आनन्द किरण की कविता -03


*कृष्ण बनो, भीष्म पितामह नहीं* 

 `कविराज - आनन्द किरण`

शपथों के भारी बोझ तले, क्यों शौर्य तुम्हारा सोता है?
जब रक्षक ही बन जाए पत्थर, तब धर्म धरा पर रोता है।
इतिहास खड़ा पूछे तुमसे, क्यों तेज पुंज मद्धम कर गए?
" *हम कृष्ण बनने निकले थे, क्यों भीष्म पितामह बनकर रह गए* ।।1।।"


कहाँ गई वह सुदर्शन की शक्ति, कहाँ गया वह रण-कौशल?
क्यों मर्यादा की बेड़ी ने, कर दिया वीर को आज विकल?
गांडीव पड़ा है धरती पर, तुम मोह-पाश में बह गए,
" *हम कृष्ण बनने निकले थे, क्यों भीष्म पितामह बनकर रह गए* ।।2।।"


अन्याय की काली छाया ने, जब सत्य-सूर्य को घेरा था,
तब तुमको शस्त्र उठाना था, वह धर्म-युद्ध ही तेरा था।
पर कायरता की रीत देख, हम ग्लानि के सागर सह गए,
" *हम धर्म की संस्थापना में सर्वस्व त्यागने आए थे, अधर्म में‌ परमपिता छवि देखने लग गए* ।।3।।"


जिस हाथ में चक्र सुशोभित था, उसमें आज लाचारी है,
अधर्मी को ईश्वर मान बैठे, यह कैसी मति तुम्हारी है?
जो मिटाने चले थे पाप जगत का, वही पाप में बहक गए,
" *हम धर्म की संस्थापना में सर्वस्व त्यागने आए थे, अधर्म में‌ परमपिता छवि देखने लग गए* ।।4।।"

विवेक शून्य जो वाणी हो, वह शस्त्र से अधिक घातक है,
जो तर्कहीन सत्ता पूजे, वह समाज-धर्म का महापातक है।
हम भूल गए निज गौरव को, बस बँधुआ बनकर रह गए,
" *परमपिता भी युक्तिहीन बात करे तो त्यागने की शिक्षा पाई थी, युक्तिहीन बातों के पहरेदार बनकर रह गए* ।।5।।"

सदगुरु ने सिखलाया था, अन्याय न सहना धर्म है,
चाहे आचार्य हो या अपना संबंधी, सत्य ही सबसे परम है।
पर हम तो उन झूठी दीवारों के, पहरेदार बनकर रह गए,
" *परमपिता भी युक्तिहीन बात करे तो त्यागने की शिक्षा पाई थी, युक्तिहीन बातों के पहरेदार बनकर रह गए* ।।6।। "


'वसुधैव कुटुम्बकम्' का सपना, क्या केवल शब्द-जाल था?
जब लहू बहा अपनों का ही, तब कौन काल का काल था?
हम प्रेम बाँटने निकले थे, पर नफरत के घर ढह गए,
" *हम विश्व बंधुत्व कायम करने निकले थे, अपने बंधु को ही पराया मान बैठे* ।।7।।"


जो भुजाएँ ढाल बननी थीं, वो तलवारें खींच खड़ी हैं,
विश्व-प्रेम की बातें अब, बस कागज़ पर ही पड़ी हैं।
संकीर्ण स्वार्थ की खातिर हम, अपनों से ही ठन बैठे,
" *हम विश्व बंधुत्व कायम करने निकले थे, अपने बंधु को ही पराया मान बैठे* ।।10।।"

मत बनो मौन तुम, न्याय का चक्र हाथ में अब धारो,
भीष्म की उस प्रतिज्ञा का, अब सरेआम तुम अंत करो। 
सोई हुई अपनी चेतना को, पंचजन्य सा तुम पुकार दो, 
 *जग को दिशा देने आए थे, स्वयं दिशाहीन बनकर मत बैठो* ।। 9।। 

उठो आनन्द किरण! अब फिर से, प्रचंड वह हुंकार भरो,
समाज खड़ा है राह जोहता, नव-युग का निर्माण करो। 
'आनन्द मार्ग' के उन ऊँचे आदर्शों का, तुम फिर से ध्यान करो।
कृष्ण बनो, तुम धर्म बनो, इस महासमर को जीत लो,
 *जग को दिशा देने आए थे, स्वयं दिशाहीन बनकर मत बैठो* ।। 10।। 

`प्रस्तुति : आनन्द किरण`
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