वैचारिक स्वतंत्रता बनाम वैचारिक प्रदुषण (Ideological freedom versus ideological pollution)


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       [श्री] आनन्द किरण "देव"
     [Shri] Anand Kiran "Dev"
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आज मै हैलमेट लगाकर आया हूँ। क्योंकि भारतवर्ष के राजनैतिक परिदृश्य में कुछ भी अनहोनी हो सकती है। कसूर कुणाल कामरा का टूट गया बेचारा स्टूडियो, उसको तो यह भी पता नहीं है कि मेरा इस्तेमाल क्यों किया गया है। यदि गुस्सा स्टूडियो मालिक से भी था तो उसका क्या दोष, उसका तो व्यापार है। इसलिए आज हर भारतीय को अपनी सुरक्षा का इन्तजाम करे के ही निकलना चाहिए। मैं यहाँ कुणाल कामरा का समर्थन अथवा विरोध करने नहीं आया हूँ। मैं तो भारतवर्ष की वह महान तस्वीर बनाने आया हूँ, जिसके कारण भारतवर्ष वसुधैव कुटुबंकम एवं सर्वे भवन्तु सुखिनः का आदर्श दे पाया। भारतवर्ष की यह तस्वीर निस्संदेह विचारों की हत्या अथवा विचारों के दमन से नहीं बनी है। इस तस्वीर को गढ़ने में दिमाग के खुलेपन एवं वैचारिक क्रांति की आवश्यकता पड़ी थी। इसलिए कहना पड़ता है कि हम विचारों के दमन एवं हत्या कर किस प्रकार विश्वगुरु भारतवर्ष का निर्माण कर पाएंगे। अतः आइये आज हम विचारों के प्रदूषण एवं विचारों की स्वतंत्रता समझ ही लेते हैं। 
(Today I have come wearing a helmet. Because in the political scenario of India, anything can happen. Kunal Kamra's fault is that the poor studio got broken, he does not even know why he was used. If the studio owner was angry then what is his fault, it is his business. Therefore, today every Indian should go out only after making arrangements for his safety. I have not come here to support or oppose Kunal Kamra. I have come to create that great picture of India, due to which India was able to give the ideal of Vasudhaiva Kutumbakam and Sarve Bhavantu Sukhinah. This picture of India is undoubtedly not created by the killing of ideas or suppression of ideas. Openness of mind and ideological revolution was required to create this picture. Therefore, it has to be said that how will we be able to create Vishwaguru Bharatvarsh by suppressing and killing ideas. So let us understand today the pollution of ideas and freedom of ideas.) 

वैचारिक स्वतंत्रता मनुष्य का आभूषण है जबकि वैचारिक प्रदुषण मनुष्यत्व की ग्लानि है। अतः भारतवर्ष को अपने संविधान के अनुच्छेद 19(१) ए में वर्णित वैचारिक स्वतंत्रता को स्पष्ट परिभाषित करने की आवश्यकता है। इसके बिना वैचारिक स्वतंत्रता एवं वैचारिक प्रदुषण के बीच स्थित भेद रेखा को समझना दुष्कर है। मनुष्य को अपने महान विचार के आधार पर अपना संसार बनाने के स्वतंत्रता है लेकिन किस के विचारों के संसार को गिराने अथवा खंडित करने वाले विचारों के आधार पर मनुष्य द्वारा खड़ा किया गया संसार अवश्य ही विचारों की महानता का परिचय नहीं है। इसलिए प्रथम कार्य वैचारिक स्वतंत्रता है तथा द्वितीय कार्य वैचारिक प्रदुषण है। हमें संकीर्णता तथा विध्वंसक की ओर ले जाने वाले विचारों को प्रकट करना वैचारिक प्रदुषण का अंग है। जबकि सर्वांगीणता तथा सृजन की ओर ले जाने वाले विचार वैचारिक स्वतंत्रता है। अतः वैचारिक स्वतंत्रता की एक सीमा रेखा अवश्य खिंची जानी चाहिए। 
(Freedom of thought is the ornament of man, while ideological pollution is the disgrace of manhood. Therefore, India needs to clearly define the freedom of thought mentioned in Article 19(1)A of its Constitution. Without this, it is difficult to understand the line of distinction between freedom of thought and ideological pollution. Man has the freedom to create his world on the basis of his great ideas, but the world created by man on the basis of ideas that destroy or break someone else's world is certainly not an introduction to the greatness of ideas. Therefore, the first task is freedom of thought and the second task is ideological pollution. Revealing the thoughts that lead us towards narrow-mindedness and destruction is a part of ideological pollution. Whereas the thoughts that lead us towards comprehensiveness and creation are ideological freedom. Therefore, a boundary line of ideological freedom must be drawn.) 

किसी को गाली देना, अभद्र भाषा से संबोधित करना तथा अमर्यादित शब्दावली का प्रचलन करना इत्यादि, वैचारिक अभिव्यक्ति के नाम कदापि वैचारिक स्वतंत्रता का अंग नहीं माना जा सकता है, लेकिन किसी के विचारों का विरोध करना, आलोचना करना तथा समालोचना प्रस्तुत करना इत्यादि कदापि वैचारिक प्रदुषण का अंग नहीं बताया जा सकता है। किसी विचारधारा के पक्ष में तथा विरोध में भाषण देना, आंदोलन चलाना अथवा जनमत निर्माण करना वैचारिक स्वतंत्रता का आवश्यक अंग है लेकिन यह कार्य तब वैचारिक प्रदुषण का अंग बन जाता है, जब महान विचारों को अपने संकीर्ण मानसिकता के तले अवैध पद्धति, छल, कपट अथवा बल प्रयोग के द्वारा कुचल दिया जाता है। अतः भारतवर्ष में संवाद की भूमि अवश्य बनानी चाहिए लेकिन ऐसा वाद तैयार नहीं करना चाहिए जिस पर होने वाला विवाद वैमनस्य तैयार कर दे तथा उसमें भारतवर्ष के महान संस्कार ही दम तोड़ दे।
( Abusing someone, addressing them in indecent language and using indecent language etc., in the name of ideological expression can never be considered a part of ideological freedom, but opposing someone's ideas, criticizing them and presenting critiques etc. can never be considered a part of ideological pollution. Giving speeches in favor or against an ideology, running a movement or creating public opinion is an essential part of ideological freedom, but this work becomes a part of ideological pollution when great ideas are crushed under narrow mindset through illegal methods, deceit, fraud or use of force. Therefore, a ground for dialogue must be created in India, but such a debate should not be prepared on which the debate creates animosity and the great values ​​of India die in it.) 

भारतवर्ष की सभ्यता एवं संस्कृति तथा शास्त्र एवं संस्कार वैचारिक स्वतंत्रता के बल पर अपने को महानता के शिखर पर स्थापित किया था लेकिन वह तब महानता के शिखर से गिरकर गर्त की ओर भी गया था, जब उसने मानव-मानव में भेद करने वाले लकीर खिंची थी। किसी को जन्म, लिंग, रंग एवं पेश के आधार हीन मानकर उसका तिरिस्कार किया था अथवा उसका रक्त शोषण किया था। अतः निस्संदेह कहा जा सकता है कि जाति भेदभाव, साम्प्रदायिक द्वेष, रंगभेद, लैंगिक असमानता एवं क्षेत्रवाद की सोच वैचारिक स्वतंत्रता नहीं वैचारिक प्रदुषण है। आतंकवाद, उग्रवाद तथा निरीह जनता को गोलियों से रोंदना इत्यादि वैचारिक स्वतंत्रता नहीं अपितु वैचारिक प्रदुषण है। इससे सृष्ट मनुष्य अवश्य ही समाज के लिए खतरनाक है। अतः वैचारिक स्वतंत्रता की दीवार को सर्वजन हितार्थ, सर्वजन सुखार्थ खड़ा करना चाहिए। जब कभी बहुसंख्यक अल्पसंख्यक, अधिकारवान एवं अधिकारहीन का भाव सृजित होगा तब समाज में एक दूसरे के प्रति विद्वेष सृष्टि होता है। वैचारिक प्रदुषण की ओर लेकर चलती है। अतः बहुजन सुखार्थ, बहुजन हितार्थ धारणा भी समाज में वैचारिक प्रदुषण की ही खाई खोदतती है। अतः समाज को सबके हित में तथा सबके सुख की ओर ले जाना चाहिए। 
(The civilization and culture of India, its scriptures and sanskars established themselves at the peak of greatness on the strength of ideological freedom, but it fell from the peak of greatness to the abyss when it drew a line of discrimination between humans. Considering someone as inferior on the basis of birth, sex, colour and profession, he was despised or exploited. Therefore, it can be said without any doubt that caste discrimination, communal hatred, apartheid, gender inequality and regionalism are not ideological freedom but ideological pollution. Terrorism, extremism and shooting innocent people with bullets etc. are not ideological freedom but ideological pollution. The man created by this is definitely dangerous for the society. Therefore, the wall of ideological freedom should be built for the benefit of all, for the happiness of all. Whenever the feeling of majority and minority, the powerful and the powerless is created, then hatred towards each other is created in the society. It leads to ideological pollution. Therefore, the concept of 'for the welfare of all' also digs a trench of ideological pollution in the society. Therefore, the society should be taken towards the welfare of all and happiness of all.) 

वैचारिक प्रदुषण एवं वैचारिक स्वतंत्रता के विचार को राजनीति के अखाड़े में उतारता हूँ। जिसके लिए हेलमेट लगाकर आया हूँ। भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, भाई भतीजावाद, पद लोलुपता, जोड़तोड़ की राजनीति, तानाशाही, सरकारी एजेन्सियों का दुरूपयोग, वैचारिक दमन, सरकारी धन का दुरूपयोग, राजनैतिक द्वेष को निकालने के गलत रास्ता का उपयोग करना, राजनीति में जातिवाद, साम्प्रदायिकता का उपयोग करना इत्यादि वैचारिक स्वतंत्रता का नहीं वैचारिक प्रदुषण का ज्वलंत उदाहरण है। वस्तुतः अधिकांश वैचारिक प्रदुषण का जन्म यही से होता है। अतः वैचारिक स्वतंत्रता के नाम सरकार बनाने के लिए विधायकों, सांसदों एवं जनप्रतिनिधियों की बाड़ा बंदी अवश्य वैचारिक दिवालियेपन की निशानी है। जो वैचारिक प्रदुषण का अंग है। यह सब महान देश का निर्माण कदापि नहीं कर सकते हैं। अतः राजनैतिक गंद को दूर कर लोकतांत्रिक मूल्यों की ओर देश को ले जाना वैचारिक स्वतंत्रता का प्रतीक है। 

(I bring the idea of ​​ideological pollution and ideological freedom into the arena of politics. For which I have come wearing a helmet. Corruption, bribery, nepotism, greed for power, politics of manipulation, dictatorship, misuse of government agencies, ideological suppression, misuse of government money, using wrong means to vent political hatred, using casteism, communalism in politics etc. are not examples of ideological freedom but of ideological pollution. In fact, most of the ideological pollution is born from here. Therefore, the confinement of MLAs, MPs and public representatives to form a government in the name of ideological freedom is definitely a sign of ideological bankruptcy. Which is a part of ideological pollution. All these can never build a great country. Therefore, removing political filth and taking the country towards democratic values ​​is a symbol of ideological freedom.) 

हास्य विनोद में किसी मिमक्री करना, गंदा मजाक उडाना, अश्लील मजाक करना, मर्यादा रहित व्यंग्य करना अथवा हास्य विनोद के लिए किसी मर्यादा भंग करना अवश्य ही वैचारिक प्रदुषण है लेकिन सत्य बात का आदर्शमय, मर्यादित भाषा में तथा निस्पक्ष सत्य को अच्छी भाषा में प्रस्तुत करना एक वैचारिक स्वतंत्रता है। धोखा को धोखा कहना तथा गलत को गलत कहना वैचारिक प्रदुषण नहीं है, जब तक समष्टि की महान कृति भंग नहीं हो, जब किसी के शब्द से समष्टि कृति पर कुठाराघात होता है तो अवश्य ही अपनी वैचारिक स्वतंत्रता को परिभाषित करने की आवश्यकता है। लोकतंत्र को वैचारिक मतभेद की ओर स्वतंत्रता देता है लेकिन वह कदापि वैचारिक द्वेष को फैलाने की अनुमति नहीं है। 

(Mimicking someone in the name of humour, making dirty jokes, vulgar jokes, making indecorous satires or crossing any limit for the sake of humour is certainly ideological pollution but presenting the truth in ideal, decent language and presenting the unbiased truth in good language is ideological freedom. Calling a deception a deception and wrong a wrong is not ideological pollution till the great work of the society is not destroyed. When someone's words attack the work of the society then there is certainly a need to define one's ideological freedom. Democracy gives freedom towards ideological differences but it never allows the spreading of ideological hatred.) 

विषय के अन्त में इस आलेख की भूमिका पर बंधन को स्पष्ट करते हुए लिखना चाहूँगा कि मैं न तो कुणाल कामरा का समर्थक हूँ तथा नहीं विरोधी हूँ। लेकिन उसकी भाषा अवश्य ही आपत्तिजनक थी लेकिन तथ्य निस्संदेह यथार्थ से दूर नहीं है। उसकी प्रतिक्रिया में जो कुछ हुआ, वह किसी भी दृष्टिकोण से प्रशंसनीय नहीं है। हिंसात्मक एवं तोडफोड की कार्यवाही संविधान, लोकतंत्र एवं राष्ट्र के हित में नहीं है। इसलिए इसका समर्थन कदापि नहीं किया जा सकता तथा राष्ट्र एवं समाज हित में तथा न्याय के दृष्टिकोण से उसकी निंदा तथा भर्त्सना की जानी आवश्यक है। इससे हम अपने नेता को कमजोर बनाने है तथा विरोधी को ख्याति दिलाते हैं। अतः कुछ भी अनुचित लगे तो संवैधानिक उपायों के माध्यम से अपना विरोध दर्ज करना चाहिए। 
(At the end of the topic, I would like to clarify the obligation of this article and write that I am neither a supporter nor an opponent of Kunal Kamra. But his language was definitely objectionable but the facts are undoubtedly not far from reality. Whatever happened in response to that is not praiseworthy from any point of view. Violent and vandalistic actions are not in the interest of the constitution, democracy and the nation. Therefore, this cannot be supported at all and it is necessary to condemn and denounce it in the interest of the nation and society and from the point of view of justice. By doing this, we weaken our leader and give fame to the opponent. Therefore, if anything seems inappropriate, one should register one's protest through constitutional measures.) 

धन्यवाद
(Thanks)

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