षष्ठ सूत्र
१/६ निवृत्तिमुखी प्रतिसञ्चरः गुणावक्षयेण।
भावार्थ :- वृत्ति की वृद्धि प्रवृत्ति है, तथा वृत्ति की ह्रासप्राप्ति निवृत्ति हैं। सञ्चर की धारा में पुरुष में प्राकृत प्रभाव से वृत्ति का चरम व्यक्तीकरण होता है। तमोगुणी प्रकृति के प्रभाव से पुरुष देह में जो चित्त सत्ता की उत्पत्ति होती है वह जीवात्मा के लिए जब अनुभाव्य या वेदनीय रूप से गृहीत होती है तभी वह पञ्च महाभूत, दस इन्द्रियाँ तथा पञ्च तन्मात्र के रूप में प्रतीयमान होती है। गुणधारा की जब चरम अवस्था आती है, तमोगुण का अवक्षय प्रारम्भ होता है। अवक्षय का अर्थ है- पुरुष प्रकृति के अधिकार को संकुचित करता रहता है। इसके फलस्वरूप पुरुष के आकर्षण से प्रकृति विश्वकेन्द्र पुरुषोत्तम की ओर अग्रसर होती रहती है। इसके ही प्रभाव से क्रमशः जड़ पञ्च महाभूत जीवदेह, जीवप्राण तथा जीवमन में रूपान्तरित (metamor- phosed) होते रहते हैं। गुण के अवक्षय के कारण अन्त में जीवमानस पुरुषोत्तम में लीन हो जाता है। जीवमानस अपने मूल कारण में लीन हो जाता है। इसलिए प्रतिसञ्चर की चरम अवस्था गुणवर्जित अवस्था है। इसे ही व्यष्टिजीवन का प्रलय कहा जा सकता है।
सूत्र का विश्लेषण
पद-च्छेद (शब्द विच्छेद):
निवृत्तिमुखी | प्रतिसञ्चरः | गुणावक्षयेण
शब्दशः व्याकरणिक विश्लेषण (Word-by-Word Grammatical Analysis)
१. निवृत्तिमुखी
मूल शब्द: निवृत्तिमुख (स्त्रीलिंग रूप हेतु ङीप् प्रत्यय का प्रयोग)।
अवयव विश्लेषण (Breaking down the components):
निवृत्ति: नि (उपसर्ग) + वृत् (धातु - वर्तने/होने के अर्थ में) + क्तिन् (भाववाचक स्त्रीप्रत्यय)। इसका शाब्दिक अर्थ है— वापस लौटना, सिमटना या अन्तर्मुखी होना।
मुखी: मुख + ङीप् (स्त्रीलिंग प्रत्यय)। इसका अर्थ है— ओर प्रवृत्त होना या उन्मुख होना।
समास: निवृत्तिः मुखं यस्याः सा (बहुव्रीहि समास)। अर्थात् "जिसका मुख या झुकाव वापस लौटने (निवृत्ति) की ओर हो।"
विभक्ति एवं वचन: प्रथमा विभक्ति, एकवचन, स्त्रीलिंग।
२. प्रतिसञ्चरः
मूल शब्द: प्रतिसञ्चर (पुल्लिङ्ग)।
अवयव विश्लेषण:
प्रति (उपसर्ग - विपरीत, उलटी या वापस आने की दिशा के अर्थ में)।
सम् (उपसर्ग - सम्यक् अर्थात् पूर्णता के अर्थ में)।
चर् (धातु - गति करने या चलने के अर्थ में)।
घञ् (प्रत्यय - संज्ञा या भाववाचक पद बनाने के लिए)।
शाब्दिक अर्थ: विपरीत गति, केन्द्र की ओर पुनः लौटने की प्रक्रिया या प्रति-संचरण (Involution)।
विभक्ति एवं वचन: प्रथमा विभक्ति, एकवचन, पुल्लिङ्ग।
३. गुणावक्षयेण
मूल शब्द: गुणावक्षय (पुल्लिङ्ग)।
सन्धि विच्छेद: गुण + अवक्षय (अ + अ = आ, यहाँ दीर्घ स्वर सन्धि है)।
अवयव विश्लेषण:
गुण: सत्त्व, रज और तम (प्रकृति के तीन बन्धनकारी तत्त्व)।
अवक्षय: अव (उपसर्ग - नीचे गिरने या ह्रास के अर्थ में) + क्षि (धातु - नष्ट होने या क्षय होने के अर्थ में) + घञ् (प्रत्यय)। इसका शाब्दिक अर्थ है— क्षरण, घटना या शिथिल होना।
समास: गुणानाम् अवक्षयः (षष्ठी तत्पुरुष समास) = गुणावक्षयः। तेन = गुणावक्षयेण।
विभक्ति, वचन एवं कारक: तृतीया विभक्ति, एकवचन, पुल्लिङ्ग। यहाँ हेतु या कारण के अर्थ में करण कारक का प्रयोग हुआ है (अर्थात् "गुणों के ह्रास के द्वारा या कारण से")।
शाब्दिक अर्थ
"गुणों (सत्त्व, रज और तम) के ह्रास या क्षय होने से, प्रतिसञ्चर (मूल कारण की ओर लौटने की प्रक्रिया) निवृत्ति (अन्तर्मुखी गति) की ओर उन्मुख होती है।"
इसे सरल शब्दों में इस प्रकार समझ सकते हैं:
गुणावक्षयेण = गुणों के घटने या शिथिल होने के कारण,
प्रतिसञ्चरः = प्रतिसञ्चर की प्रक्रिया (जड़ से पुनः चेतन की ओर विकास),
निवृत्तिमुखी = निवृत्ति (लौटने या मुक्त होने) की दिशा में आगे बढ़ती है।
भावार्थ विश्लेषण
यह सूत्र ब्रह्मांडीय विकासक्रम (Cosmology) और जीव की आध्यात्मिक मुक्ति-यात्रा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैचारिक स्तंभ है। जहाँ इसके पूर्व के सूत्र सृष्टि के स्थूलीकरण (सञ्चर) की व्याख्या करते हैं, वहीं यह छठा सूत्र 'प्रतिसञ्चर' (Inward Evolution) की वैज्ञानिक और दार्शनिक प्रक्रिया को उद्घाटित करता है।
१. वृत्ति: प्रवृत्ति और निवृत्ति का द्वंद्व
सूत्र की व्याख्या की शुरुआत 'वृत्ति' (Propensity/Mental Tendency) के व्यवहार से होती है:
प्रवृत्ति (Extroversion): जब मन की वृत्तियों का झुकाव बाहर की ओर, यानी स्थूल संसार और भौतिक भोगों की तरफ बढ़ता है, तो उसे 'प्रवृत्ति' कहते हैं। यह सञ्चर (Saincara) की धारा का गुण है, जहाँ चेतना सूक्ष्म से स्थूल की ओर जाती है।
निवृत्ति (Introversion): जब वृत्तियों का ह्रास होने लगता है, अर्थात मन संसार से सिमटकर अपने मूल कारण (आत्मा) की ओर मुड़ने लगता है, तो उसे 'निवृत्ति' कहते हैं। यह प्रतिसञ्चर की मूल पहचान है।
मुख्य बिंदु: सञ्चर की धारा में प्रकृति के प्रभाववश जीव में वृत्तियों का चरम व्यक्तीकरण (Ultimate Manifestation) होता है। यही वह बिंदु है जहाँ से जीव वापस लौटने की छटपटाहट महसूस करता है।
२. चित्त सत्ता और स्थूल जगत का प्रतीयमान होना
जब सृष्टि चक्र में तमोगुण (Static Principle) का प्रभाव चरम पर होता है, तब पुरुष देह में 'चित्त सत्ता' (Mind-stuff) की उत्पत्ति होती है।वेदनीय या अनुभाव्य रूप: जब यह चित्त सत्ता जीवात्मा के लिए अनुभव का विषय बनती है, तभी हमें यह संसार और अपना अस्तित्व पञ्च महाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी), दस इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ) और पञ्च तन्मात्र (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) के रूप में प्रतीयमान (Manifested) होता है।
सरल शब्दों में, जिसे हम ठोस भौतिक जगत कहते हैं, वह वास्तव में तमोगुण के प्रभाव में जड़ीभूत हुई चित्त सत्ता का ही एक रूप है।
३. गुणावक्षय की वैज्ञानिक प्रक्रिया
इस सूत्र का सबसे महत्वपूर्ण पद है 'गुणावक्षयेण'। यहाँ 'अवक्षय' का अर्थ केवल नष्ट होना नहीं है, बल्कि एक अत्यंत अनूठी दार्शनिक प्रक्रिया है:
प्रकृति के अधिकार का संकुचन: अवक्षय का अर्थ है कि पुरुष (चेतना) पर प्रकृति (बन्धनकारी शक्ति) का जो अधिकार या नियंत्रण था, वह धीरे-धीरे संकुचित (Contract) होने लगता है।
गुणधारा की चरम अवस्था: जब जड़ता (तमोगुण) अपनी अंतिम सीमा पर पहुँच जाती है, तब उसमें आंतरिक संघर्ष (Clash and Cohesion) के कारण चेतना का ऊर्ध्वगमन शुरू होता है। यहाँ से तमोगुण घटने लगता है और रजोगुण तथा सत्त्वगुण का प्रभाव क्रमशः बढ़ने लगता है।
रूपान्तरण (Metamorphosis): इसी गुणावक्षय के प्रभाव से जड़ पञ्च महाभूत क्रमशः अधिक सूक्ष्म संरचनाओं में बदलते हैं: जीव देह, जीव प्राण व जीव मन में रुपान्तरण होता है।
४. पुरुषोत्तम का आकर्षण और व्यष्टि प्रलय
जैसे-जैसे गुणों का बन्धन ढीला पड़ता है, प्रतिसञ्चर की गति तीव्र हो जाती है। इसके पीछे ब्रह्मांडीय केंद्र का आकर्षण काम करता है:
विश्वकेन्द्र की ओर अग्रसर होना: ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित 'पुरुषोत्तम' (Cosmic Nucleus) अपनी ओत-प्रोत शक्ति से प्रत्येक जीवमन को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। प्रकृति इस आकर्षण के प्रभाव से विवश होकर पुरुषोत्तम की ओर बढ़ने लगती है।
जीवमानस का विलय: गुणावक्षय की अंतिम परिणति यह होती है कि जीव का सीमित मन (जीवमानस) अपने स्थूल और सूक्ष्म बंधनों को पार करता हुआ अंततः अपने 'मूल कारण' यानी पुरुषोत्तम में विलीन हो जाता है।
५. साधना की व्यावहारिक भूमिका: प्रतिसञ्चर की गति में तीव्रता
प्राकृतिक रूप से जड़ पदार्थ से जीवमन और फिर परम पुरुष तक पहुँचने की प्रतिसञ्चर प्रक्रिया में करोड़ों वर्ष लग सकते हैं। प्रकृति टक्कर और घर्षण (Clash and Cohesion) के माध्यम से बहुत धीमी गति से गुणों का अवक्षय करती है। यहाँ 'साधना' एक उत्प्रेरक (Catalyst) का कार्य करती है।
गुणों का रूपांतरण (Transmutation of Gunas): साधना के माध्यम से साधक अपने भीतर के तमोगुण को रजोगुण में और रजोगुण को सत्त्वगुण में तीव्रता से बदलता है। जब यम और नियम का पालन किया जाता है, तो मन की बहिर्मुखी प्रवृत्तियाँ (प्रवृत्ति) सिमटने लगती हैं और अंतर्मुखी गति (निवृत्ति) शुरू होती है।
ब्रह्मांडीय विचार (Cosmic Ideation): साधना का अर्थ है— 'अहंभाव' को 'परमभाव' में जोड़ना। जब साधक निरंतर यह विचार करता है कि "मैं और मेरा यह लघु मन उस परम पुरुष की ही अभिव्यक्ति है", तो पुरुषोत्तम का आकर्षण (Cosmic Attraction) जीवमन पर हावी हो जाता है। इससे 'गुणावक्षयेण' की प्रक्रिया जो प्राकृतिक रूप से अत्यंत धीमी थी, वह अत्यधिक तीव्र हो जाती है।
मन का विस्तार: ध्यान और आध्यात्मिक साधना से जीव का संकुचित मन विस्तृत होने लगता है। पंचमहाभूतों और दस इंद्रियों के बंधन ढीले पड़ने लगते हैं, जिससे साधक 'व्यष्टि प्रलय' (व्यक्तिगत अहंकार के लय) की ओर सुगमता से बढ़ता है।
निष्कर्ष (Philosophical Conclusion)
"इसलिए प्रतिसञ्चर की चरम अवस्था गुणवर्जित अवस्था है। इसे ही व्यष्टिजीवन का प्रलय कहा जा सकता है।"
यह प्रलय विनाश का सूचक नहीं है, बल्कि 'व्यष्टि' (Individual) का 'समष्टि' (Cosmic) में महामिलन है। जब जीव का अहंभाव (Ego) पूरी तरह समाप्त होकर वह गुणातीत (Beyond Attributes) हो जाता है, तब उसकी निवृत्तिमुखी यात्रा संपन्न होती है। यह सूत्र सिद्ध करता है कि आध्यात्मिक प्रगति कोई काल्पनिक विचार नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय नियम के तहत गुणों के बन्धन से मुक्ति की एक सुनिश्चित और क्रमिक वैज्ञानिक प्रक्रिया है।
सरल शब्दों में अर्थ
"जैसे-जैसे हमारे ऊपर से बंधनों (प्रकृति के तीन गुणों— सत्त्व, रज, तम) का असर कम होता जाता है, वैसे-वैसे हमारा मन बाहर की दुनिया में भटकने के बजाय, अपने मूल घर (परम चेतना या ईश्वर) की तरफ वापस लौटने लगता है।"
सृष्टि चक्र में दो गतियाँ होती हैं:
सञ्चर (बाहर जाना): चेतना का परम पुरुष से निकलकर जड़ पदार्थ (जैसे पत्थर, मिट्टी) बन जाना।
प्रतिसञ्चर (वापस लौटना): जड़ पदार्थ से विकसित होकर मन बनना और मन का वापस परम पुरुष में मिल जाना। यह सूत्र इसी वापस लौटने की यात्रा को समझाता है।
व्यावहारिक उदाहरणों द्वारा समझें
१. नदी और समुद्र का उदाहरण (The Water Cycle)
सञ्चर (बाहर जाना): समुद्र का पानी भाप बनता है, बादल बनता है, और पहाड़ों पर गिरकर अत्यधिक ठंड के कारण बर्फ (जड़ रूप) बन जाता है। यह पानी का अपने स्रोत से दूर जाना है।
गुणावक्षय (बंधनों का टूटना): जब सूरज की गर्मी पड़ती है, तो बर्फ का कड़ापन (जड़ता या तमोगुण) पिघलने लगता है। बंधनों का यह कम होना ही 'गुणावक्षय' है।
प्रतिसञ्चर और निवृत्तिमुखी (वापस लौटना): जैसे ही बर्फ पिघलती है, वह नदी बनकर वापस समुद्र की ओर दौड़ पड़ती है (प्रतिसञ्चर)। नदी का मुख केवल समुद्र की तरफ होता है, वह रास्ते के आकर्षणों में रुकती नहीं, बल्कि सीधे अपने स्रोत में समाने के लिए आतुर होती है (निवृत्तिमुखी)।
२. पतंग और भारी धागों का उदाहरण (The Kite and Heavy Strings)
कल्पना कीजिए एक पतंग (जीवमन) है जो आकाश में बहुत ऊपर उड़ना चाहती है, लेकिन उसे ज़मीन से तीन भारी रस्सियों (सत्त्व, रज, तम गुण) से बाँधकर नीचे खींचा गया है।
गुणावक्षयेण: जैसे-जैसे आप नीचे से उन भारी रस्सियों के वजन को कम करते जाते हैं या उन्हें काटते जाते हैं, पतंग का भारीपन कम होने लगता है।
प्रतिसञ्चर: बंधनों के कटते ही पतंग प्राकृतिक रूप से ऊपर आकाश की गहराइयों (परम पुरुष) की ओर खिंची चली जाती है।
३. खिंचे हुए रबर बैंड का उदाहरण (The Stretched Rubber Band)
जब आप एक रबर बैंड को हाथ से पकड़कर बाहर की तरफ खींचते हैं, तो वह 'प्रवृत्ति' है (संसार की ओर खिंचना)।
जैसे ही आप अपनी उंगलियों का दबाव (प्रकृति का प्रभाव) धीरे-धीरे कम करते हैं (गुणावक्षयेण), रबर बैंड तुरंत अपनी मूल स्थिति में आने के लिए अंदर की ओर मुड़ जाता है (निवृत्तिमुखी) और अपने केंद्र पर वापस लौट आता है (प्रतिसञ्चर)।
दैनिक जीवन में इसका संदेश
हमारे भीतर भी तीन गुण काम करते हैं: तमोगुण (आलस्य, अज्ञान, क्रोध), रजोगुण (अत्यधिक इच्छाएँ, भागदौड़, चंचलता) और सत्त्वगुण (शांति, पवित्रता, ज्ञान)।
जब व्यक्ति साधना, सेवा और स्वाध्याय करता है, तो उसके भीतर से पहले तमोगुण घटता है, फिर रजोगुण शांत होता है। जैसे ही ये गुण घटते हैं (गुणावक्षयेण), मन का संसार में भटकना (भय, ईर्ष्या, तनाव) बंद हो जाता है और वह स्वभाव से ही शांत, आनंदित और अंतर्मुखी (निवृत्तिमुखी) होकर परमात्मा में लीन होने की ओर बढ़ जाता है।
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