​१/७ दृक् पुरुषः दर्शनं शक्तिश्च । (AS-1/7)

(ब्रह्म तत्व का ज्ञान)

सप्तम सूत्र

​१/७ दृक् पुरुषः दर्शनं शक्तिश्च ।


भावार्थ :- क्रियाभाव दर्शन है, साक्षीभाव दृक् है । दृक् के अनस्तित्व में दर्शन असिद्ध रहता है। मनन, वचन, चरण, ग्रहण- ये सभी क्रियाभाव हैं। इन क्रियाभावों का अस्तित्व जिस साक्षित्व से निष्पन्न होता है, वह दृक् भाव ही पुरुष है, और उसके आश्रय में जिस क्रियाभाव की अभिव्यक्ति होती है वही प्राकृत गुणसम्पन्न है। जड़तरङ्ग के व्यक्तीकरण को यदि क्रियाभाव कहें तो

​(पृष्ठ २०)

​उस दिशा में उसके आपातसाक्षी को चैत्तिक सत्ता कहना होगा। चैत्तिक स्फूरण को यदि क्रियाभाव कहें तो उसके आपात साक्षी को अहंतत्त्व (ego) कहेंगे। अहं के विकास को यदि क्रियाभाव कहें, तो उसका आपात साक्षी महत्तत्त्व है। "मैं हूँ" -के अस्तित्वबोध को या महत्तत्त्व को यदि क्रियाभाव कहें तो उसके साक्षी भाव अर्थात् "मैं जानता हूँ कि मैं हूँ"-यह भाव ही चरम साक्षी रूप में ग्रहणीय है। यह जो "मैं जानता हूँ" है यह किसी का आपात साक्षी नहीं है। सर्वावस्था में सभी वस्तुओं का परम साक्षी है। अतः विशुष्क विचार से यह भाव ही दृक् पर्यायभुक्त है। यह ही पुरुष का विषययुक्त स्व-भाव (attributed consciousness) है।




सूत्र का विश्लेषण

​१. मूल सूत्र एवं पाठ

  • ​संस्कृत सूत्र: दृक् पुरुषः दर्शनं शक्तिश्च ।

  • ​रोमन लिप्यन्तरण: [ Dṛk puruṣaḥ darśanam śaktiśca. ]

  • ​पदच्छेद (शब्द विच्छेद): दृक् / पुरुषः / दर्शनम् / शक्तिः / च

​२. सन्धि विश्लेषण

  • ​पद: शक्तिश्च

  • ​सन्धि विच्छेद: शक्तिः + च

  • ​सन्धि का प्रकार: विसर्ग सन्धि (सत्व-विधान)

  • ​व्याकरण नियम: पाणिनीय सूत्र 'विसर्जनीयस्य सः' तथा 'स्तोः श्चुना श्चुः' के अनुसार विसर्ग (ः) के बाद 'च' आने पर विसर्ग पहले 'स्' में और फिर श्चुत्व सन्धि के कारण 'श्' (शकार) में परिवर्तित हो जाता है। (शक्तिः + च = शक्तिश्च)।

​३. सम्पूर्ण व्याकरणगत शब्दार्थ एवं पद-परिचय

​इस सूत्र में कुल पाँच पद हैं। प्रत्येक पद का विस्तृत व्याकरणिक परिचय निम्नलिखित है:

​(१) दृक्

  • ​धातु (मूल प्रकृति): 'दृश्' (प्रेक्षणे - देखना) धातु।

  • ​प्रत्यय: 'क्विप्' प्रत्यय (कर्त्ता अर्थ में)।

  • ​व्युत्पत्ति/प्रक्रिया: 'दृश्' धातु से 'क्विप्' प्रत्यय होने पर सर्वापहारी लोप होता है। पाणिनीय सूत्र 'क्विन्प्रत्ययस्य कुः' से धातु के अन्तिम शकार (श्) को ककार (क्) आदेश होता है, जिससे 'दृक्' प्रातिपदिक बनता है।

  • ​विभक्ति, वचन एवं लिङ्ग: प्रथमा विभक्ति, एकवचन, (यहाँ यह पुरुषः का विशेषण या संज्ञा रूप में प्रयुक्त है, मूलतः हलन्त पुंल्लिङ्ग/स्त्रीलिङ्ग/नपुंसकलिङ्ग में प्रथमा एकवचन में 'दृक्' या 'दृग्' रूप बनता है)।

  • ​शब्दार्थ: द्रष्टा, साक्षी सत्ता, देखने वाला (The Seer / Witnessing Faculty)।

​(२) पुरुषः

  • ​प्रातिपदिक (मूल शब्द): पुरुष (अकारान्त पुंल्लिङ्ग)

  • ​व्युत्पत्ति: 'पुरि शेते इति पुरुषः' (जो पुर अर्थात् शरीर या ब्रह्मांड रूपी नगरी में शयन/निवास करता है)। व्याकरणिक दृष्टि से 'पुर्' अथवा 'पृ' धातु से 'कुषन्' प्रत्यय लगाने पर 'पुरुष' शब्द सिद्ध होता है।

  • ​विभक्ति, वचन एवं लिङ्ग: पुंल्लिङ्ग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन।

  • ​शब्दार्थ: परम चैतन्य, आत्मा, सर्वव्यापी साक्षी पुरुष (Consciousness)।

​(३) दर्शनम्

  • ​धातु (मूल प्रकृति): 'दृश्' (देखना) धातु।

  • ​प्रत्यय: 'ल्युट्' प्रत्यय (भाव अथवा करण अर्थ में)।

  • ​व्युत्पत्ति/प्रक्रिया: दृश् + ल्युट्। पाणिनीय सूत्र 'युवोरनाकौ' से 'ल्युट्' के 'यु' भाग को 'अन' (अन्) आदेश होता है। धातु के ऋकार को गुण (अर्) होने पर 'दर्शन' प्रातिपदिक बनता है।

  • ​विभक्ति, वचन एवं लिङ्ग: नपुंसकलिङ्ग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन।

  • ​शब्दार्थ: देखने की क्रिया, क्रियाभाव, अभिव्यक्ति का माध्यम, दृश्य जगत (The act of seeing / Manifestation)।

​(४) शक्तिः

  • ​धातु (मूल प्रकृति): 'शक्' (शक्तौ - समर्थ होना/सामर्थ्य रखना) धातु।

  • ​प्रत्यय: 'क्तिन्' प्रत्यय (भाव अर्थ में, स्त्रीलिङ्ग विधायक)।

  • ​व्युत्पत्ति/प्रक्रिया: शक् + क्तिन् = शक्ति। यहाँ 'क्तिन्' प्रत्यय लगने से शब्द नित्य स्त्रीलिङ्ग हो जाता है।

  • ​विभक्ति, वचन एवं लिङ्ग: इकारान्त स्त्रीलिङ्ग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन।

  • ​शब्दार्थ: सामर्थ्य, ऊर्जा, प्रकृत्यात्मक गुण, क्रियाशीलता (Operative Principle / Energy)।

​(५) च

  • ​पद का प्रकार: अव्यय (जिसका रूप तीनों लिङ्गों और सभी विभक्तियों में समान रहता है)।

  • ​अर्थ विधान: समुच्चयबोधक (Conjunction - 'और')। यहाँ यह 'दर्शनम्' और 'शक्तिः' के सह-अस्तित्व या उनके अभेदात्मक सम्बन्ध को जोड़ने के लिए प्रयुक्त हुआ है।

​४. अन्वय (Syntactic Order)

  • ​अन्वय: दृक् पुरुषः (अस्ति), दर्शनं च शक्तिः (अस्ति)।

  • ​शाब्दिक विन्यास: दृक् (साक्षी भाव) पुरुष है, और दर्शन (क्रियाभाव) शक्ति है।

​५. व्याकरणिक विशेष टिप्पणी

  1. ​समानाधिकरण्य: इस सूत्र में दो युग्म (Pairs) समानाधिकरण हैं:

    • ​'दृक्' और 'पुरुषः' दोनों प्रथमा विभक्ति एकवचन में हैं, जो दोनों की तादात्म्यता (Identity) को दर्शाते हैं।

    • ​'दर्शनम्' और 'शक्तिः' भी प्रथमा विभक्ति में हैं, जो क्रियाभाव और शक्ति की एकात्मकता को सूचित करते हैं।

  2. ​कृदन्त बहुलता: इस लघु सूत्र में तीन पद कृदन्त (धातु + प्रत्यय से बने) हैं: दृक् (क्विप्), दर्शनम् (ल्युट्), और शक्तिः (क्तिन्)। यह सूत्र की दार्शनिक संक्षिप्तता और व्याकरणिक शुद्धता को सुदृढ़ करता है।

​"जो शांत रहकर सब कुछ जान रहा है वह 'पुरुष' (चेतना) है, और जो कुछ भी प्रकट हो रहा है या काम कर रहा है वह 'शक्ति' (ऊर्जा) है।

भावार्थ का   विश्लेषण

​१. प्रस्तावना (Introduction)

​आनन्द सूत्रम् का यह सप्तम सूत्र सृष्टि विज्ञान (Cosmology) और चेतना विज्ञान (Science of Consciousness) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आधार स्तंभ है। यह सूत्र वस्तुतः 'पुरुष' (चेतना) और 'प्रकृति' (क्रियात्मक शक्ति) के पारस्परिक संबंध, उनकी निर्भरता और साक्षित्व (Witnessing) के क्रमिक विकास की सूक्ष्म व्याख्या करता है। इस अध्ययन पत्र में सूत्र के उस गंभीर दार्शनिक भावार्थ का विश्लेषण किया गया है, जो दृश्य जगत से लेकर परम चेतना तक के सफर को तार्किक रूप से सिद्ध करता है।

​२. क्रियाभाव और साक्षीभाव का मौलिक द्वैत

​भावार्थ की शुरुआत दो मूलभूत दार्शनिक संकल्पनाओं के वर्गीकरण से होती है:

  • ​क्रियाभाव (दर्शन): संसार में होने वाली प्रत्येक हलचल, तरंग, विचार, स्पंदन या कर्म 'क्रियाभाव' है। इसके अंतर्गत चार मुख्य स्तर आते हैं:

    • ​मनन: सोचने की मानसिक प्रक्रिया।

    • ​वचन: वाणी की अभिव्यक्ति।

    • ​चरण: गति या गमन (गतिशीलता)।

    • ​ग्रहण: किसी वस्तु या विचार को स्वीकार करना या धारण करना।

  • ​साक्षीभाव (दृक्): जो इन समस्त क्रियाओं से अछूता रहकर, बिना विचलित हुए इन्हें केवल प्रमाणित (Observe) करता है, वह 'साक्षीभाव' है।

​मूल सिद्धांत: "दृक् के अनस्तित्व में दर्शन असिद्ध रहता है।"

दार्शनिक विश्लेषण: इसका अर्थ यह है कि बिना किसी देखने वाले (Observer) के, किसी भी दृश्य (Observed) या क्रिया (Action) का अस्तित्व प्रमाणित नहीं किया जा सकता। यदि चेतना न हो, तो जड़ जगत की क्रियाओं का होना न होने के बराबर है।



​३. साक्षित्व का क्रमिक विकास (Hierarchical Levels of Witnessing)

​इस दर्शन की सबसे गहन विशेषता यह है कि यह साक्षित्व को एक झटके में अंतिम सत्य नहीं मानता, बल्कि यह समझाता है कि मन के अलग-अलग स्तरों पर साक्षित्व कैसे बदलता है। इसे 'आपात साक्षी' (Provisional/Relative Witness) कहा गया है।

​जब एक स्तर क्रियाभाव बनता है, तो उसका साक्षी उससे ऊपर का स्तर होता है। इस क्रमिक विकास को निम्नलिखित तालिका के माध्यम से समझा जा सकता है। 


क्रम

क्रियाभाव (Action Layer)

आपात साक्षी (Relative Witness)

दार्शनिक संज्ञा (Philosophical Reality)

जड़तरङ्ग (Physical Waves/Matter)

चैत्तिक सत्ता (Mental Entity)

स्थूल मन (Crude Mind) जो भौतिक जगत को अनुभव करता है।

चैत्तिक स्फूरण (Mental Vibrations)

अहंतत्त्व (Ego / 'I do' feeling)

अहंकार, जो मन के विचारों को अपना मानता है ("मैं सोच रहा हूँ")।

अहं का विकास (Evolution of Ego)

महत्तत्त्व (Pure 'I am' feeling)

बुद्धि/अस्तित्वबोध ("मैं हूँ" की शुद्ध अनुभूति)।

महत्तत्त्व ("मैं हूँ" का अस्तित्वबोध)

चरम साक्षी (Ultimate Witness)

'दृक्' या पुरुष ("मैं जानता हूँ कि मैं हूँ")।



४. चरम साक्षी (Ultimate Witness) की अवधारणा

​भावार्थ का सबसे सूक्ष्म हिस्सा "मैं हूँ" (महत्तत्त्व) और "मैं जानता हूँ कि मैं हूँ" (चरम साक्षी) के बीच का अंतर है।

  • ​अस्तित्वबोध बनाम परमज्ञान: "मैं हूँ" भी मन का एक अति सूक्ष्म स्पंदन (Vibration) है। चूँकि यह एक स्पंदन है, इसलिए यह भी 'क्रियाभाव' के अंतर्गत आता है।

  • ​अनापेक्षिक सत्ता: इस "मैं हूँ" के बोध को भी जो सत्ता जानती है—अर्थात् "मैं जानता हूँ कि मैं हूँ"—वही चरम साक्षी है।

  • ​यह चरम साक्षी किसी अन्य का 'आपात साक्षी' नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र, स्वयंभू और अपरिवर्तनीय है। यह सभी अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) में और ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं का परम साक्षी है।

​५. विशुष्क विचार और विषययुक्त स्व-भाव (Attributed Consciousness)

​दार्शनिक रूप से जब हम 'विशुष्क विचार' (शुद्ध, तार्किक और निष्पक्ष विश्लेषण) करते हैं, तो इस चरम साक्षी को ही 'दृक्' की संज्ञा दी जाती है।

​विषययुक्त स्व-भाव (Attributed Consciousness):

जब निर्गुण चेतना (Pure Consciousness) प्रकृति के प्रभाव में आकर स्वयं को 'साक्षी' के रूप में अभिव्यक्त करती है, तो उसे 'विषययुक्त स्व-भाव' या 'सगुण पुरुष' कहा जाता है। यहाँ चेतना के पास अपना एक 'विषय' (Object) होता है जिसे वह देख रही होती है। यही पुरुष की वह अवस्था है जहाँ से सृष्टि का संचालन और नियंत्रण होता है।


​६. निष्कर्ष (Conclusion)

​इस सूत्र का गहन भावार्थ यह संदेश देता है कि जिसे हम 'संसार' या 'मन' कहते हैं, वह केवल क्रियाओं (दर्शन) का एक प्रवाह है। इस प्रवाह का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। इस प्रवाह को अर्थ और अस्तित्व केवल तभी मिलता है जब इसके पीछे 'दृक् पुरुष' यानी परम साक्षी की उपस्थिति होती है। आध्यात्मिक साधना के दृष्टिकोण से, यह पत्र यह दर्शाता है कि साधक को क्रमिक रूप से जड़ जगत से चैत्तिक सत्ता, चैत्तिक सत्ता से अहं, अहं से महत्तत्त्व और अंततः महत्तत्त्व को भी पार करके उस 'चरम साक्षी' (दृक् पुरुष) में विलीन होना होता है, जो कि वास्तविक मुक्ति है।

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