आओ साधना करते हैं
कर्ता, कर्म, करण, क्रिया इत्यादि सबको ब्रह्ममय देखने का नाम मधुविद्या साधना है। 'मधु' का शाब्दिक अर्थ है मिठास। मधु वह है जो मनुष्य को आनंद देती है। जब कोई मिठास कष्ट अथवा व्याधि देने लगे, तब उसका स्वाभाविक गुण तो मीठा हो सकता है, लेकिन वह मधु नहीं हो सकता। अतः, आनंदमय जीवन बनाने एवं जीने की कला का नाम ही मधुविद्या है। आनंद ही ब्रह्म है, इसलिए मधुविद्या को ब्रह्मविद्या भी कहते हैं। ब्रह्मविद्या, वह कला है जो सब कुछ में ब्रह्म दिखाती है अथवा ब्रह्म देखती है। इसकी एक विशेष विधा होने के कारण यह साधना मधुविद्या कहलाती है।
तत्त्व-धारणा के बाद, उन्होंने तुरंत सवाल किया, "मधुविद्या साधना में पारंगत कैसे हो सकते हैं?"
मैंने कहा, "हर कर्म को ब्रह्मभाव में करना व देखना ही मधुविद्या साधना है, और ब्रह्मभाव में रहने का अर्थ है कारक व क्रिया में ब्रह्म देखना। जब हम एक क्रिया से दूसरी क्रिया में प्रवेश करते हैं, तब उस सूक्ष्म अंतर को ब्रह्मभाव से भरने से मधुविद्या साधना हो जाती है। लेकिन यदि कार्य संपन्न होने तक वह भाव नहीं रहा, तो मधुविद्या पूर्ण नहीं होगी। अतः, जब भी हम अपने से बाहर कुछ भी देखें, तो उसे स्वयं से अलग न देखने के लिए ब्रह्मभाव में देखना, समझना, मानना एवं जानना आवश्यक है। इसीलिए मधुविद्या को साधना के रूप में करना होता है।"
उन्होंने तपाक से सवाल किया, "आपने कितना सरलता से कह दिया कि सबको ब्रह्ममय देखना, क्या यह संभव है?"
मैंने कहा, "हाँ, संभव है। अपने जैसा सबको मानना, जानना एवं समझना कैसे असंभव हो सकता है? जब यह असंभव नहीं है, तो मधुविद्या असंभव नहीं है, क्योंकि यही तो मधुविद्या है। चूँकि हम पहले से ही ब्रह्म हो चुके हैं, तभी सबको ब्रह्ममय देख रहे हैं।"
उन्होंने प्रश्न किया, "चोर, डाकू, लुटेरा, बलात्कारी, अपराधी, आतंकवादी कैसे ब्रह्म हो सकते हैं? जब ये ब्रह्म नहीं हैं, तो इन्हें ब्रह्ममय कैसे देखें?"
मैंने कहा, "तुमने कैसे जान लिया कि ये ब्रह्म नहीं हैं?"
उन्होंने कहा, "ये विध्वंसक हैं, इसलिए ये ब्रह्म नहीं हो सकते हैं।"
मैंने कहा, "ये सभी समाज के लिए एक समस्या अवश्य हैं, लेकिन आध्यात्मिक जगत में ये ब्रह्म से पृथक नहीं हैं। उनके अंदर के ब्रह्मत्व को जगाने एवं स्वयं के ब्रह्मत्व को बचाने के लिए उन्हें ब्रह्म रूप में देखना ही होता है।"
उन्होंने कहा, "जब मैं इन्हें अथवा मेरे शत्रु को ब्रह्ममय नहीं देखूँगा, तो मेरे ब्रह्मत्व को कैसे हानि पहुँचेगी (विपन्न हो जाएगा)?"
मैंने कहा, "यह बिल्कुल सरल है। ब्रह्मत्व पूर्णत्व का नाम है। जब आप इसको ब्रह्म नहीं मानते, जानते एवं देखते हो, तो अवश्य आपका पूर्णत्व खंडित होता है। अतः, किसी को भी ब्रह्ममय न देखने से अपना ब्रह्मत्व क्षीण होता है।"
उन्होंने कहा, "ठीक है, यह तो समझ गया, लेकिन उनमें ब्रह्मत्व का जागरण कैसे होगा?"
मैंने कहा, "यदि हम ब्रह्म हैं, तो उनमें ब्रह्मत्व जागकर ही रहता है।"
उन्होंने कहा, "कंस एवं रावण में ब्रह्मत्व क्यों नहीं जागा, जबकि उनको तो स्वयं श्रीकृष्ण एवं राम ने ब्रह्ममय देखा था?"
मैंने कहा, "यह सबसे अच्छा प्रश्न है। लेकिन यह जान लेना आवश्यक है कि दोनों में ब्रह्मत्व जाग गया था, क्योंकि उन्हें ब्रह्म ने ब्रह्म रूप में देखा था। वे परमब्रह्म से अलग न होने के लिए ब्रह्म के हाथों चित्त होना चाहते थे। अतः आप यह नहीं कह सकते कि उनमें ब्रह्मत्व नहीं जागा था। जब हम ब्रह्ममय बनकर हमारे मित्र व शत्रु सबको ब्रह्ममय देखेंगे, तो या तो वे हमारे साथ एकाकार होंगे, अथवा हमसे चित्त होकर हम में मिल जाएँगे। अतः, कभी भी शत्रु को भी ब्रह्म से पृथक नहीं समझना चाहिए। ऐसा करने सेना दोनों तथा सबका लाभ है।"
उन्होंने तुरंत कहा, "क्या हमारे ब्रह्ममय देखने से डाकू, चोर, लुटेरा, अपराधी, बलात्कारी, आतंकवादी इत्यादि में ब्रह्मत्व जाग जाता है?"
मैंने कहा, "यह हम पर निर्भर करता है कि हम में ब्रह्मत्व का कितना अंश है। यदि शत-प्रतिशत है, तो कालीचरण बंदोपाध्याय, कालिकानंद अवधूत बन जाएगा। अन्यथा, उसमें ब्रह्मत्व का प्रश्न तो जाग ही जाएगा। इसलिए शत्रु के विरुद्ध सामाजिक स्तर पर कार्यवाही करते समय भी ब्रह्म भाव को नहीं त्यागना चाहिए।"
उन्होंने कहा, "यह तो बड़ा मुश्किल है!"
मैंने कहा, "यह हमें मुश्किल इसलिए लग सकता है, यदि हम ब्रह्ममय नहीं हैं तो; यदि हम ब्रह्ममय हैं, तो यह मुश्किल नहीं है।"
इस प्रकार हमारी वार्तालाप आगे बढ़ती गई तथा हमने ब्रह्मविद्या के महात्म्य को जान लिया। तब उन्होंने कहा, "मधुविद्या साधना के बिना सब कुछ असंभव है?"
मैंने कहा, "आपने ठीक कहा, लेकिन मधुविद्या से भी पहले ईश्वर प्रणिधान आवश्यक है।"
उनका प्रश्न हुआ, "सबसे पहले मधुविद्या क्यों नहीं?"
मैंने कहा, "एक दीपक दूसरे को तभी प्रज्वलित कर सकता है, जब वह स्वयं प्रज्वलित हो। ठीक उसी प्रकार, जब हम में ब्रह्मत्व का जागरण नहीं है, तब तक मधुविद्या संभव नहीं है। वह वैसी बात हो गई जैसे कि गंगा-जमुना गए, तन को धोया, लेकिन मन को नहीं। यदि मन को धोया होता, तो 'मन चंगा तो कटौती में गंगा' सिद्ध हो गया होता।"
इस प्रकार, मधुविद्या में पारंगत होने के लिए अभ्यास में गुरुमंत्र को भावमय रूप से सब पर आरोपित करते हुए चलना है।
प्रस्तुति : आनन्द किरण
Let's Sadhana.
Seeing the doer, action, instrument, and action as Brahman is called Madhuvidya Sadhana. Madhu literally means sweetness. Honey is that which brings joy to a person. When sweetness causes pain or illness, its inherent quality may be sweet, but it cannot be honey. Therefore, the art of creating and living a blissful life is called Madhuvidya. Bliss is Brahman, hence Madhuvidya is also called Brahmavidya. Brahmavidya is the art that reveals or sees Brahman in everything. Because it has a special method, this practice is called Madhuvidya.
After understanding the essence, he immediately asked, "How can one master Madhuvidya Sadhana?"
I said, "Performing and viewing every action in the state of Brahman is the practice of Madhuvidya, and remaining in the state of Brahman means seeing Brahman in the cause and action. When we transition from one action to another, filling that subtle gap with Brahman constitutes Madhuvidya practice. But if that feeling is lost by the time the task is completed, Madhuvidya will not be complete. Therefore, whenever we see anything outside of ourselves, it is essential to see, understand, believe, and know it in the state of Brahman to ensure that it is not separate from ourselves. That is why Madhuvidya has to be practiced as a practice."
He immediately asked, "You said so simply that seeing everyone as Brahman is possible. Is that possible?"
I said, "Yes, it is possible. How can it be impossible to believe, know, and understand everyone like ourselves? If that is not impossible, then Madhuvidya is not impossible, because that is what Madhuvidya is. Since we have already become Brahman, that is why we see everyone as Brahman."
He asked, "How can thieves, robbers, looters, rapists, criminals, terrorists be Brahman? If they are not Brahman, how can one see them as Brahman?"
I said, "How do you know that they are not Brahman?"
He said, "They are destructive, therefore they cannot be Brahman."
I said, "All of these are certainly a problem for society, but in the spiritual world, they are not separate from Brahman. To awaken the Brahman within them and to protect one's own Brahman, one must see them as Brahman."
He said, "If I do not see them or my enemy as Brahman, how will my Brahman be harmed (impaired)?"
I said, "It's quite simple. Brahman is the name of completeness. When you do not believe, know, and see this as Brahman, your completeness is certainly shattered. Therefore, not seeing anyone as Brahman diminishes one's Brahman."
He said, "Okay, I understand that, but how will the Brahmatva awaken in them?"
I said, "If we are Brahma, then the Brahmatva is always awakened in us."
He said, "Why didn't the Brahmatva awaken in Kansa and Ravana, when Lord Krishna and Rama themselves saw them as Brahmamaya?"
I said, "This is a very good question. But it is important to understand that the Brahmatva awakened in both of them because Brahma saw them as Brahmamaya. They wanted to be absorbed in Brahmana to avoid separation from the Supreme Brahmana. Therefore, you cannot say that the Brahmatva did not awaken in them. When we become Brahmamaya and see everyone, our friends and enemies, as Brahmamaya, as Brahmamaya, then they will either become one with us, or they will merge with us by becoming absorbed in us. Therefore, even the enemy should never be considered separate from Brahmana. Doing so benefits both the army and everyone."
He immediately asked, "Does our Brahmamaya awaken Brahmatva in a robber, thief, robber, criminal, rapist, terrorist, etc. by observing Brahmatva?"
I said, "It depends on us how much Brahmatva we possess. If we possess it 100%, then Kalicharan Bandopadhyay will become Kalikananda Avdhoot. Otherwise, the question of Brahmatva will inevitably arise in him. Therefore, even when taking social action against the enemy, one should not abandon Brahmabhaav (the feeling of Brahma)."
He said, "This is very difficult!"
I said, "It may seem difficult to us if we are not Brahmamaya; if we are Brahmamaya, then it is not difficult."
Thus, our conversation continued, and we learned the greatness of Brahmavidya. Then he asked, "Is everything impossible without Madhuvidya Sadhana?"
I said, "You are right, but even before Madhuvidya, devotion to God is necessary."
His question was, "Why not Madhuvidya first?"
I said, "One lamp can only light another when it is lit itself. Similarly, Madhuvidya is not possible unless we have awakened to the divine. It is like going to the Ganges and Yamuna rivers and washing the body, but not the mind. If the mind had been washed, the "Mind is pure, Ganga is in the cut" would have been realized."
Thus, to master Madhuvidya, one must practice the Gurumantra while passionately applying it to everything.
Presented by Anand Kiran
चलो अपा साधना करां
कर्ता, कर्म, क्रिया अर करण नै ब्रह्म रै रूप मांय देखणो मधुविद्या साधना कैवै है। मधु रो शाब्दिक अरथ है मिठास। मधु वो है जो किणी मिनख नै खुशी देवै है। जद मिठास सूं पीड़ा या बीमारी हुवै है, तो इणरी अंतर्निहित गुणवत्ता मीठी हो सकै है, पण ओ मधु नीं हो सकै। इण वास्तै आनंदमय जीवन रचण अर जीवण री कला नै मधुविद्या कैवै। आनंद ब्रह्म है, इण वास्तै मधुविद्या नै ब्रह्मविद्या भी कैयो जावै है। ब्रह्माविद्या वा कला है जिण मांय हरेक चीज मांय ब्रह्म नै प्रगट करियो जावै या देख्यो जावै। इणरी एक खास पद्धति होवण रै कारण इण साधना नै मधुविद्या कैवै।
तत्व धारणा नै समझ्यां पछै बां तुरंत पूछ्यो, "कोई मधुविद्या साधना नै कियां महारत हासिल कर सकै है?"
म्हैं कैयो- "ब्रह्म री अवस्था मांय हरेक क्रिया नै करणो अर देखणो मधुविद्या रो अभ्यास है अर ब्रह्म री अवस्था मांय रैवणो मतलब ब्रह्म नै कारण अर क्रिया मांय देखणो है। जद आपां एक क्रिया सूं दूजी क्रिया मांय जावां तो उण सूक्ष्म अंतर नै ब्रह्म सूं भरणो मधुविद्या रो अभ्यास बणै। पण जे वा भावना उण बगत तांई खत्म हुय जावै तो मधुविद्या रो काम पूरो नीं हुवैला। इण वास्तै, जद भी आपां खुद सूं बारै री कोई चीज देखां, तो उणनै ब्रह्म री अवस्था मांय देखणो, समझणो, मानणो अर जाणणो जरूरी है ताकि ओ सुनिश्चित हो सकै कै वा खुद सूं न्यारी नीं हुवै, इणी वास्तै मधुविद्या नै एक अभ्यास रै रूप मांय अभ्यास करणो पड़ैला।"
उण तुरंत पूछ्यो, "थै इतरो सरल कैयो कै सगळा नै ब्रह्म रै रूप मांय देखणो संभव है। कांई ओ संभव है?"
मैं बोल्यो, "हां, ओ संभव है। आपां जिसा सगळा माथै विस्वास करणो, जाणणो अर समझणो असंभव कियां हो सकै है? जे ओ असंभव कोनी है तो मधुविद्या असंभव कोनी है, क्यूंकै मधुविद्या ई असंभव कोनी है। क्यूँकि आपां पैली सूं ई ब्रह्म बण चुक्या हां, इणी वास्तै आपां सगळा नै ब्रह्म रै रूप मांय देखां हां।"
उण पूछ्यो कै चोर, लुटेरा, लूटेरा, बलात्कारी, अपराधी, आतंकवादी ब्रह्ममय कियां हो सकै है? जे वै ब्रह्ममय कोनी है तो बांनै ब्रह्ममय कियां देख्यो जा सकै है।
मैं बोल्यो, "थनै कांईं ठाह है कै वै ब्रह्ममय कोनी है?"
उण कैयो, "वे विनाशकारी है, इण वास्तै वे ब्रह्ममय नीं हो सकै।"
म्हैं बोल्यो, "अै सगळा निश्चित रूप सूं समाज सारू समस्या है, पण आध्यात्मिक जगत मांय वै ब्रह्म सूं न्यारा नीं है। वांरै मांय रै ब्रह्म नै जगावण अर खुद रै ब्रह्मत्व री रक्षा करण सारू वांनै ब्रह्म रै रूप मांय देखणो जरूरी है।"
उण कैयो, "अगर मैं बांनै या म्हारा दुश्मन नै ब्रह्ममय नीं देखूं तो म्हारा ब्रह्मत्व नै कियां नुकसान हुवैला?"
मैं बोल्यो, "ओ एकदम साधारण है। ब्रह्म पूर्णता रो नाम है। जद थै इणनै ब्रह्म रै रूप मांय नीं मानो, नीं जाणौ अर नीं देखौ तो थारी पूर्णता निश्चित रूप सूं चकनाचूर हुय जावैला। इण वास्तै, किणी नै भी ब्रह्म रै रूप मांय नीं देखणो किणी रै ब्रह्म नै कम कर देवै है।"
बो बोल्यो, "ठीक है, म्हैं ओ समझग्यो, पण बां मांय ब्रह्मत्व कियां जागैला?"
मैं बोल्यो, "अगर आपां ब्रह्म हां तो उण रै मांय ब्रह्मत्व निश्चित जागतो रैवै है।"
बोल्या, कंस अर रावण में ब्रह्मत्व क्यूं कोनी जाग्यो, जद खुद भगवान कृष्ण अर राम उण ने ब्रह्ममय देख्या।
म्हैं कैयो- "ओ तो घणो आछो सवाल है। पण ओ समझणो जरूरी है कै ब्रह्मतव दोनूंवां मांय जागग्यो क्यूंकै ब्रह्म बांनै ब्रह्ममय रै रूप मांय देखता हा। वै परम ब्रह्म सूं वियोग सूं बचण सारू ब्रह्म मांय लीन हुवणो चावता हा। इण वास्तै आप ओ नीं कैय सकौ कै ब्रह्मतव बां मांय नीं जाग्यो। जद आपां ब्रह्ममय बण जावां अर सगळा नै आपां रा दुश्मन अर ब्रह्ममय रै रूप मांय देख सकां। ब्रह्ममया, फेर वे या तो आपां रै साथै एक हो जावैला, या फेर वे आपां रै मांय लीन हो'र आपां रै साथै विलीन हो जावैला, इण वास्तै, दुश्मन नै भी कदैई ब्रह्मण सूं न्यारो नीं मानणो चाइजै।
उण झट सूं पूछ्यो कै कांई आपणी ब्रह्ममाय ब्रह्मत्व रै पालन सूं डाकू, चोर, लुटेरा, अपराधी, बलात्कारी, आतंकवादी आद में ब्रह्मत्व जगावै है?
म्हैं कैयो, "ओ आपां माथै निर्भर करै है कै आपां रै मांय कितरो ब्रह्मत्व है। जे आपां रै मांय ओ शतप्रतिशत है तो कालीचरण बंदोपाध्याय कालीकानंद अवधूत बण जावैला। नींतर उण मांय ब्रह्मत्व रो सवाल अनिवार्य रूप सूं उठैला। इण वास्तै दुश्मन रै खिलाफ सामाजिक कार्रवाई करतां बगत भी ब्रह्म री भावना नै त्यागणो नीं चाइजै।"
बो बोल्यो, "ओ घणो अबखो काम है!"
मैं बोल्यो, "अगर म्हे ब्रह्ममय नीं हां तो म्हानै ओ कठिन लाग सकै है; जे म्हे ब्रह्ममाय हां तो ओ कठिन कोनी है।"
इण भांत म्हारी बातचीत चालती रैयी, अर म्हांनै ब्रह्मविद्या री महानता री जाणकारी मिली। तद वो पूछ्यो कै कांई मधुविद्या साधना रै बिना सगळो कीं असंभव है?
मैं बोल्यो, “थै तो ठीक कैवता पण मधुविद्या सूं पैली भी ईश्वर प्रणिधान जरूरी है।”
उणरो सवाल हो, "पैली मधुविद्या क्यूं नीं?"
मैं बोल्यो, "एक दीयो दूजा दीया नै तद ही प्रज्वलित कर सकै है जद बो खुद ई प्रज्वलित हुवै। इणी भांत मधुविद्या संभव कोनी जद तांई आपां मांग ब्रह्मत्व जाग नीं जावां। ओ गंगा अर यमुना नदियां रै कनै जा'र शरीर नै धोवण री तरै है, पण मन नै नीं। जे मन नै धो दियो जातो तो "मन चंगा तो कटोती में गंगा" रो एहसास हो जातो।"
इण वास्तै, मधुविद्या में महारत हासिल करण रै वास्तै, किणी नै गुरुमंत्र रो अभ्यास करणो पड़सी अर साथै ई इणनै हरेक चीज माथै भाव सूं लागू करणो पड़सी।
आनंद किरण री प्रस्तुति
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