मानकर चलता है कि मनुष्य स्वभाव से स्वार्थी और सत्ता का भूखा है। यह विचारधारा शोषण को "प्राकृतिक" मानकर उसे स्वीकार कर लेती है, जिससे समाज में 'मत्स्य न्याय' (बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है) वाली स्थिति पैदा होती है।
​प्रउत का सहारा: प्रउत इस बात को स्वीकार करता है कि मनुष्य में स्वार्थ है, लेकिन वह इसे अंतिम सत्य नहीं मानता। प्रउत 'नव्य-मानवतावाद' के जरिए मनुष्य की चेतना को संकीर्ण स्वार्थ से ऊपर उठाकर उसे ब्रह्मांडीय प्रेम से जोड़ता है। यह मनुष्य को लड़खड़ाने से रोकता है क्योंकि यह उसे पशु प्रवृत्ति से दिव्य प्रवृत्ति की ओर ले जाता है।
​2. संसाधनों का संचय बनाम तर्कसंगत वितरण
​यथार्थवाद जहाँ लड़खड़ाता है‌ : आर्थिक यथार्थवाद (पूंजीवाद का एक रूप) कहता है कि जिसके पास शक्ति है, वह संसाधन जुटाएगा। इसका परिणाम यह होता है कि दुनिया की 1% आबादी के पास 90% संपत्ति जमा हो जाती है, जिससे गरीबी और अपराध जन्म लेते हैं।
​प्रउत का सहारा : प्रउत का पहला सिद्धांत ही संचय पर रोक लगाता है—"समाज की अनुमति के बिना किसी को भौतिक संपत्ति का संचय नहीं करना चाहिए।" यह आर्थिक विषमता को रोककर समाज में संतुलन (Balance) प्रदान करता है।

​3. संघर्ष बनाम समन्वय (अंतर्राष्ट्रीय संबंध)
​यथार्थवाद जहाँ लड़खड़ाता है : अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में यथार्थवाद "शक्ति संतुलन" की बात करता है, जो अंततः हथियारों की दौड़ और युद्ध की ओर ले जाता है। यहाँ शांति केवल दो युद्धों के बीच का अंतराल बन जाती है।
​प्रउत का सहारा : प्रउत एक 'विश्व सरकार' (World Government) और 'विश्व संघ' की वकालत करता है। यह राष्ट्रों के बीच संघर्ष के बजाय 'सामाजिक चक्र' के आधार पर सहयोग को बढ़ावा देता है, जिससे वैश्विक राजनीति को एक स्थायी आधार मिलता है।
​4. भौतिकवाद की सीमा
​यथार्थवाद जहाँ लड़खड़ाता है : यथार्थवाद केवल भौतिक लाभ (GDP, सैन्य बल) को सफलता मानता है। लेकिन केवल भौतिक उन्नति से मानसिक शांति नहीं मिलती, जिससे समाज अवसाद और नैतिक पतन का शिकार हो जाता है।
​प्रउत का सहारा : प्रउत "शारीरिक-मानसिक-आध्यात्मिक" तीनों स्तरों पर प्रगति की बात करता है। यह मनुष्य को केवल 'आर्थिक प्राणी' नहीं मानता, बल्कि उसे एक आध्यात्मिक इकाई के रूप में प्रतिष्ठा देता है।


​प्रउतवादी दृष्टिकोण का चित्रमय सारांश
​यथार्थवाद एक टूटे हुए आईने की तरह है जो केवल वर्तमान की विकृतियों को दिखाता है। प्रउत उस आईने को जोड़कर उसे एक दूरबीन बनाता है, जिससे भविष्य की सुंदर और न्यायपूर्ण दुनिया देखी जा सके। जहाँ यथार्थवाद सत्ता के नशे में नैतिकता को भूल जाता है, वहाँ प्रउत 'सद्विप्रों' (नैतिक नेताओं) के माध्यम से समाज को सहारा देता है।











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प्रउत ने यथार्थवाद को आईना दिखाया है,

 यथार्थवाद (Realism) जहाँ केवल "अस्तित्व की लड़ाई" (Survival of the fittest) तक सीमित था, वहीं प्रउत ने उसे समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी का अहसास कराया।
​प्रउत ने यथार्थवाद की कमियों को उजागर करते हुए उसे निम्नलिखित चार आईने दिखाए :
​1. संचय का आईना : "असीमित संचय प्रगति नहीं, चोरी है"
​यथार्थवाद मानता है कि अधिक से अधिक संसाधन जुटाना एक राष्ट्र या व्यक्ति की शक्ति का परिचायक है। प्रउत ने आईना दिखाते हुए कहा कि भौतिक संसाधन सीमित हैं। यदि एक व्यक्ति अपनी आवश्यकता से अधिक संचय करता है, तो वह अनजाने में ही किसी दूसरे की थाली से रोटी छीन रहा होता है।
​प्रउत का समाधान: प्रउत ने भौतिक संसाधनों के 'तर्कसंगत वितरण' का सिद्धांत देकर यथार्थवाद को स्वार्थ से ऊपर उठना सिखाया।
​2. शक्ति का आईना: "दमन नहीं, सेवा ही असली शक्ति है"
​यथार्थवाद में 'शक्ति' का अर्थ है—दूसरे को नियंत्रित करने या हराने की क्षमता। प्रउत ने आईना दिखाया कि जो शक्ति समाज के अंतिम व्यक्ति के आंसू न पोंछ सके, वह शक्ति नहीं बल्कि 'अहंकार' है।
​प्रउत का समाधान : प्रउत ने सद्विप्र (Sadvipra) की अवधारणा दी। सद्विप्र वह है जो शक्तिशाली तो है, लेकिन उसकी शक्ति का उपयोग समाज के शोषण को रोकने और न्याय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए होता है।
​3. लोकतंत्र का आईना : "राजनीतिक आजादी बिना आर्थिक आजादी के अधूरी है"
​यथार्थवादी राजनीति केवल वोट और सत्ता के समीकरणों तक सीमित रहती है। प्रउत ने आईना दिखाया कि एक भूखा व्यक्ति अपनी राजनीतिक आजादी का सही उपयोग कभी नहीं कर सकता। उसे पैसे के दम पर खरीदा जा सकता है।
​प्रउत का समाधान : प्रउत ने आर्थिक लोकतंत्र (Economic Democracy) का विचार दिया। इसके अनुसार, स्थानीय लोगों का स्थानीय संसाधनों पर नियंत्रण होना चाहिए ताकि उनकी न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी हो सकें और वे सही अर्थों में स्वतंत्र हो सकें।
​4. प्रगति का आईना : "केवल भौतिक विकास विनाश की ओर ले जाता है"
​यथार्थवाद केवल GDP और सैन्य शक्ति को विकास का पैमाना मानता है। प्रउत ने आईना दिखाया कि यदि समाज मानसिक और आध्यात्मिक रूप से विकसित नहीं है, तो वह भौतिक संसाधनों का उपयोग केवल विनाशकारी हथियारों या पर्यावरण को नष्ट करने में करेगा।
​प्रउत का समाधानज्ञ: प्रउत ने प्रगति की परिभाषा बदली। असली प्रगति वह है जो मनुष्य को भौतिकता के दलदल से निकालकर मानसिक शांति और आध्यात्मिक बोध की ओर ले जाए।
​निष्कर्ष
​प्रउत ने यथार्थवाद को यह एहसास कराया कि दुनिया केवल एक बाज़ार या युद्ध का मैदान नहीं है, बल्कि एक "साझा परिवार" है। प्राउटिस्ट सर्व समाज के माध्यम से इन सिद्धांतों की बात करते हैं, तो वे वास्तव में समाज को वही आईना दिखा रहे होते हैं जो उसे उसकी नैतिक जिम्मेदारियों की याद दिलाता है।
​"यथार्थवाद हमें जमीन पर रहना सिखाता है, लेकिन प्रउत हमें उस जमीन को सबके लिए उपजाऊ बनाना सिखाता है।"













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विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था धरातल पर यथार्थवाद का परिक्षण

प्रउत की विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था (Decentralized Economy) वह ठोस धरातल है, जहाँ यथार्थवाद के खोखले वादे समाप्त होते हैं और वास्तविक समाधान शुरू होते हैं। वर्तमान वैश्विक यथार्थवाद (पूंजीवाद) में सत्ता और संपत्ति का केंद्र कुछ महानगरों या कुछ पूंजीपतियों के पास होता है, जबकि प्रउत इसे 'जमीन' तक वापस ले जाता है।
​प्रउत के विकेंद्रीकृत आर्थिक मॉडल के मुख्य स्तंभ निम्नलिखित हैं:
​1. स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण
​यथार्थवाद में दूर बैठा कोई निवेशक किसी गांव के संसाधनों का दोहन करता है। प्रउत इसे बदलकर "भूमिपुत्र" के सिद्धांत को लागू करता है।
​सिद्धांत: किसी क्षेत्र के कच्चे माल, खनिज और श्रम का उपयोग सबसे पहले वहीं के लोगों के विकास के लिए होना चाहिए।
​लाभ: इससे गांवों से शहरों की ओर होने वाला पलायन रुकेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर बनेगी।
​2. तीन-स्तरीय औद्योगिक ढांचा
​प्रउत उद्योगों को उनकी प्रकृति के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटता है ताकि शोषण की गुंजाइश न रहे:
​मुख्य उद्योग (Key Industries): बिजली, संचार, और भारी खनन जैसे उद्योग जिन्हें निजी हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता, उन्हें स्थानीय सरकार द्वारा संचालित किया जाना चाहिए (बिना लाभ-हानि के सिद्धांत पर)।
​सहकारी उद्योग (Cooperative Industries): अधिकांश वस्तुओं का उत्पादन सहकारी समितियों (Cooperatives) द्वारा होना चाहिए। यह प्रउत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
​लघु उद्योग (Small-scale Industries): बहुत छोटे स्तर के उद्योग व्यक्तिगत मालिकाना हक में रह सकते हैं।
​3. सहकारी खेती (Cooperative Farming)
​वर्तमान यथार्थ यह है कि छोटे किसान खेती छोड़ रहे हैं। प्रउत इसका समाधान 'सहकारी कृषि' में देखता है।
​किसान अपनी जमीन का मालिकाना हक रखते हुए मिलकर खेती करेंगे।
​आधुनिक तकनीक और सिंचाई के साधनों का सामूहिक उपयोग होगा।
​इससे न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि किसानों की क्रय शक्ति (Purchasing Power) भी बढ़ेगी।
​4. आर्थिक खंड (Socio-Economic Units)
​प्रउत पूरी दुनिया को केवल राजनीतिक सीमाओं में नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक खंडों (Samajas) में बांटने की बात करता है।
​ये खंड अपनी भौगोलिक स्थिति, संस्कृति और आर्थिक समस्याओं के आधार पर अपनी योजनाएं खुद बनाएंगे।
 प्राउटिस्ट सर्व समाज इसी 'समाज' की अवधारणा को सशक्त करने का प्रयास है, ताकि हर क्षेत्र अपनी विशिष्ट पहचान के साथ आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सके।
​5. मुद्रा और लाभ का स्थानीय चक्र
​विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था में यह सुनिश्चित किया जाता है कि स्थानीय क्षेत्र में कमाया गया पैसा वहीं के बाजार में घूमता रहे।
​जब पैसा बाहर नहीं जाएगा (Drain of wealth रुकेगा), तो उस क्षेत्र की समृद्धि तेजी से बढ़ेगी।
​इसके विपरीत, वर्तमान यथार्थवादी मॉडल में गांव का पैसा शहरों में और देश का पैसा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जरिए विदेश चला जाता है।
प्रउत का यह मॉडल यथार्थवाद को "हवाई किलों" से उतारकर "जमीन की हकीकत" पर लाता है। यह केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक ब्लूप्रिंट है जिससे गरीबी, बेरोजगारी और आर्थिक गुलामी को जड़ से खत्म किया जा सकता है।
6. यथार्थवादी पूंजीवाद बनाम प्रउत का आर्थिक मॉडल
यथार्थवादी पूंजीवाद और प्रउत के आर्थिक मॉडल के बीच का अंतर मुख्य रूप से 'शक्ति के केंद्र' और 'लक्ष्य' का है। यहाँ इनका संक्षिप्त तुलनात्मक विवरण दिया गया है:
​1. सत्ता और नियंत्रण
​यथार्थवादी पूंजीवाद: आर्थिक सत्ता केंद्रीयकृत होती है। निर्णय लेने का अधिकार कुछ बड़े पूंजीपतियों या केंद्रीय संस्थाओं के पास होता है।
​प्रउत: आर्थिक सत्ता विकेंद्रीकृत होती है। संसाधनों पर पहला अधिकार और निर्णय लेने की शक्ति स्थानीय लोगों (Local People) के पास होती है।
​2. उत्पादन का उद्देश्य
​यथार्थवादी पूंजीवाद: इसका मुख्य लक्ष्य 'अधिकतम लाभ' (Profit Maximization) कमाना है, चाहे उससे समाज का अहित ही क्यों न हो।
​प्रउत: इसका मुख्य लक्ष्य 'अधिकतम उपयोग' (Maximum Utilization) और मानवता की सेवा है। उत्पादन उपभोग के लिए होता है, न कि केवल मुनाफे के लिए।
​3. संसाधनों का स्वामित्व
​यथार्थवादी पूंजीवाद: संसाधनों पर निजी स्वामित्व (Private Ownership) को बढ़ावा दिया जाता है, जिससे धन का संचय कुछ ही हाथों में सिमट जाता है।
​प्रउत: मुख्य उद्योगों पर सरकारी नियंत्रण और मध्यम उद्योगों में 'सहकारी तंत्र' (Cooperatives) को प्राथमिकता दी जाती है, ताकि लाभ का बंटवारा न्यायपूर्ण हो।
​4. रोजगार और क्रय शक्ति
​यथार्थवादी पूंजीवाद: लाभ बढ़ाने के लिए मशीनीकरण द्वारा श्रम की कटौती की जाती है, जिससे बेरोजगारी बढ़ती है।
​प्रउत: इसका प्राथमिक उद्देश्य हर व्यक्ति को 'पूर्ण रोजगार' देना और उसकी 'क्रय शक्ति' (Purchasing Power) को बढ़ाना है।

Presented by -
Karan Singh Rajpurohit
Publication Secretary, Proudist Sarva Samaj
9982322405


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