प्रउत की हुंकार - 3 जनवरी शनिवारी

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आचार्य दिलीप सिंह सागर
                  चैयरमेन, PSS








बिहार विशेषांक : नव-बिहार का उदय


विषय: आदर्श बिहार - प्रगतिशील एवं आत्मनिर्भर सामाजिक-आर्थिक इकाइयां
बिहार की नियति बदलने का समय आ गया है
आज भारतवर्ष का सबसे पिछड़ा हुआ लेकिन सबसे जागरूक राज्य बिहार है। किसी युग में बिहार भारतवर्ष का दिल था और उसकी धड़कन से पूरे आर्यावर्त में जीवन का संचार होता था। आज बिहार पुनः अपनी उसी ऊर्जा को समेटकर अंगड़ाई ले रहा है। प्राउटिस्ट सर्व समाज (PSS) का मानना है कि बिहार की गरीबी का कारण संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि केंद्रीयकृत आर्थिक नीतियां और नैतिक नेतृत्व का अभाव है।

        बिहार को चार आत्मनिर्भर
प्राउट (प्रगतिशील उपयोग तत्व) के सिद्धांतों के आधार पर हमने बिहार को चार आत्मनिर्भर इकाइयों में विभाजित कर विकास का एक संपूर्ण 'ब्लूप्रिंट' तैयार किया है।




​अंगिका समाज : पूर्वी भारत का आर्थिक सेतु

​क्षेत्र : अररिया, पूर्णिया, कटिहार, भागलपुर, बांका, जमुई, मुंगेर, खगड़िया, आलमनगर (मधेपुरा) और हलसी (लखीसराय)।
​औद्योगिक क्रांति : भागलपुर को 'ग्लोबल सिल्क हब' के रूप में पुनर्जीवित किया जाएगा। पूर्णिया और कटिहार की जूट बेल्ट में 'गोल्डन फाइबर' आधारित अत्याधुनिक कारखाने लगेंगे।
​संसाधन उपयोग : मुंगेर के इंजीनियरिंग कौशल को लघु रक्षा उद्योगों और तकनीकी नवाचार से जोड़ा जाएगा।
​विशेष : किशनगंज के साथ समन्वय कर सीमावर्ती व्यापार को सुदृढ़ किया जाएगा। 


2. मिथिला समाज : मेधा और समृद्धि का संगम 

क्षेत्र: सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, दरभंगा, मधुबनी, बेगूसराय, समस्तीपुर, वैशाली, मुजफ्फरपुर, शिवहर और सीतामढ़ी।
​जल-अर्थव्यवस्था: मखाना, मछली और जलीय पौधों के प्रसंस्करण के लिए दरभंगा को केंद्र बनाकर 'कोसी-कमला आर्थिक क्षेत्र' बनाया जाएगा।
​सांस्कृतिक गौरव: सीतामढ़ी और मधुबनी को विश्व पर्यटन मानचित्र पर लाकर स्थानीय कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय बाजार उपलब्ध कराया जाएगा।
​बौद्धिक केंद्र: मुजफ्फरपुर और दरभंगा को 'मैक्रो-एजुकेशन जोन' के रूप में विकसित किया जाएगा।

3. प्रगतिशील मगही समाज : ज्ञान और विज्ञान की धुरी

 क्षेत्र: पटना, अरवल, औरंगाबाद, जहानाबाद, गया, नालंदा, लखीसराय, शेखपुरा, सिकंदरा (जमुई) और नवादा।
आध्यात्मिक व शैक्षिक विकास: नालंदा और बोधगया को वैश्विक ज्ञान विश्वविद्यालय के रूप में पुनर्स्थापित किया जाएगा।
कृषि सुधार: मगध के पठारी और मैदानी क्षेत्रों के लिए वैज्ञानिक जल संचयन और दलहन-तिलहन प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना होगी।
प्रशासनिक विकेंद्रीकरण: सत्ता का केंद्र 'जनता' होगी, पटना केवल समन्वय का केंद्र रहेगा।

4. प्रगतिशील भोजपुरी समाज: उत्पादन और शौर्य की भूमि 
क्षेत्र: पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, गोपालगंज, सिवान, सारण, बक्सर, भोजपुर, रोहतास और भभुआ।
, ​कृषि-आधारित उद्योग: चंपारण की चीनी मिलों और रोहतास-बक्सर की चावल मिलों को सहकारी मॉडल (Co-operative Model) पर विकसित कर किसानों को मालिक बनाया जाएगा।
​पर्यटन: वीर कुंवर सिंह की शौर्य गाथा और चंपारण के सत्याग्रह को आधार बनाकर 'राष्ट्रवाद पर्यटन' का विकास।
​पलायन पर प्रहार: यहाँ की विशाल श्रम शक्ति के लिए स्थानीय स्तर पर भारी और मध्यम उद्योगों का निर्माणश
5. हमारा संकल्प: आत्मनिर्भर बिहार के 5 सूत्र

                बिहार का प्रगति पुरुष
 तात्विक सुशील रंजन
​विकेंद्रीकरण: प्रत्येक ब्लॉक (इकाई) अपनी आर्थिक योजना खुद बनाएगी। दिल्ली या पटना से थोपी गई योजनाएं बंद होंगी।
​क्रय शक्ति में वृद्धि: हमारा लक्ष्य प्रति व्यक्ति आय बढ़ाना नहीं, बल्कि हर हाथ को काम और हर व्यक्ति की 'क्रय शक्ति' (Purchasing Power) बढ़ाना है।
​न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति: भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सा और शिक्षा पर हर बिहारी का जन्मसिद्ध अधिकार सुनिश्चित किया जाएगा।
​सहकारी समाज: पूंजीवाद के शोषण और साम्यवाद के जड़त्व को समाप्त कर 'सहकारी खेती' और 'सहकारी उद्योग' की स्थापना।
​नैतिक नेतृत्व (सद्विप्र) : बिहार का नेतृत्व अब स्वार्थी नेता नहीं, बल्कि नैतिकवान प्राउटिस्ट करेंगे।

राजनैतिक लोकतंत्र में लड़खड़ाता बिहार: प्रउत के आर्थिक लोकतंत्र से सुनहरा भविष्य
​बिहार की धरती ने सदा विश्व का मार्गदर्शन किया है, परंतु आधुनिक राजनैतिक इतिहास के पन्नों को पलटें तो विकास की धारा कहीं न कहीं राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं और दोषपूर्ण आर्थिक नीतियों में उलझी नजर आती है।
​1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: अस्तित्व और विभाजन
​बिहार का आधुनिक सफर 1905 में बंगाल विभाजन के साथ शुरू हुआ। 1936 में उड़ीसा और फिर वर्ष 2000 में झारखंड के अलग होने से बिहार ने न केवल अपना भूभाग खोया, बल्कि खनिज संपदा का बड़ा हिस्सा भी खो दिया। इन विभाजनों ने बिहार को एक शुद्ध कृषि प्रधान राज्य बना दिया, जिसे एक नए आर्थिक मॉडल की आवश्यकता थी।
​2. बिहार की राजनीति के विभिन्न पड़ाव और विकास की स्थिति
​कांग्रेस युग (1947 से 1990 तक):
डॉ. श्रीकृष्ण सिंह (श्रीबाबू) और डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह की जोड़ी ने बिहार के निर्माण में महती भूमिका निभाई। यह वह समय था जब बड़े उद्योगों (बरौनी, हटिया) की नींव रखी गई। परंतु 1967, 1970 और 1977 की राजनैतिक अस्थिरता ने निरंतरता को भंग किया। सत्ता के केंद्रीकरण के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जड़ें कमजोर होने लगीं।
​लालू प्रसाद यादव युग (1990 से 2005 तक श) :
इस काल में 'सामाजिक न्याय' और 'स्वर' तो मिला, लेकिन विकास की गति थम गई। औद्योगिक पलायन शुरू हुआ और बुनियादी ढांचा चरमरा गया। आर्थिक लोकतंत्र की अनुपस्थिति में सामाजिक न्याय केवल राजनैतिक सशक्तिकरण तक सीमित रह गया।
​नीतीश कुमार युग (2005 से अब तक):
'सुशासन' के नाम पर सड़कों और बिजली में सुधार तो दिखा, लेकिन रोजगार और कृषि आधारित उद्योगों में बिहार पिछड़ता गया। सरकारी अनुदान पर निर्भरता बढ़ी, जिससे आत्मनिर्भर बिहार का सपना अधूरा रहा।
​भाजपा की अधूरी महत्वाकांक्षा:
जनसंघ के समय से लेकर वर्तमान गठबंधन की राजनीति तक, भाजपा ने सत्ता में भागीदारी तो की, लेकिन बिहार के लिए कोई मौलिक 'बिहार मॉडल' प्रस्तुत करने के बजाय केंद्रीय योजनाओं पर ही निर्भर रही।
​3. समाधान: प्रउत (PROUT) का आर्थिक लोकतंत्र
​राजनैतिक लोकतंत्र की इन विफलताओं के बीच प्रउत (Progressive Utilization Theory) एक वैकल्पिक और वैज्ञानिक मार्ग प्रशस्त करता है। प्राउटिस्ट सर्व समाज (PSS) का मानना है कि जब तक आर्थिक सत्ता का विकेंद्रीकरण नहीं होगा, बिहार का पूर्ण उत्थान असंभव है।
​प्रउत के माध्यम से बिहार का पुनरुद्धार:
​विकेंद्रीकृत नियोजन (Decentralized Planning): प्रउत के अनुसार विकास का केंद्र पटना नहीं, बल्कि 'ब्लॉक' होना चाहिए। बिहार के प्रत्येक जिले की अपनी विशिष्टता है (जैसे मुजफ्फरपुर की लीची, भागलपुर का सिल्क)। वहीं के कच्चे माल से वहीं उद्योग लगने चाहिए।
​सहकारी खेती और उद्योग: बिहार की छोटी जोत वाली खेती का समाधान 'सहकारी कृषि' है। किसानों को बीज से लेकर बाजार तक की श्रृंखला में भागीदार बनाकर उनकी क्रय शक्ति बढ़ानी होगी।
​पलायन पर पूर्ण विराम: जब आर्थिक लोकतंत्र के तहत स्थानीय लोगों को रोजगार की गारंटी मिलेगी, तो बिहार की प्रतिभा को दूसरे राज्यों में जाकर अपमानित नहीं होना पड़ेगा।
'सबको काम और सबको सम्मान: प्रउत का मुख्य उद्देश्य 'सबको काम और सबको सम्मान' है। भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सा और शिक्षा पर हर बिहारी का जन्मसिद्ध अधिकार सुनिश्चित करना ही सच्चा लोकतंत्र है।
​बिहार का इतिहास गौरवशाली रहा है, लेकिन भविष्य केवल राजनैतिक नारों से नहीं संवरेगा। प्राउटिस्ट सर्व समाज जिस आर्थिक लोकतंत्र की बात कर रहा है, वही बिहार को 'बिमारू' राज्य की श्रेणी से निकालकर एक खुशहाल प्रदेश बना सकता है।
​राजनैतिक लोकतंत्र ने हमें केवल 'मत' देने का अधिकार दिया है, लेकिन प्रउत का आर्थिक लोकतंत्र हमें 'भात' (रोटी) और गरिमापूर्ण जीवन की गारंटी देगा। यही बिहार का सुनहरा भविष्य है।

              👉 छपते-छपते...
​✍️ अध्यक्ष जी की कलम से : बिहार की नियति बदल सकती है 'जल नीति’
बिहार का एक बड़ा हिस्सा प्रतिवर्ष वर्षा ऋतु में नेपाल से आने वाली नदियों के रौद्र रूप और बाढ़ की विभीषिका झेलने को मजबूर है। प्रकृति की इस त्रासदी को अवसर में बदलने के लिए अब पारंपरिक सोच से हटकर ठोस कदम उठाने का समय आ गया है।
​नहरों का जाल: कृषि और सुरक्षा का संगम
हमारी प्राथमिकता इन नदियों के अतिरिक्त जल को बड़ी और सुनियोजित नहरों के माध्यम से पूरे बिहार में प्रवाहित करने की होनी चाहिए। यह 'कैनाल नेटवर्क' न केवल हर मौसम में कृषि के लिए सिंचाई सुनिश्चित करेगा, बल्कि जल प्रबंधन के जरिए बाढ़ की समस्या को भी काफी हद तक नियंत्रित कर सकेगा। जब बिहार के हर खेत तक अपनी नहर होगी, तब किसान मानसून की अनिश्चितता से मुक्त होकर आर्थिक समृद्धि की ओर बढ़ेगा।
​रोडवेज नहीं, 'वाटरवेज' है भविष्य
वर्तमान समय में बिहार को केवल एक्सप्रेस रोडवेज की ही नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक 'वॉटरवेज' (जलमार्गों) की आवश्यकता है। ये बड़ी नहरें केवल सिंचाई का साधन मात्र नहीं, बल्कि यातायात और माल ढुलाई का एक सस्ता और सुगम विकल्प भी बनेंगी।
​हॉलैंड की 'डाइक व्यवस्था' से प्रेरणा
बिहार को जल प्रबंधन के लिए हॉलैंड (नीदरलैंड्स) की प्रसिद्ध 'डाइक व्यवस्था' (Dyke System) और वहां की जल-यातायात नीति को अपनाने की जरूरत है। यदि हम आधुनिक तकनीक और दूरदर्शी योजना के साथ अपनी नदियों को जोड़ते हैं, तो बिहार को जल-संकट और बाढ़, दोनों से स्थायी मुक्ति मिल सकती है।
​"बिहार की खुशहाली का रास्ता खेतों की मेड़ से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक जल प्रबंधन की नहरों से होकर गुजरता है।”
आह्वान :
बिहार के अंदर आज भी वही क्षमता और ऊर्जा विद्यमान है जिसके बल पर "आदर्श बिहार : प्रगतिशील बिहार" का आलोक फैलेगा। आओ हम सब मिलकर इस महायज्ञ में अपनी आहुति दें।

करण सिंह राजपुरोहित
जनसंपर्क और प्रकाशन सचिव एवं प्रवक्ता, प्राउटिस्ट सर्व समाज (PSS) भारतवर्ष 
आनन्द नगर से‌ प्राउटिस्टों की हुंकार
पुरानी यादें… … . 
डॉ. महेन्द्र प्रताप सिंह का सपना : - विश्व के सभी बिखरे हुए प्राउटिस्टों, प्रगतिशील विचारकों, एवं नैतिकवादी को एक कर …..
“विश्व के नैतिकवादी एक हो” 
आदर्श व आप्त वाक्य को सिद्ध करना
श्री प्रभात रंजन सरकार जिन्दाबाद जिन्दाबाद









मीडिया सचिव श्री कृपा शंकर चौधरी के सहयोग से






प्राउटिस्ट सर्व समाज सेवाकेन्द्र की झलकियाँ










प्रउत कैसे?

प्रउत कैसे?
       प्रउत कब पर विचार डालते ही कई प्रश्न किए गए। इसी क्रम में एक संदेश आया। दादा हम लोग विश्व की जनसंख्या का 0.001 प्रतिशत, भारतवर्ष की जनसंख्या का  0.01 प्रतिशत है तथा बिहार बंगाल की छोड़कर शेष भारत में यह प्रतिशत ओर भी कम है। कुछ ओर संकेत करते हुए दादा जी हमारे पास अपना  एक भी  एम.पी., एम. एल .ए.,  एक भी टीवी व आकाशवाणी चैनल तथा एक भी समाचार पत्र नहीं है। हमारी पत्र-पत्रिकाएँ भी आक्सीजन पर चलती है। ओर तो ओर दादा जी हमारी प्रति व्यक्ति औसत आय, सकल घरेलू उत्पाद एवं सार्वजनिक आय भी आशानुकूल नहीं है। दूसरी ओर आपसे झगड़े में हम विश्व रिकॉर्ड कायम कर सकते हैं । फिर प्रउत कैसे आएगा?
          प्रउत को लेकर आज चल रहे सभी प्रश्नो में सबसे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न  प्रउत कैसे है। प्रउत इस धरती पर है, मात्र सर्वमान्य बनाना है।  सर्वमान्य की यात्रा की शुरुआत अमान्य, अवमान्य,  अल्पमान्य तथा बहुमान्य से होकर चलती है। आज हम अल्पमान्य की स्थिति में है, कल हम बहुमान्य हो सकते है, तो परोसो सर्वमान्य के की स्थिति को पाया जा सकता है। अमान्य एवं अवमान्य की स्थिति में होते तो, अवश्य ही विचारणीय प्रश्न होता। इस स्थिति में भी कर्म कौशल में वैशिष्ट्य से सफलता प्राप्त की जा सकती है। प्रउत की कार्य पद्धति में अपना वैशिष्ट्य है। उस पर कार्य करने मात्र से प्रउत कैसे समीकरण का सर्वमान्य हल ज्ञात किया जा सकता है।
         प्रउत को सर्वजन हितार्थ, सर्वजन सुखार्थ प्रचारित करते समय, बाबा ने इसे मूर्तरूप देने की योजना भी तैयार कर, हमारे सामने रख दी थी। उस योजना का नाम है, प्राउटिस्ट यूनिवर्सलप्राउटिस्ट यूनिवर्सल पर कार्य करने मात्र से प्रउत कैसे का प्रश्न उत्तर मिल जाएगा।
          बाबा ने सदैव अपनी योजनाओं मूर्त रुप देने के लिए उनके द्वारा प्रदान की गई संस्था की संरचना निर्माण करने पर बल दिया है। उस पर कार्यकर्ताओं ने कभी काल्पनिक तो, कभी यथार्थ रेखाएँ खिंची, मिटाई एवं पुनः खिंची गई। उन पर खिंची गई रेखाओं में स्थायित्व, नविनीकरण व गतिशीलता प्रदान करने  आवश्यकता है। प्राउटिस्ट यूनिवर्सल एवं उसके अंग  UPSF, UPYF,  UPIF,  UPLF व UPFF नामक संगठनों की मजबूत एवं सक्रिय संरचना का निर्माण कर प्रउत कैसे का उत्तर ढुंढा जा सकता है। प्रउत के समाज आंदोलन की भी एक संरचना है। उसका भी निर्माण एवं संचालन करने की प्रारंभिक जरूरत है।
        प्रउत कैसे प्रश्न का उत्तर यह है कि बाबा द्वारा प्रदान किये गए संगठन की संरचना का निर्माण करना एवं कार्यशील रखना है। इन संरचना का निर्माण मात्र कागजों में कर रद्दी की टोकरी में डालने से नहीं चलेगा। सरंचना के निर्माण में समय लगना बड़ा प्रश्न नहीं है। बड़ा प्रश्न यह है कि संरचना के निर्माण में योग्यता का ध्यान रखा गया है अथवा नहीं। बाबा ने प्रत्येक पद की गरिमा का मानक मापदंड का निर्धारित किया है। उसके अनुरूप कार्यकर्ता का निर्माण कर कार्यभार देना होगा।
         प्रउत कैसे का उत्तर है - संगठन की योग्य, मजबूत एवं सक्रिय संरचना का निर्माण करना है। यह संरचना वित्त व्यवस्था के सही निर्धारण नहीं करने एवं कार्यकर्ताओं में साधना, सेवा एवं त्याग के भाव को दृढ़ता से स्थापित नहीं करने से निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने में विलंब कर रही है। इसका ध्यान रखना भी प्रउत कैसे समस्या का समाधान करने वालों का दायित्व है।
        अब प्रश्न है कि उपरोक्त संरचना का निर्माण, नियमन एवं संचालन करने दायित्व किसका है? यह दायित्व बाबा की सभी संस्थाओं की जननी आनन्द मार्ग का है। आनन्द मार्ग, मंझे हुए कार्यकर्ताओं को समाज निर्माण की कार्य योजना में देकर अपने पुत्री संगठन को मजबूत बनाने से विश्व में आनन्द परिवार एवं प्रउत की सर्वमान्यता प्रदान कराई जा सकती है।
       प्रउत कैसे प्रश्न का हल खोजने की साधना में रत साधकों! बाबा द्वारा प्रदान किये गए मिशन का निर्माण नियमन एवं संचालन में दृढ़ता, पारदर्शिता व सच्ची लग्न से कार्य करो। प्रउत कैसे का उत्तर पाओ।  बाबा का कथन है - *" सैद्धांतिक नहीं,  व्यवहारिक बनों।"*
- श्री आनन्द किरण उर्फ करण सिंह राजपुरोहित

प्रउत कैसे?

प्रउत कैसे?
       प्रउत कब पर विचार डालते ही कई प्रश्न किए गए। इसी क्रम में एक संदेश आया। दादा हम लोग विश्व की जनसंख्या का 0.001 प्रतिशत, भारतवर्ष की जनसंख्या का  0.01 प्रतिशत है तथा बिहार बंगाल की छोड़कर शेष भारत में यह प्रतिशत ओर भी कम है। कुछ ओर संकेत करते हुए दादा जी हमारे पास अपना  एक भी  एम.पी., एम. एल .ए.,  एक भी टीवी व आकाशवाणी चैनल तथा एक भी समाचार पत्र नहीं है। हमारी पत्र-पत्रिकाएँ भी आक्सीजन पर चलती है। ओर तो ओर दादा जी हमारी प्रति व्यक्ति औसत आय, सकल घरेलू उत्पाद एवं सार्वजनिक आय भी आशानुकूल नहीं है। दूसरी ओर आपसे झगड़े में हम विश्व रिकॉर्ड कायम कर सकते हैं । फिर प्रउत कैसे आएगा?
          प्रउत को लेकर आज चल रहे सभी प्रश्नो में सबसे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न  प्रउत कैसे है। प्रउत इस धरती पर है, मात्र सर्वमान्य बनाना है।  सर्वमान्य की यात्रा की शुरुआत अमान्य, अवमान्य,  अल्पमान्य तथा बहुमान्य से होकर चलती है। आज हम अल्पमान्य की स्थिति में है, कल हम बहुमान्य हो सकते है, तो परोसो सर्वमान्य के की स्थिति को पाया जा सकता है। अमान्य एवं अवमान्य की स्थिति में होते तो, अवश्य ही विचारणीय प्रश्न होता। इस स्थिति में भी कर्म कौशल में वैशिष्ट्य से सफलता प्राप्त की जा सकती है। प्रउत की कार्य पद्धति में अपना वैशिष्ट्य है। उस पर कार्य करने मात्र से प्रउत कैसे समीकरण का सर्वमान्य हल ज्ञात किया जा सकता है।
         प्रउत को सर्वजन हितार्थ, सर्वजन सुखार्थ प्रचारित करते समय, बाबा ने इसे मूर्तरूप देने की योजना भी तैयार कर, हमारे सामने रख दी थी। उस योजना का नाम है, प्राउटिस्ट यूनिवर्सलप्राउटिस्ट यूनिवर्सल पर कार्य करने मात्र से प्रउत कैसे का प्रश्न उत्तर मिल जाएगा।
          बाबा ने सदैव अपनी योजनाओं मूर्त रुप देने के लिए उनके द्वारा प्रदान की गई संस्था की संरचना निर्माण करने पर बल दिया है। उस पर कार्यकर्ताओं ने कभी काल्पनिक तो, कभी यथार्थ रेखाएँ खिंची, मिटाई एवं पुनः खिंची गई। उन पर खिंची गई रेखाओं में स्थायित्व, नविनीकरण व गतिशीलता प्रदान करने  आवश्यकता है। प्राउटिस्ट यूनिवर्सल एवं उसके अंग  UPSF, UPYF,  UPIF,  UPLF व UPFF नामक संगठनों की मजबूत एवं सक्रिय संरचना का निर्माण कर प्रउत कैसे का उत्तर ढुंढा जा सकता है। प्रउत के समाज आंदोलन की भी एक संरचना है। उसका भी निर्माण एवं संचालन करने की प्रारंभिक जरूरत है।
        प्रउत कैसे प्रश्न का उत्तर यह है कि बाबा द्वारा प्रदान किये गए संगठन की संरचना का निर्माण करना एवं कार्यशील रखना है। इन संरचना का निर्माण मात्र कागजों में कर रद्दी की टोकरी में डालने से नहीं चलेगा। सरंचना के निर्माण में समय लगना बड़ा प्रश्न नहीं है। बड़ा प्रश्न यह है कि संरचना के निर्माण में योग्यता का ध्यान रखा गया है अथवा नहीं। बाबा ने प्रत्येक पद की गरिमा का मानक मापदंड का निर्धारित किया है। उसके अनुरूप कार्यकर्ता का निर्माण कर कार्यभार देना होगा।
         प्रउत कैसे का उत्तर है - संगठन की योग्य, मजबूत एवं सक्रिय संरचना का निर्माण करना है। यह संरचना वित्त व्यवस्था के सही निर्धारण नहीं करने एवं कार्यकर्ताओं में साधना, सेवा एवं त्याग के भाव को दृढ़ता से स्थापित नहीं करने से निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने में विलंब कर रही है। इसका ध्यान रखना भी प्रउत कैसे समस्या का समाधान करने वालों का दायित्व है।
        अब प्रश्न है कि उपरोक्त संरचना का निर्माण, नियमन एवं संचालन करने दायित्व किसका है? यह दायित्व बाबा की सभी संस्थाओं की जननी आनन्द मार्ग का है। आनन्द मार्ग, मंझे हुए कार्यकर्ताओं को समाज निर्माण की कार्य योजना में देकर अपने पुत्री संगठन को मजबूत बनाने से विश्व में आनन्द परिवार एवं प्रउत की सर्वमान्यता प्रदान कराई जा सकती है।
       प्रउत कैसे प्रश्न का हल खोजने की साधना में रत साधकों! बाबा द्वारा प्रदान किये गए मिशन का निर्माण नियमन एवं संचालन में दृढ़ता, पारदर्शिता व सच्ची लग्न से कार्य करो। प्रउत कैसे का उत्तर पाओ।  बाबा का कथन है - *" सैद्धांतिक नहीं,  व्यवहारिक बनों।"*
- श्री आनन्द किरण उर्फ करण सिंह राजपुरोहित