पंचम सूत्र
१/५ प्रवृत्तिमुखी सञ्चरः गुणधारायाम्।
भावार्थ:- ब्रह्मचक्र के प्राणकेन्द्र से प्रकृति के प्रभाव के कारण पुरुष के जड़ाभिमुखी विकास को ही प्रवृत्ति (extrovertial phase) कहते है। साक्षीस्वरूप पुरुषोत्तम में प्राकृत शक्ति के प्रथम सम्पात के कारण अस्तित्व बोध जगता है। दार्शनिक भाषा में इस अस्तित्व बोध को ही महत्तत्त्व कहा जाता है। जिस प्राकृत शक्ति सम्पात से इस महत्तत्त्व की उत्पत्ति होती है उसे ही प्रकृति का सत्त्वगुण (Sentient Principle) कहा जाता है। 'गुण' का अर्थ है बाँधने की रस्सी (binding principle) । महत्तत्त्व के ऊपर प्राकृतिक धाराप्रवाह में प्राकृत शक्ति के दूसरे सम्पात से ही कर्तृत्वबोध तथा स्वामित्वबोध उत्पन्न होता है। पुरुष की इस परिवर्त्तित अभिव्यक्ति को अहंतत्त्व (doer I) कहा जाता है, तथा जिस शक्ति सम्पात से यह उत्पन्न होता है उसे ही रजोगुण (Mutative Principle) कहा जाता है। प्राकृत शक्ति के क्रमिक धाराप्रवाह में अधिक शक्ति सम्पात के कारण परिशेष में उद्भूत होता है विषय भाव या पुरुष की चरम स्थूलत्व प्राप्ति (The crudest objective counterpart of the subjective cosmos) । पुरुष की इस अवस्था को चित्त (Mind stuff) कहा जाता है। जिस शक्ति सम्पात के कारण इसकी उत्पत्ति होती है प्रकृति की उस शक्ति को तमोगुण (Static Principle) कहा जाता है। अर्थात् एक ही पुरुष से प्रवृत्ति की ओर इसकी क्रमिक गुणधारा में ही सञ्चर क्रिया निष्पन्न होती है।
सूत्र का विश्लेषण
१. पदच्छेद (Word Breakdown)
प्रस्तुत सूत्र में तीन मुख्य पद हैं:
प्रवृत्तिमुखी
सञ्चरः
गुणधारायाम्
२. प्रत्येक पद का सम्पूर्ण व्याकरणगत एवं व्युत्पत्तिपरक विश्लेषण
पद १: प्रवृत्तिमुखी (Pravṛttimukhī)
मूल शब्द: प्रवृत्तिमुख
प्रकृति-प्रत्यय (व्युत्पत्ति):
प्रवृत्ति: 'प्र' (उपसर्ग) + 'वृत्' (वर्तने/गति अर्थ में धातु) + 'क्तिन्' (भाव अर्थ में प्रत्यय)। इसका शाब्दिक अर्थ है—आगे बढ़ना, सक्रिय होना या बाहर की ओर झुकाव।
मुखी: 'मुख' शब्द के साथ 'इनि' (मत्वर्थीय प्रत्यय) अथवा सूत्र शैली में स्त्रीत्व/विशेषण रूप देने के लिए 'ङीप्' (ई) प्रत्यय का योग।
समास: प्रवृत्तिः मुखं यस्य सः (बहिर्मुख प्रवाह) — बहुव्रीहि समास।
व्याकरणिक परिचय: विशेषण पद (यह 'सञ्चरः' की विशेषता बता रहा है), प्रथमा विभक्ति, एकवचन।
सटीक शाब्दिक अर्थ: बाहर की ओर (स्थूलता या जड़ता की ओर) उन्मुख, बहिर्मुखी गति वाला (Extrovertial / Outward-facing)।
पद २: सञ्चरः (Sañcaraḥ)
मूल शब्द: सञ्चर
प्रकृति-प्रत्यय (व्युत्पत्ति):
'सम्' (सम्यक्/पूर्णता के अर्थ में उपसर्ग) + 'चर्' (गतौ/चलने के अर्थ में धातु) + 'घञ्' या 'अच्' (भाववाचक प्रत्यय)।
सन्धि नियम: 'सम् + चर' में अपदान्त मकार को 'नश्चापदान्तस्य झलि' सूत्र से अनुस्वार और फिर 'अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः' से च-वर्ग का पंचमाक्षर 'ञ्' होकर 'सञ्चर' रूप सिद्ध होता है।
व्याकरणिक परिचय: संज्ञा पद, पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन (कर्ता रूप)।
सटीक शाब्दिक अर्थ: संचरण, सम्यक् गति, क्रमिक विकास की यात्रा, सूक्ष्म से स्थूल की ओर होने वाला प्रवाह (Cosmic onward movement)।
पद ३: गुणधारायाम् (Guṇadhārāyām)
मूल शब्द: गुणधारा (आकारान्त स्त्रीलिंग)
समास: 'गुणानां धारा' (गुणों की धारा या त्रिगुणात्मक प्रवाह) — षष्ठी तत्पुरुष समास।
प्रकृति-प्रत्यय (व्युत्पत्ति):
गुण: 'गुणूँ' (आमन्त्रणे धातु) + 'अच्' प्रत्यय। यहाँ यह प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) को इंगित करता है।
धारा: 'धृ' (धारणे/धारण करने अर्थ में धातु) + 'णिच्' + 'अच्' + 'टाप्' (स्त्रीत्व बोधक प्रत्यय) = धारा (निरंतर प्रवाह)।
व्याकरणिक परिचय: संज्ञा पद, आकारान्त स्त्रीलिंग, सप्तमी विभक्ति, एकवचन (अधिकरण कारक)।
सटीक शाब्दिक अर्थ: गुणों की धारा में, त्रिगुणात्मक प्रवाह के अंतर्गत (In the flow of cosmic attributes/Gunas)।
३. व्याकरणिक समन्वय एवं अन्वय (Syntactic Relation)
अन्वय: गुणधारायाम् प्रवृत्तिमुखी सञ्चरः (भवति)।
कारक एवं सम्बन्ध विश्लेषण:
सञ्चरः इस सूत्र का मुख्य उद्देश्य (Subject/कर्ता) है।
प्रवृत्तिमुखी इस कर्ता का विधेय-विशेषण (Predicate Adjective) है, जो संचरण की गंतव्य दिशा (बहिर्मुखता) को स्पष्ट करता है।
गुणधारायाम् वाक्य का अधिकरण (आधार/प्रत्यय) है, जो उस स्थान या माध्यम को दर्शाता है जिसके भीतर यह पूरी संचरण क्रिया घटित हो रही है।
४. शब्दशः अर्थ (Word-by-Word Meaning)
प्रवृत्तिमुखी: बहिर्मुखी, बाहर की ओर (यानी परम चेतना से जड़ता/स्थूलता की ओर) उन्मुख या मुख किए हुए।
सञ्चरः: सम्यक् गति, सूक्ष्म से स्थूल की ओर होने वाली क्रमिक विकास की यात्रा (Cosmic onward movement)।
गुणधारायाम्: प्रकृति के त्रिगुणात्मक (सत्त्व, रज और तम गुणों के) प्रवाह में।
सूत्र का संयुक्त शाब्दिक अर्थ (Combined Literal Meaning)
"प्रकृति के तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) के प्रवाह के भीतर, (चेतना का सूक्ष्म से स्थूल की ओर होने वाला) यह संचरण बहिर्मुखी (प्रवृत्तिमुखी) होता है।"
भावार्थ का विश्लेषण
श्री श्री आनन्दमूर्ति द्वारा रचित 'आनन्द सूत्रम्' (१९६१) दर्शनशास्त्र का एक ऐसा अमूल्य स्तम्भ है जो चेतना और विज्ञान के अंतर्संबंधों को अत्यंत संक्षिप्त रूप में प्रकट करता है। प्रथम अध्याय का पाँचवाँ सूत्र "प्रवृत्तिमुखी सञ्चरः गुणधारायाम्" समूचे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, मानसिक विकास और स्थूल जगत के प्राकट्य की पूरी प्रक्रिया का मूलाधार है। यह सूत्र स्पष्ट करता है कि कैसे एक निराकार, निर्गुण और परम दृष्टा चेतना (पुरुष) प्रकृति के त्रिगुणात्मक बंधनों के प्रभाव में आकर दृश्यमान भौतिक जगत का रूप ले लेती है।
१. तात्विक आधार: ब्रह्मचक्र और पुरुषोत्तम
इस सूत्र के भावार्थ को समझने के लिए 'ब्रह्मचक्र' की अवधारणा को समझना अनिवार्य है। ब्रह्मचक्र चेतना के चक्रगामी प्रवाह को कहते हैं, जिसका प्रस्थान बिंदु और अंतिम गंतव्य बिंदु स्वयं 'ब्रह्म' (शिव और शक्ति का अविभाज्य एकात्म रूप) है।
प्राणकेन्द्र / पुरुषोत्तम (The Cosmic Nucleus): ब्रह्मचक्र के केंद्र में अवस्थित साक्षी स्वरूप चेतना को 'पुरुषोत्तम' या 'परमशिव' कहा जाता है। सृष्टि की समस्त क्रियाएँ इसी केंद्र के परितः घटित होती हैं।
सञ्चर (Saincara): पुरुषोत्तम रूपी केंद्र से बाहर की ओर, अर्थात् सूक्ष्म से स्थूल (Consciousness to Matter) की ओर होने वाले क्रमिक विकास के प्रवाह को 'सञ्चर' कहते हैं।
२. त्रिगुणात्मक सम्पात और ब्रह्माण्डीय मन का विकास (Cosmic Mind Evolution)
सञ्चर की यह प्रक्रिया अचानक नहीं होती, बल्कि प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्व, रज और तम—के क्रमिक और व्यवस्थित आघातों (सम्पातों) के माध्यम से संपन्न होती है। 'गुण' का शाब्दिक अर्थ ही 'रस्सी' या 'बंधन' है, जो मुक्त चेतना को सीमाओं में बाँधने का कार्य करता है।
(क) . सत्त्वगुण का प्रथम सम्पात: महत्तत्त्व (The Sentient Phase)
प्रक्रिया: जब परम शिव या पुरुषोत्तम पर प्रकृति के सत्त्वगुण (Sentient Principle) का पहला प्रभाव या आघात होता है, तो अनंत चेतना के एक अंश में सीमाओं का आभास होने लगता है।
परिणाम: इस प्रथम सम्पात से ब्रह्माण्डीय स्तर पर 'अस्तित्व बोध' (Sense of Existence) जागृत होता है, जिसे दार्शनिक भाषा में 'महत्तत्त्व' (Cosmic Mahat / "I exist" या "अस्मिता") कहा जाता है। यह चेतना के शुद्धतम और सूक्ष्मतम विन्यास की शुरुआत है।
(ख) . रजोगुण का द्वितीय सम्पात: अहंतत्त्व (The Mutative Phase)
प्रक्रिया: महत्तत्त्व के ऊपर जब प्राकृतिक धाराप्रवाह निरंतर बढ़ता है, तब प्रकृति का दूसरा गुण, रजोगुण (Mutative Principle), सक्रिय होकर दूसरा सम्पात करता है।
परिणाम: इस आघात के कारण केवल 'होने' के बोध (I exist) से आगे बढ़कर 'कर्तृत्वबोध' (Sense of Doership) और 'स्वामित्वबोध' (Sense of Ownership) पैदा होता है। इसे 'अहंतत्त्व' (Cosmic Aham / "I do") कहा जाता है। यहाँ ब्रह्माण्डीय मन में संकल्प और कर्म करने की क्षमता का प्राकट्य होता है।
(ग) . तमोगुण का क्रमिक सम्पात: चित्त (The Static Phase)
प्रक्रिया: रजोगुण के बाद जब प्रकृति का सबसे स्थूल बल, तमोगुण (Static Principle), ब्रह्माण्डीय मन पर हावी होने लगता है, तो क्रियाशीलता को एक निश्चित आकार या सीमा मिलने लगती है।
परिणाम: अधिक शक्ति सम्पात और दबाव के कारण अंततः 'विषय भाव' या 'चित्त' (Cosmic Chitta / "I have done") उद्भूत होता है। चित्त वह मानसिक पर्दा या स्क्रीन है जिस पर कोई भी विषय या वस्तु रूप लेती है। इसे समष्टिगत चेतना की 'चरम स्थूलत्व प्राप्ति' (The crudest objective counterpart of the subjective cosmos) का प्रारंभिक चरण माना जाता है।
३. 'प्रवृत्तिमुखी' पद का गहन विश्लेषणात्मक महत्व
सूत्र में 'प्रवृत्तिमुखी' शब्द सबसे महत्वपूर्ण दिशा-सूचक है।
बहिर्मुखता (Extroversion): 'प्रवृत्ति' का अर्थ है संसार की ओर उन्मुख होना, इच्छाओं का बाहर की ओर विस्तार और सूक्ष्म मानसिक अवस्थाओं का स्थूल भौतिक तत्वों में बदलना।
चेतना का आवरण (Veiling of Consciousness): सञ्चर की इस पूरी यात्रा में जैसे-जैसे गुणधारा आगे बढ़ती है, पुरुष का स्वतंत्र स्वभाव प्रकृति के बंधनों से ढकता चला जाता है। सत्त्व से रज और रज से तम की ओर जाने की यह यात्रा उत्तरोत्तर जड़ता (Materialism) को जन्म देती है।
एक ही पुरुष से बहुविध सृष्टि: यह विश्लेषण स्पष्ट करता है कि मूल सत्ता केवल एक ही है—'पुरुष'। उसी एक पुरुष से चेतना की क्रमिक गुणधारा में संचरण क्रिया के माध्यम से ब्रह्माण्डीय मन (महत्, अहम्, चित्त) और आगे चलकर पंचमहाभूतों (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) का निर्माण होता है।
४. दार्शनिक निष्कर्ष एवं प्रासंगिकता
यह पाँचवाँ सूत्र यह समझने के लिए अनिवार्य कुंजी है कि यह दृश्यमान जगत कोई भ्रम या मिथ्या नहीं है, बल्कि यह परम चेतना का ही एक क्रमिक, रूपांतरित और स्थूल रूप है (ब्रह्माण्डीय विचार प्रक्षेपण)।
सञ्चर की यह 'प्रवृत्तिमुखी' (बाहर की ओर जाने वाली) यात्रा तब तक जारी रहती है जब तक कि तमोगुण के अत्यधिक दबाव से 'जड़स्फोट' (Explosion of matter) नहीं हो जाता और पुनः वहाँ से 'प्रतिसञ्चर' (Pratisaincara / Introvertial Phase) यानी जड़ से वापस चेतना की ओर लौटने की यात्रा (जीवों में मन का विकास और साधना) शुरू नहीं होती।
अतः, यह प्रमाणित होता है कि सूत्र १/५ केवल एक दार्शनिक सिद्धांत नहीं है, अपितु यह सृष्टि विज्ञान (Cosmology) का वह परम सत्य है जो सूक्ष्म अध्यात्म को भौतिक जगत की तार्किकता से जोड़ता है।
सीधा और आसान मतलब
इस सूत्र का सरल अर्थ यह है: एक अदृश्य, बेहद हल्की और स्वतंत्र शक्ति (परमेश्वर या शुद्ध चेतना) कैसे धीरे-धीरे भारी, गाढ़ी और ठोस होकर यह दिखाई देने वाला संसार (जैसे मिट्टी, पत्थर, पेड़, पहाड़) बन जाती है।
सूक्ष्म (बारीक) से स्थूल (भारी/ठोस) की तरफ जाने की इस यात्रा को ही 'सञ्चर' कहते हैं।
सरल उदाहरण: भाप से बर्फ बनने का सफर
सोचिए कि पानी के तीन रूप होते हैं—भाप, पानी और बर्फ। इसी से पूरी सृष्टि के बनने की कहानी समझिए:
शुरुआती अवस्था (शुद्ध चेतना): हवा में उड़ती हुई भाप (Vapor) की तरह, जो आज़ाद है और दिखाई भी नहीं देती। यह भगवान या परम पुरुष की मूल अवस्था है।
पहला कदम (सत्त्वगुण का असर): जब भाप पर थोड़ी ठंडक का असर होता है, तो वह हल्के कोहरे या धुंध जैसी दिखने लगती है। इसे दर्शन की भाषा में 'महत्तत्त्व' कहते हैं—यानी सिर्फ यह अहसास होना कि "मैं हूँ"।
दूसरा कदम (रजोगुण का असर): ठंडक और बढ़ी, तो वह कोहरा सिमटकर पानी की बूंदों में बदल गया। पानी में हलचल होती है, वह बह सकता है, काम कर सकता है। इसे 'अहंतत्त्व' कहते हैं—यानी यह अहसास होना कि "मैं कुछ कर सकता हूँ"।
तीसरा कदम (तमोगुण का असर): जब कड़ाके की ठंड पड़ती है (भारी दबाव), तो वही पानी जमकर बर्फ का ठोस टुकड़ा (Ice) बन जाता है। अब बर्फ भारी है, जड़ है, अपनी जगह से खुद हिल नहीं सकती। इसे 'चित्त' और आगे चलकर 'ठोस भौतिक संसार' कहा जाता है।
उदाहरण का निष्कर्ष: जैसे भाप ही जमी हुई बर्फ है, वैसे ही यह पूरी दुनिया (पत्थर, लोहा, मिट्टी) असल में उस परमात्मा का ही बहुत 'जमा हुआ' या ठोस रूप है।
एक और छोटा उदाहरण: विचार से फिल्म बनने तकसत्त्वगुण (विचार): एक डायरेक्टर के दिमाग में सिर्फ एक आइडिया आया कि "मुझे एक फिल्म बनानी है।" (यह बहुत सूक्ष्म है - महत्तत्त्व)।
रजोगुण (एक्शन): अब वह उसकी कहानी लिखने लगा, कलाकारों को बुलाने लगा, शूटिंग करने लगा। यहाँ हलचल और काम शुरू हो गया। (यह अहंतत्त्व है)।
तमोगुण (ठोस नतीजा) : अंत में फिल्म बनकर सिनेमाघर के परदे पर या कंप्यूटर की हार्ड डिस्क में एक ठोस रूप में हमारे सामने आ गई, जिसे हम देख और छू सकते हैं। (यह चित्त और स्थूल रूप है)।
संक्षेप में : प्रकृति के तीन गुण (सत्त्व, रज, तम) तीन अलग-अलग तरह के दबाव या बंधन हैं। इन बंधनों के कारण ही परमात्मा की अदृश्य शक्ति बाहर की तरफ (प्रवृत्तिमुखी) फैलती हुई इस दृश्यमान ब्रह्मांड के रूप में प्रकट होती है।
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