(संचर धारा का ज्ञान)
अष्टम् सूत्र
१/८ गुणबन्धनेन गुणाभिव्यक्तिः ।
भावार्थ :- गुण का अर्थ बांधने की रस्सी है। जिस वस्तु पर जितना ही दृढ़ बंधन है, वह वस्तु उतना ही स्थूलत्वप्राप्ति करती चलती है। पुरुष-प्रदत्त स्वाधीनता से प्रकृति जब पुरुष को बाँधती है तब क्रमवर्द्धमान गुणबन्धन से चेतन पुरुष महत्तत्त्व, अहंतत्त्व, चित्त आदि में रूपान्तरित होता रहता है और इसके बाद चैत्तिक सत्ता पर अधिकतर तमोगुण के बन्धन के कारण आकाशतत्त्व का उद्भव होता है, ततोऽधिक बन्धन से मरुत्तत्त्व का, ततोऽधिक बन्धन से अग्नितत्त्व का, ततोऽधिक बन्धन से जलतत्त्व का, तथा ततोऽधिक बन्धन से क्षितितत्त्व का उद्भव होता है। इस क्षितितत्त्व में भी बन्धन का मात्राभेद है। बन्धन की दृढ़ता से भूतदेह में आन्तराणविक तथा आन्तर्पारमाणविक दूरत्व ह्रास होता रहता है। तथा इसके फलस्वरूप जड़देह में आभ्यन्तरीण संघर्ष बढ़ जाता है । बाह्यिक गुणबन्धन के चाप तथा आभ्यन्तरीण संघर्ष वस्तुदेह में अधिक से अधिक गुणाभिव्यक्ति कराता है। इस क्षेत्र में स्मरणीय है कि गुणाभिव्यक्ति का अर्थ गुणसामर्थ्य का आधिक्य नहीं, बल्कि गुणप्रकाश का आधिक्य तथा गुणवैचित्र्य का आधिक्य है। आकाशतत्त्व में शब्द वहन करने की क्षमता है। यदि मान लें कि उसका परिमाप १०० है तो उस क्षेत्र में अधिकतर तमोगुण के बन्धन के कारण आकाशतत्त्व ज्यों ही वायुतत्त्व में रूपान्तरित होता है, त्यों ही उसमें शब्द वहन के गुण के साथ ही साथ स्पर्श गुण भी अभिव्यक्त हो पड़ता है। किन्तु गुणसामर्थ्य की वृद्धि होने का कारण वायुतत्त्व में शब्दवहन का गुण आकाशतत्त्व की बनिस्बत (तुलना में) कम हो जाता है, किन्तु शब्दगुण और स्पर्शगुण का मिलित परिमाप १०० ही रह जाता है।
सूत्र का विश्लेषण
१. पदच्छेद (Word Segmentation)
इस सूत्र में दो मुख्य पद निहित हैं:
गुणबन्धनेन (Guṇabandhanena)
गुणाभिव्यक्तिः (Guṇābhivyaktiḥ)
२. विस्तृत व्याकरणिक विश्लेषण (Detailed Grammatical Analysis)
पद १: गुणबन्धनेन
प्रातिपदिक (मूल शब्द): गुणबन्धन (नपुंसकलिङ्ग)
समास विश्लेषण:
यह पद 'गुण' और 'बन्धन' के योग से बना है।
विग्रह: गुणैः बन्धनम् इति गुणबन्धनम् (तृतीया तत्पुरुष समास - गुणों के द्वारा बन्धन) अथवा गुणानां बन्धनम् इति गुणबन्धनम् (षष्ठी तत्पुरुष समास - गुणों का बन्धन)। दार्शनिक संदर्भ में यह त्रिगुणात्मक (सत्त्व, रज, तम) पाश को इंगित करता है।
प्रकृति-प्रत्यय (व्युत्पत्ति):
गुण: गुण् (आमन्त्रणे/संवरणे धातु) + अच् (प्रत्यय)।
बन्धन: बन्ध् (बन्धने धातु) + ल्युट् (अन्) प्रत्यय।
विभक्ति एवं वचन: तृतीया विभक्ति, एकवचन (नपुंसकलिङ्ग 'फल' शब्द के 'फलेन' की भाँति)।
व्याकरणगत अर्थ: गुणों के बन्धन के कारण या गुणों के बन्धन के द्वारा (यहाँ तृतीया विभक्ति 'हेतु' या 'करण' कारक के अर्थ में प्रयुक्त हुई है, जो कार्य के कारण को दर्शाती है)।
पद २: गुणाभिव्यक्तिः
प्रातिपदिक (मूल शब्द): गुणाभिव्यक्ति (स्त्रीलिङ्ग)
सन्धि विश्लेषण:
गुण + अभिव्यक्तिः = गुणाभिव्यक्तिः
सन्धि सूत्र: 'अकः सवर्णे दीर्घः' नियमानुसार 'गुण' शब्द के अन्त के 'अ' तथा 'अभिव्यक्ति' के प्रारम्भिक 'अ' के मेल से 'आ' आदेश हुआ है। अतः यहाँ दीर्घ स्वर सन्धि है।
समास विश्लेषण:
विग्रह: गुणानाम् अभिव्यक्तिः इति गुणाभिव्यक्तिः (षष्ठी तत्पुरुष समास)। अर्थात गुणों का प्रकट होना या गुणों की अभिव्यक्ति।
प्रकृति-प्रत्यय (व्युत्पत्ति):
अभिव्यक्ति: अभि (उपसर्ग) + वि (उपसर्ग) + अञ्ज् (व्यक्तिम्रक्षणयोः धातु - प्रकट करना/व्यक्त करना) + क्तिन् (स्त्रीलिङ्ग में भाववाचक संज्ञा बनाने के लिए प्रयुक्त प्रत्यय)। क्तिन् प्रत्यय का 'ति' शेष रहता है।
विभक्ति एवं वचन: प्रथमा विभक्ति, एकवचन (इकारान्त स्त्रीलिङ्ग 'मति' या 'बुद्धि' शब्द की भाँति इसके रूप चलते हैं— जैसे 'मतिः' वैसे ही 'गुणाभिव्यक्तिः')।
व्याकरणगत अर्थ: गुणों का प्राकट्य, गुणों की विशिष्ट अभिव्यक्ति या विभिन्न रूपों में दृश्यमान होना।
३. व्याकरणिक शब्दार्थ सारणी (Quick Reference Table)
1
क्र.सं. | पद (Word) | मूल घटक (प्रकृति/धातु/उपसर्ग/प्रत्यय) | विभक्ति और वचन | व्याकरणगत तात्त्विक अर्थ |
१ | गुणबन्धनेन | गुण + बन्ध् + ल्युट् (तृतीया तत्पुरुष) | तृतीया विभक्ति, एकवचन | त्रिगुणात्मक पाश (बन्धन) के प्रभाव या माध्यम से |
२ | गुणाभिव्यक्तिः | गुण + अभि + वि + अञ्ज् + क्तिन् (दीर्घ सन्धि व षष्ठी तत्पुरुष) | प्रथमा विभक्ति, एकवचन | गुणों का दृश्यमान होना या विशिष्ट वैचित्र्य के साथ प्रकट होना |
४. कारकीय अन्वय एवं भाषिक निष्कर्ष
वाक्यगत अन्वय (Syntactic Relation): गुणबन्धनेन (हेतु/कारण) गुणाभिव्यक्तिः (कर्ता/परिणाम) [भवति]।
भाषिक निष्कर्ष: व्याकरणिक दृष्टि से यह सूत्र पूर्णतः कार्य-कारण सिद्धान्त पर आधारित संरचना है। यहाँ तृतीया विभक्ति (गुणबन्धनेन) क्रिया या अवस्था के 'हेतु' (cause) को प्रतिपादित करती है, और उसी हेतु के अधीन जो परिणाम स्वतः सिद्ध होता है, उसे प्रथमा विभक्ति (गुणाभिव्यक्तिः) के रूप में मुख्य कर्ता या संज्ञा भाव बनाकर प्रस्तुत किया गया है।
जैसे-जैसे प्रकृति के गुणों का पाश या बन्धन किसी सत्ता पर कड़ा होता जाता है, वैसे-वैसे उसमें नए-नए गुणों और विशेषताओं का प्राकट्य होने लगता है।
भावार्थ का विश्लेषण
प्रस्तावना (Introduction)
आनन्दसूत्रम् के प्रथम अध्याय का अष्टम सूत्र "गुणबन्धनेन गुणाभिव्यक्तिः" सृष्टि-विज्ञान (Cosmology) और ब्रह्मविज्ञान का एक अत्यंत केंद्रीय और क्रांतिकारी सूत्र है। यह सूत्र 'संचरण' (Saincara) की उस प्रक्रिया को व्याख्यायित करता है, जहाँ निराकार, निर्गुण और असीम चैतन्य सत्ता (परम पुरुष), प्रकृति के त्रिगुणात्मक पाश में बँधकर क्रमिक रूप से स्थूल जगत (Macrocosm) के रूप में रूपांतरित होती है। यह दर्शन केवल आध्यात्मिक नहीं है, बल्कि इसके भीतर भौतिकी (Physics) और चेतना-विज्ञान (Science of Consciousness) का अनूठा समन्वय है।
१. 'गुण' की दार्शनिक परिभाषा: बन्धन की रस्सी
आनन्द मार्ग दर्शन के अनुसार, 'गुण' शब्द का मूल अर्थ "बांधने की रस्सी" है।
पुरुष और प्रकृति का संबंध: परम शिव या पुरुष मूलतः पूर्णतः स्वतंत्र हैं। वे अपनी इच्छा से क्रियात्मिका शक्ति (प्रकृति) को अभिव्यक्ति की स्वाधीनता देते हैं।
पाश का क्रमिक कसना: जब प्रकृति पुरुष को बाँधना शुरू करती है, तो वह तीन रस्सियों का उपयोग करती है— सत्त्वगुण (Sentient), रजोगुण (Mutative), और तमोगुण (Static)।
स्थूलता का नियम: इस त्रिगुणात्मक पाश का बन्धन जिस सत्ता पर जितना अधिक दृढ़ (tight) होता जाता है, वह सत्ता उतनी ही अपनी सूक्ष्मता खोकर स्थूलत्व (Crudification) को प्राप्त होती जाती है।
२. चैत्तिक सत्ता से पंचमहाभूतों का उद्भव (Cosmic Mind to Physical Factors)
गुणों के क्रमिक वर्द्धमान बन्धन (Progressive Bondage) के कारण चेतना का रूपांतरण निम्नलिखित चरणों में होता है:
अ. मानसिक स्तर पर रूपांतरण (Evolution of Cosmic Mind)
महत्तत्त्व (Cosmic 'I' feeling): जहाँ सत्त्वगुण का प्रभाव प्रधान होता है और चेतना को अपनी सत्ता का बोध होता है।
अहंतत्त्व (Cosmic Ego / Doer 'I'): यहाँ रजोगुण के प्रभाव से क्रियाशीलता आती है और "मैं करता हूँ" का भाव जाग्रत होता है।
चित्त (Cosmic Objective Mind): यहाँ तमोगुण के प्रभाव से मानसिक धरातल पर स्थूलता का संचय होता है, जो वस्तु-आकार ग्रहण करने के योग्य बनता है।
ब. भौतिक स्तर पर रूपांतरण (Evolution of Panchabhutas)
जब इस चैत्तिक सत्ता (चित्त) पर तमोगुण (Static Principle) का बन्धन अपनी पराकाष्ठा की ओर बढ़ता है, तब पंचभौतिक जगत का क्रमिक विकास होता है:
आकाशतत्त्व (Ethereal Factor): तमोगुण के प्रथम तीव्र बन्धन से अंतरिक्ष या शून्य का प्राकट्य होता है।
मरुत्तत्त्व (Aerial Factor): बन्धन और अधिक कड़ा होने पर वायुतत्त्व बनता है।
अग्नितत्त्व (Luminous Factor): और अधिक घनीभूत बन्धन से ऊर्जा और प्रकाश (अग्नि) का जन्म होता है।
जलतत्त्व (Liquid Factor): बन्धन की सघनता बढ़ने पर तरल या जलतत्त्व का प्राकट्य होता है।
क्षितितत्त्व (Solid Factor): जब तमोगुण का बन्धन अपने उच्चतम शिखर पर पहुँच जाता है, तब ठोस पृथ्वी या क्षितितत्त्व का उद्भव होता है। यहाँ आकर 'संचरण' की गति अपनी अंतिम सीमा (Crude physical state) को छू लेती है।
३. गुणाभिव्यक्ति का वैज्ञानिक सिद्धांत (Internal Clash & External Pressure)
इस सूत्र का सबसे गहन वैज्ञानिक पक्ष यह है कि स्थूलता बढ़ने के साथ-साथ तत्वों के भीतर आंतरिक संरचना में क्या परिवर्तन आता है।
[बाह्यिक गुणबन्धन का चाप (External Pressure)]
↓
[आन्तराणविक एवं आन्तर्पारमाणविक दूरी में ह्रास]
↓
[आभ्यन्तरीण संघर्ष में वृद्धि (Internal Clash)]
↓
[नवीन गुणों का प्राकट्य (गुणाभिव्यक्ति)]
दूरी का ह्रास: जैसे-जैसे प्रकृति का बाह्यिक चाप (External Pressure) बढ़ता है, वैसे-वैसे भूतदेह (Matter) के भीतर आन्तराणविक (Inter-molecular) तथा आन्तर्पारमाणविक (Inter-atomic) दूरी घटने लगती है। अणु और परमाणु एक-दूसरे के अत्यंत निकट आने लगते हैं।
आभ्यन्तरीण संघर्ष (Internal Clash): स्थान कम होने और दबाव अधिक होने के कारण जड़ पिंड के भीतर अणुओं का आंतरिक संघर्ष अत्यधिक बढ़ जाता है।
परिणाम: यह बाह्य दबाव और आंतरिक संघर्ष मिलकर वस्तुदेह में अधिक से अधिक गुणाभिव्यक्ति कराते हैं। अर्थात, जितना अधिक दबाव होगा, वस्तु के छिपे हुए गुण उतने ही प्रखर होकर बाहर प्रकट होंगे।
४. गुणाभिव्यक्ति की दार्शनिक मीमांसा: 'क्षमता' बनाम 'वैचित्र्य'
श्री प्रभात रंजन सरकार (श्री श्री आनंदमूर्ति जी) ने यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म और महत्वपूर्ण भेद स्पष्ट किया है:
"गुणाभिव्यक्ति का अर्थ गुणसामर्थ्य का आधिक्य नहीं, बल्कि गुणप्रकाश का आधिक्य तथा गुणवैचित्र्य का आधिक्य है।"
इसे ऊर्जा के संरक्षण के नियम (Law of Conservation of Energy) की भाँति समझा जा सकता है। समष्टिगत रूप से कुल सामर्थ्य (Total Potential) हमेशा अपरिवर्तित रहता है, लेकिन उसका प्रकटीकरण और विविधता (Diversity) बदल जाती है।
परिमाप १०० का सिद्धांत (The Principle of Metric 100)
यदि हम किसी तत्त्व की कुल गुण-क्षमता का परिमाप १०० मान लें, तो विकासक्रम इस प्रकार चलता है:
आकाशतत्त्व (Ethereal): इसमें केवल एक ही गुण व्यक्त है— शब्द (Sound)। यहाँ अकेले शब्द गुण का परिमाप पूर्ण १०० है।
वायुतत्त्व (Aerial): जब आकाशतत्त्व पर तमोगुण का बन्धन बढ़ता है और वह वायु में बदलता है, तब उसमें शब्द के साथ स्पर्श (Touch) गुण भी प्रकट हो जाता है। अब यहाँ गुणवैचित्र्य (Diversity) बढ़ गया। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि कुल सामर्थ्य १०० से बढ़कर २०० हो गया। बल्कि, अब शब्द का परिमाप घटकर (माना ६०) हो गया और शेष (४०) स्पर्श गुण के रूप में अभिव्यक्त हुआ। दोनों का कुल योग (६० + ४०) अभी भी १०० ही रहता है।
इस प्रकार, जैसे-जैसे हम आकाश से क्षितितत्त्व की ओर बढ़ते हैं, गुणों की संख्या (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) बढ़ती जाती है, जिससे सृष्टि में वैचित्र्य और सौंदर्य का विकास होता है, यद्यपि मूल गुणात्मक ऊर्जा का कुल परिमाप समष्टि रूप में स्थिर रहता है।
पंचमहाभूतों में परिमाप १०० का वितरण (Distribution Table)
नीचे दी गई सारणी से स्पष्ट होता है कि जैसे-जैसे प्रकृति का बन्धन बढ़ता है, कुल १०० इकाइयों का विभाजन किस प्रकार होता है (यहाँ दिए गए अंक सिद्धांत को समझने के लिए एक आनुपातिक उदाहरण हैं):
महाभूत (Element) | अभिव्यक्त गुण (Manifested Qualities) | गुणों का आंतरिक परिमाप विभाजन (Individual Share) | कुल परिमाप (Total Metric) |
१. आकाशतत्त्व (Ethereal) | केवल शब्द | शब्द = १०० | १०० |
२. वायुतत्त्व (Aerial) | शब्द + स्पर्श | शब्द = ७०, स्पर्श = ३० | १०० |
३. अग्नितत्त्व (Luminous) | शब्द + स्पर्श + रूप | शब्द = ५०, स्पर्श = ३०, रूप = २० | १०० |
४. जलतत्त्व (Liquid) | शब्द + स्पर्श + रूप + रस | शब्द = ४०, स्पर्श = २५, रूप = २०, रस = १५ | १०० |
५. क्षितितत्त्व (Solid) | शब्द + स्पर्श + रूप + रस + गन्ध | शब्द = ३०, स्पर्श = २५, रूप = २०, रस = १५, गन्ध = १० | १०० |
निष्कर्ष (Conclusion)
"गुणबन्धनेन गुणाभिव्यक्तिः" हमें यह दृष्टि देता है कि सृष्टि में जिसे हम 'बन्धन' या 'दबाव' कहते हैं, वह वास्तव में अभिव्यक्ति का माध्यम है। संचरण की प्रक्रिया में यह बन्धन चेतना को पदार्थ (Matter) बनाता है, और यही आंतरिक संघर्ष जब पदार्थ के भीतर अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है, तो अणु-परमाणुओं के टूटने से पुनः जीवन (Life) और मन (Mind) का प्रकटीकरण होता है, जिसे 'प्रतिसंचरण' (Pratisaincara) कहा जाता है। अतः, प्रकृति का हर बन्धन परम पुरुष के ही एक नए रूप को अभिव्यक्त करने की ब्रह्माण्डीय योजना का हिस्सा है।
इस गहन दार्शनिक व वैज्ञानिक विवेचन के प्रकाश में, क्या आप इस सूत्र का 'प्रतिसंचरण' (Pratisaincara यानी पदार्थ से पुनः चेतना की ओर वापसी) के संदर्भ में इसके आगे का विश्लेषण और आध्यात्मिक महत्व भी समझना चाहेंगे?
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